आलोचना का उद्देश्य - purpose of criticism
साहित्य जीवन और जगत् को अर्थ प्रदान करने, उसे समझने का माध्यम है। साहित्यिक आलोचना साहित्य की व्याख्या और समझ की पद्धति है। साहित्यिक आलोचना एक साहित्यिक रचना को पाठकों के लिए बोधगम्य बनाने और स्पष्ट करने का कार्य करती है। आलोचना हमें बताती है कि कोई रचना अपने रूप और कथ्य मैं कैसी है? अर्थात् उसका गठन और निर्माण किस प्रकार हुआ है, उसका अर्थ और मूल्य क्या है ? आलोचना अथवा साहित्यिक आलोचना साहित्य और साहित्यिक रचनाओं से सम्बन्धित परिभाषा, वर्गीकरण,
विश्लेषण, व्याख्या और मूल्यांकन से सम्बन्धित सभी तरह के अध्ययन के लिए एक व्यापक और समावेशी शब्द है।
आलोचना के दो प्रधान उद्देश्य होते हैं पहला, आलोच्य कृति की व्याख्या करना और दूसरा उसका मूल्यांकन करना । अर्थात् आलोच्य रचना के सभी सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार करते हुए उसकी विस्तृत विवेचना करना आलोचना का मुख्य प्रयोजन होता है। इस प्रक्रिया में आलोचक रचना की अन्तर्वस्तु, रूप-रचना और उससे व्यक्त होने वाले सन्देश की विवेचना भी करता है। टी. एस. एलियट ने बताया है।
कि आलोचना का मुख्य उद्देश्य कलाकृति की समझ (Understanding), आस्वाद (Enjoyment) और भावन या परिशंसन (Appreciation) के लिए आधार तैयार करना है। साथ ही रुचि परिष्कार भी आलोचना का एक मूलभूत कार्य है। रुचि परिष्कार का अर्थ यह है कि आलोचना अपने पाठक को न केवल नये साहित्य से परिचय करवाए, उसके आस्वादन को सुगम बनाए, बल्कि पठित और परिचित काव्य को भी नयी दृष्टि से देखने-समझने और उसका आनन्द लेने के लिए पाठक को तैयार करे। आलोचना ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों और शक्तियों का भी आकलन करती है और साहित्य पर पड़ने वाले उनके प्रभावों की भी विवेचना करती है।
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