रघुवीर सहाय का भाषा-शिल्प - Raghuveer Sahai's language craft
रघुवीर सहाय कभी बँधी बँधाई परिपाटी में चलने के समर्थक नहीं रहे। उनकी रचनाओं की विषयवस्तु में परम्परा से हटकर समसामयिक विसंगतियों का उद्घाटन हुआ है। यही बात उनके शैली- शिल्प में भी देखने में आती है। वे काव्य-कला में नूतन प्रयोग के हिमायती हैं। भाषिकविधान के आलोक में वे विषयानुकूल भाषा एवं शब्दों का चयन करने में सतर्कता बरतते हैं। पत्रकारिता सुदीर्घकाल तक उनका कर्म-क्षेत्र रहा है इसलिए उनका शब्द-भण्डार अक्षय है । किन्तु वे इसके लिए सजग हैं कि काव्य की भाषा सामान्य बोलचाल की भाषा से भिन्न होती है। शब्दों की आत्मा को पहचानकर काव्य में उनका सटीक प्रयोग करना रघुवीर सहाय बखूबी जानते हैं।
वे काव्य में शब्दों के मर्म को भली प्रकार पहचानते हैं और शब्दों की आत्मा तथा उनकी शक्ति-सामर्थ्य का उन्हें बखूबी अंदाज़ा है । तभी तो वे अपने द्वारा प्रयुक्त शब्दों के माध्यम से व्यंजित अर्थों से परमाणु सदृश विस्फोट कर पाते हैं। यह रघुवीर सहाय का कौशल ही है कि वे शब्दों को संगठित कर और कहीं-कहीं उन्हें तोड़कर नयी सार्थक भाषा तैयार करना जानते हैं।
रघुवीर सहाय की रचनाओं में जिस भाषा में काव्याभिव्यक्ति की गई है, वह पत्रकारिता की भाषा से बहुत हद तक प्रभावित है।
यही कारण है कि ऊपरी तौर पर वह सामान्य बोलचाल की भाषा प्रतीत होती है। हालाँकि, उन्होंने सामान्य शब्दों का प्रयोग कर उन्हें नवीन अर्थवत्ता प्रदान की है। वे आवरणयुक्त भाषा के स्थान पर खुली और स्पष्ट भाव व्यक्त करने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। अपनी कविताओं में वे बोधगम्य भाषा का प्रयोग करते हैं, इसलिए दृश्य तथा वातावरण की सजीवता को बनाए रखने के लिए वे 'बोली' में किसी तरह का अनावश्यक परिवर्तन न कर उसे जैसा है, उसी रूप में प्रस्तुत कर देते हैं। भाषा में उन्होंने नये बिम्ब, नये प्रतीक और नये उपमानों की खोज भी की है। उनका प्रत्येक शब्द अन्तर्निहित भाव को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है। रघुवीर सहाय की भाषागत विशेषताओं का निरूपण उनकी प्रतीकात्मक भाषा, लाक्षणिक भाषा और चित्रमयी भाषा के सन्दर्भ में किया जा सकता है।
प्रतीकात्मक भाषा
रघुवीर सहाय अपनी कविताओं में प्रतीकात्मकता का भरपूर आश्रय लेते हैं। प्रतीकों के द्वारा उन्होंने अनेक सूक्ष्म रूपों एवं व्यापारों की सार्थक अभिव्यंजना की है। इसी से उनकी रचनाओं में अपूर्व चमत्कार की स्वाभाविक सृष्टि हुई है। उदाहरण द्रष्टव्य है-
जब से मैंने यह कविता लिखी है
e: preserve;">कट रहे जंगल के छोर पर राजमार्ग के समीप सब दिन मरे पड़े मिलते हैं नौजवान लाश का हुलिया सुन कोई जानता नहीं कौन था मान लिया जाता है कैसे मरा होगा मरने का कारण अब थोड़े ही शेष है। हुलिया भी संक्षिप्त होता जा रहा है.
जितने कम कपड़े उतना छोटा हुलिया चेहरे पर जाति की छाप मिट रही है। गाँव के सयाने तो मौत का कारण हताशा बताते हैं समवयस्क समवेत स्वर में अनेक नाम लेते हैं पर उसका नाम है हत्या।
लाक्षणिक भाषा
जहाँ सामान्य भाषा प्रभावी नहीं होती है, वहाँ लक्षणा शब्दशक्ति का प्रयोग करके भाषा की सामर्थ्य को बढ़ाया जाता है और इस प्रकार उसकी सम्प्रेषणीयता को निश्चित किया जाता है। रघुवीर सहाय अपनी कविताओं में लाक्षणिकता का प्रयोग सन्दर्भानुकूल करते हैं। उदाहरण देखिए-
यह युग है जिसका अन्त हमें दिखता है
पर अगले युग का आरम्भ नहीं जानते
मनहूस शून्य के अथाह में पाँव नहीं टिकते हैं। हम डूबते नहीं उतराते रहते हैं बार-बार यह कोशिश है कि हर एक संवाद अर्थहीन हो जाए आज इन टूटते रिश्तों को सार्वजनिक मान्यता देते हैं अध्येता
लोगों के सम्बन्ध मध्यस्थों द्वारा बना करें
करते हैं प्रबन्ध की एक शैली का उद्घाटन जनता के साधनों से नये लाभ की।
एक अन्य उदाहरण द्रष्टव्य है-
मुझे एक लम्बी लम्बी लम्बी छुट्टी दो
मैं अपने कागजों को सँभालूँगा कितनी तरह के उबड़-खाबड़ कागज हैं ये इनके बीच से पिरो कर अपने दर्द को निकालूंगा बाहर भय है भय है भय है जाने क्यों आशा है कि इनको फिर से सजाने से भय मिट जाएगा।
चित्रमयी भाषा
चित्रमयी भाषा का प्रयोग रघुवीर सहाय का रचनात्मक वैशिष्ट्य है। उनमें किसी दृश्य, घटना का प्रसंगानुकूल संश्लिष्ट चित्र प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है।
इस आलोक में उनकी कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं जिनमें कवि ने 'समय आ गया है' वाक्यांश के ध्वन्यात्मक प्रभाव के माध्यम से वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की चित्रमय अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है -
दस बरस बाद फिर पदारूढ़ होते ही नेतराम पदमुक्त होते ही न्यायाधीश कहता है समय आ गया है मौका अच्छा देखकर प्रधानमंत्री सुन्दर नौजवानों से कहता है गाता बजाता हारा हुआ दलपति ।
समवेततः रघुवीर सहाय की भाषा में नवीनता भी है और अंदर तक झकझोर देने का सामर्थ्य भी साथ- ही साथ वह गहरी अर्थवत्ता से युक्त भी है। उनका भाषागत यथार्थ कविताओं को विचारों से जोड़ता है। प्रो. नामवर सिंह के शब्दों में "उनके यहाँ आवेश में हाँफते हुए स्वर की धारा है। इसीलिए एक वाक्य जैसे दूसरे वाक्य के अंदर घुसा हुआ तीसरे वाक्य को आगे धक्का देता सा प्रतीत होता है। लेकिन, आविष्ट लय का यह प्रवाह उनकी कविता के भाव एवं अर्थ से पूरी तरह बेझिझक जुड़ा हुआ है। "
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