आलोचक के गुण - the qualities of a critic

रचना के मर्म का उद्घाटन करना आलोचक का मुख्य कार्य हैं। डॉ० नगेन्द्र के अनुसार "साहित्य को दिशा तो सृष्टा कलाकार ही देता है। आलोचक संघात और प्रतिघात से उसकी प्रतिभा पर शाण रखने का कार्य करता है।" इसके लिए उसे सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति लेखक की सजगता की परख करते हुए स्वयं को भी युगीन आवश्यकताओं से अनुप्रेरित रहना होता है। एक आलोचक में कुछ सामान्य गुणों का होना आवश्यक है। इन गुणों के अभाव में रचना की सार्थक आलोचना नहीं की जा सकती है। निष्पक्षता, सहृदयता, संवेदनशीलता, साहस, सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण,

इतिहास और वर्तमान का सम्यक् ज्ञान, विश्व-साहित्य और विभिन्न कलाओं का ज्ञान, अध्ययनशीलता और मननशीलता आदि गुण एक आलोचक के मूल गुण माने गए हैं। इन गुणों के अभाव में कोई आलोचक किसी रचना के ऊपरी गुण-दोष तो दिखा सकता है, परन्तु उसके वास्तविक मर्म का उद्घाटन और उसके सामाजिक-साहित्यिक मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकता।


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आलोचक गुणों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि "समालोचक को न्यायाधीश की भाँति निष्पक्ष और निर्भय होना पड़ता है।

सच्चे समालोचक को बड़े-बड़े कवि, विज्ञानवेत्ता, इतिहास लेखक और वक्ताओं की कृतियों पर फैसला सुनाने का अधिकार होता है । ढंग सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत होना चाहिए। पाण्डित्यसूचक आलोचना भूलों के प्रदर्शन तक ही रह जाती है। प्रमुख बातें तो आलोचक की वस्तु प्रस्थापन, शैली, मनोरंजकता, नवीनता, उपयोगिता आदि है। जिसके कार्य या ग्रन्थ की समालोचना करनी है उसके हृदय में गहरे घुसकर समालोचक को उसके हर एक परदे का पता लगाना चाहिए । अमुक उक्ति लिखते समय कवि के हृदय की क्या अवस्था थी, उसका आशय क्या था, किस भाव को प्रधानता देने के लिए उसने यह उक्ति कही थी, जब तक समालोचक को मालूम नहीं होगा तब तक उस उक्ति की आलोचना कभी नहीं कर सकेगा।"