काव्य का प्रयोजन - purpose of poetry
काव्य के प्रयोजन को लेकर अज्ञेय की मान्यताओं में विरोधाभास दिखाई देता है। वे प्रगतिवादी विचारकों की भाँति जन-जन तक साहित्य या कला के प्रसार की बात स्वीकार नहीं करते; उनका मानना है कि सच्ची कला एक परिष्कृत प्रकार का आनन्द प्रदान करती है, उसका एक महत्तर नैतिक उद्देश्य होता है। काव्य की रचना स्वान्तः सुखाय होती है अथवा लोक सुख के लिए। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए अज्ञेय कहते हैं कि "मैं स्वान्तः सुखाय नहीं लिखता। कोई भी कवि केवल स्वान्तः सुखाय लिखता है अथवा लिख सकता है, यह स्वीकार करने में मैंने सदा अपने को असमर्थ पाया है।" इस प्रकार अज्ञेय ने काव्य में रचयिता के अलावा किसी श्रोता अथवा पाठक की अनिवार्यता पर विशेष बल दिया है।
"मैं क्यों लिखता हूँ ?" इस सन्दर्भ में अज्ञेय का कहना है कि "मैं इसीलिए लिखता हूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता है... लिखकर ही लेखक उस आभ्यन्तर विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। मैं भी उस आन्तरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए, तटस्थ होकर उसे देखने और पहचानने के लिए लिखता हूँ। मेरा विश्वास है कि सभी कृतिकार क्योंकि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते, न उनका सब लेखन कृति होता है सभी - - कृतिकार इसलिए लिखते हैं।"
रचना-लेखन के लिए अज्ञेय बाहरी दबाव के महत्त्व को भी स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि आभ्यन्तर विवशता के अलावा बाहरी दबाव भी लेखक से लिखवाता है, किन्तु इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि "एक तो कृतिकार हमेशा अपने सम्मुख ईमानदारी से यह भेद बनाए रहता है कि कौनसी कृति भीतरी प्रेरणा का फल हैं, कौनसा लेखन बाहरी दबाव का। दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वस्तु में दबाव ही रहता है, वह मानो भीतरी उन्मेष का निमित्त बन जाता है।" यहाँ अज्ञेय इस मत का प्रतिपादन करते हैं कि जब बाहरी दबाव भीतरी उन्मेष का निमित्त बन जाय तभी श्रेष्ठ कृति का सृजन होता है। अज्ञेय के लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कृतिकार की रचना को समाज अच्छा कहे या बुरा।
अज्ञेय ने काव्य या कला का प्रयोजन उच्च कोटि की आनन्द साधना को माना है। 'चेतना का संस्कार नामक निबन्ध में उन्होंने साहित्य या काव्य का लक्ष्य चेतना के नये संस्कार को घोषित किया है। उनका विश्वास है। कि "शरीर और बुद्धि के विकास के उपरान्त विकास की अगली सीढ़ी मानवीय चेतना के क्षेत्र में क्रियाशील होगी। इसलिए मानवीय चेतना का नूतन संस्कार ही आज की तात्कालिक समस्या है और यही साहित्य का लक्ष्य भी कहा जा सकता है।"
अज्ञेय व्यक्तिवादी विचारक हैं, किन्तु समाज अथवा लोक को उन्होंने कभी भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया है। वे कला या काव्य का एक उच्चतर नैतिक उद्देश्य भी स्वीकार करते हैं। 'इंद्रधनुष रौंदे हुए ये ' नामक कविता में वे कहते हैं. -
जो पाता हूँ
अपने को मट्टी कर उसे गलाता चमकाता हूँ।
अनिर्वय आह्लाद-सा लुटाता हूँ।
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