रस चिन्तन - Ras Chintan
जयशंकर प्रसाद ने काव्यसम्बन्धी समग्र चिन्तन को सामान्य लोकानुभव से ऊपर उठाकर दार्शनिक धरातल प्रदान किया है तथा काव्य का सम्बन्ध हृदय से आगे ले जाकर आत्मा से जोड़ा है। अन्य छायावादी कवियों की तरह प्रसाद ने भी अपनी कविताओं के सम्बन्ध में वक्तव्य देकर अपनी आलोचना- दृष्टि विकसित की है। रस चिन्तन के निहितार्थ वे काव्य में आत्मिक संघर्ष और करुणा को प्रमुखता से स्वीकार करते हैं। साथ ही रस की महत्ता को स्थापित करते हुए उसे काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। भारतीय काव्यशास्त्र के अन्य सम्प्रदायों यथा अलंकार, रीति, वक्रोक्ति तथा ध्वनि को वे 'विवेक' से जोड़ते हैं जबकि रस को 'आनन्द' से।
प्रसाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की तरह रसवादी तो थे लेकिन रस चिन्तन को उन्होंने 'साहित्य दर्पण' की परम्परा पृथक् कर अभिनवगुप्त की शैवाद्वैतवादी परम्परा से जोड़ा। इसके अलावा जहाँ भारतीय नाटकों में उन्होंने रस की आनन्दवादी परम्परा को देखा-समझा, वहाँ पश्चिम के महाकाव्यों में जीवन के प्रति त्रासदीय दृष्टिकोण को भी स्वीकार कर इन दोनों के बीच दार्शनिक स्तर पर सन्तुलन स्थापित करने की कोशिश की। साथ हीं, छायावाद की रहस्य चेतना को स्पष्ट करने के लिए वे सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में रहस्यवादी परम्परा की संक्षिप्त रूपरेखा भी प्रस्तुत करते हैं।
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