मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषणवादी आलोचना - psychological or psychoanalytic criticism

फ्रायड, एडलर और युंग आदि मनोवैज्ञानिकों के चिन्तन पर आधारित आलोचना मनोवैज्ञानिक, अन्तश्चेतनावादी या मनोविश्लेषणवादी आलोचना कहलाती है। इन मनोवैज्ञानिकों के विचारों से विकसित कला- सिद्धान्त में माना जाता है कि साहित्य और कलाएँ मनुष्य की दमित वासनाओं की अभिव्यक्ति हैं। दमित काम भावना को कलात्मक सृजन का उत्स मानते हुए मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषणवादी आलोचक साहित्यकार के व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तित्व के आधार पर उसके साहित्य का विश्लेषण करता है।

वह देखता है कि उसके अवचेतन में दबी हुई वासनाएँ उसके साहित्य में किस प्रकार अभिव्यक्त हुई हैं। इस प्रकार की आलोचना में सामाजिक चेतना के स्थान पर व्यक्ति चेतना और अन्तश्चेतना को साहित्य-सृजन की प्रेरणा माना जाता है। मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषणवादी आलोचना का मूल उद्देश्य साहित्यिक पात्रों की मनःस्थितियों और अन्तर्वृत्तियों का विश्लेषण करना होता है । हिन्दी में इन प्रतिमानों को पूर्ण रूप से अपनाते हुए विशुद्ध मनोविश्लेषणवादी आलोचना बहुत कम लिखी गई है। इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, डॉ. देवराज उपाध्याय और डॉ० नगेन्द्र आदि पर इस पद्धति का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।


इलाचन्द्र जोशी ने 'साहित्य सर्जना', 'विवेचना', 'विश्लेषण', 'देखा परखा' आदि आलोचना कृतियों में मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर कई रचनाओं और साहित्यिक प्रवृत्तियों का मूल्यांकन किया। उन्होंने भक्ति काव्य को भी भक्त कवियों की काम-कुण्ठा की अभिव्यक्ति का माध्यम बताया और छायावादी कवियों की कल्पना लोक की उड़ान को उनकी अक्षमता की पूर्ति का प्रयास कहकर उसकी व्याख्या की। डॉ० नगेन्द्र ने मनोविज्ञान को रहस्यवाद का पूरक माना और उसके आधार पर रस की व्याख्या की। अज्ञेय ने 'त्रिशंकु', 'आत्मनेपद' आदि कृतियों में मनोविश्लेषणवादी पद्धति को अपनाते हुए कलाकार के हीनताबोध को कलात्मक सृजन का आधार मानकर साहित्य का विश्लेषण मूल्यांकन किया है। डॉ. देवराज उपाध्याय ने अपनी आलोचना- पुस्तक 'साहित्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन' में मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों के आधार पर साहित्य का विवेचन किया है।