विद्रोही पीढ़ी - rebel generation

समकालीन कविता के लगभग सारे ही आन्दोलनों के मूल में विद्रोह, नकार, निषेध और आक्रोश का भाव विद्यमान रहा । सन् साठ के बाद लिखी गई कविता के बीज कहीं न कहीं नयी कविता के अन्तर्गत देखे जा सकते हैं। यह सत्य है कि साठोत्तर में उदित कविता नयी कविता की-सी नहीं है किन्तु वह नयी कविता की विरोधी भी नहीं है।


इस समय काव्यान्दोलन के क्षेत्र में एक बाढ़-सी आ गई। यत्र-तत्र सर्वत्र काव्य-क्षेत्र में नये-नये नाम जारी किए जाने लगे। इनमें कुछ काव्यान्दोलन इतिहास पर अपनी छाप छोड़ गए तो कुछ समय की आँधी में विलुप्त हो गए।

अच्छे-बुरे चाहे जिस अर्थ में लीजिए, समकालीन कविता में बीट पीढ़ी का उदय महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। इन कवियों का निषेध, इनके भूखेपन का विरोध करते हुए कई काव्यान्दोलनों ने समकालीन कविता में जन्म लिया बीटनिकों के आक्रोश, विरोध और विद्रोह से स्वयं को अलगाने की होड़-सी लगी थी। इसी क्रम में कवि केशनी प्रसाद चौरसिया ने इलाहाबाद से समविचारी सात कवियों को लेकर 'विद्रोही पीढ़ी' नामक एक संकलन प्रकाशित किया। बीटनिकों का हिप्पीयन, यौन विकृतियाँ, समसामयिक परिस्थितियों के प्रति वितृष्णा का भाव और उस वितृष्णा की अभिव्यक्ति के लिए अपनायी गई यौन विकृति से भरपूर,

बीभत्स शब्दावली से स्वयं को भिन्न सिद्ध करने का प्रयास केशनी प्रसाद चौरसिया ने किया था । किन्तु जैसा कि जगदीश गुप्त ने 'किसिम-किसिम की कविता' में स्पष्ट किया है, "केशनी प्रसाद का 'विद्रोही पीढ़ी के प्रकाशन का प्रयास मात्र 'यौन विकृति से बजबजाती नंगी भूखी शब्दावली की व्यावहारिक संस्तुति' थी।" विद्रोह की ठोस और सार्थक भूमिका को अपनाने की अपेक्षा विद्रोही पीढ़ी के कवियों की लेखनी यौन क्षेत्र में आक्रामक शब्दावली का प्रयोग करने तक ही सीमित रही। 'विद्रोही पीढ़ी' के कवियों ने विशेषतः केशनी प्रसाद चौरसिया ने विद्रोह की दिशा को स्पष्ट करते हुए अमेरिका के बीट कवियों में पाए जाने वाले विद्रोह को केवल एक दिखावा कहा। मात्र इतना ही नहीं, अमेरिका से आयी इस बीट प्रवृत्ति और उसमें निहित विद्रोह की कड़ी निन्दा भी की।


विद्रोही पीढ़ी का यह स्टैंड अपने बाह्यावरण में निश्चित रूप से सकारात्मक और आशादायी प्रतीत होता है । किन्तु समय के अन्तराल में स्वयं 'विद्रोही पीढ़ी' ने भी उसी बीटनिक स्वर को अपनाया जिसके विरोध में वह खड़ी थी। इनके विद्रोह में कोई नयापन दृष्टिगोचर नहीं हुआ या कोई ऐसी विशेषता उभरकर नहीं आई जो इन्हें बीटनिकों के विद्रोह से अलगाए। इसी बात पर व्यंग्य करते हुए डॉ. जगदीश गुप्त लिखते हैं- "इसमें भी वही शमशेरी वृत्ति दिखाई देती है जिसमें रूसी प्रगतिशीलता और अमरीकी बीटनिकता एक साथ निर्विरोध स्थित मिलती है। सहअस्तित्व के सिद्धान्त का भारतीय राजनीति में नहीं साहित्य में भी मजे से पालन हो रहा है।

'जान' 'भी और 'जाज़ोमेनिया' भी । जिन्सबर्ग भी और येन्तुशेंको भी । "3 इस समय इस बात को नजरंदाज कर दिया गया कि "आक्रोश का ठीक पात्र ढूँढना विद्रोह की पहली जिम्मेदारी होती है।" इसी बात की उपेक्षा करने के कारण विद्रोही कविता दिशाहारा-सी प्रतीत होती है। बीटनिकों का विरोध करने के साथ-साथ अपना विद्रोह सही फॉर्म में दर्ज किया जाता तो सम्भवतः यह एक सफल आन्दोलन सिद्ध होता। डॉ० रमानाथ त्रिपाठी ने 'वातायन' मार्च 66 के अंक में बीटनिकों के विरोध की भूमिका लिखी "लगता है इनकी भूख सेक्स और आत्मप्रचार की है। - वासना के प्रबल आवेग के समय नारी अंगों के साथ जो उखाड़-पछाड करने की तीव्र असह्य एवं कष्टदायक लालसा जागती है उसी का सत्य (टू) वर्णन अधिकांशत: भूखी कविता का सत्यवाद रह गया है।

चूँकि अमेरिकन बीटनिक प्रतिष्ठित जनों के शिष्ट आचार को ऊपर की नकाब कहकर उसका विरोध करता है अतएव भूखे लोगों ने भी कुछ वयोवृद्ध लोगों के पास मुखौटे भेजे थे कि लत जीवन-मूल्यों का नकाब उतार फेंको, जीवन-मूल्यों का निर्धारण क्या इन आचारहीन विक्षिप्तों के द्वारा होगा ?"32


बहरहाल, प्रतिक्रियात्मक परिस्थितियों और बाद से मुक्त होकर समकालीन कविता में विद्रोह बलवान् होकर उभर रहा था। वर्तमान परिस्थितियों से असंतुष्ट कवि-गण अपनी लेखनी के माध्यम से विद्रोह और विरोधी भावनाओं को दर्ज करने से नहीं चूक रहे थे।

विद्रोह की भिन्न-भिन्न स्थितियों को शब्दबद्ध करनेवाले कवियों में लीलाधर जगूड़ी, रमेशचन्द्र शाह, वेणु गोपाल, कुमार विकल, रमेश गौड़, श्रीराम वर्मा, ज्ञानेन्द्रपति जैसे कवि अग्रणी रहे।


राजीव शुक्ला 'रेबेल्स इन हिन्दी पोएट्री, न्यूवेव', (11 जून 1972) में लिखते हैं कि "रमेश गौड़ को उन विद्रोही युवा कवियों की कतार में रखना उचित है जो सोचते हैं कि आम जनता की विद्रोह चेतना के असमान और धीमे विकास के कारण आज की विद्रोही पीढ़ी को हार कर एक कटुता के साथ ही अपनी मौत स्वीकार करनी होगी और शायद इतिहास में इसका जिक्र एक व्यर्थ खोई हुई पीढ़ी के रूप में ही हो।

इसी संभावित व्यर्थता की निराशा ने इन कवियों के विद्रोही स्वर को अपनी शहादत के ढोल की आवाज़ में बदल दिया है। शहादत के 7*33 ढोल में ढलने के बावजूद विद्रोही कवि का स्वर अपनी जगह महत्त्वपूर्ण ही मानना होगा। 


रमेश गौड़ जैसे कवि ने अपनी विद्रोही अभिव्यक्ति जबरदस्त पद्धत्ति से दी है। एक बानगी देखिए-


मुझे खुद में अपने ही हाथों से चाबी भर


अपनी ही मेज पर खुद को नचाना है। (खुश होकर पीटनी है तालियाँ) चौराहे से चारों ओर फूटती सड़कों पर मुझे एक साथ जाना है और फिर (सब लोगों के होते हुए) मुझे, हाँ सिर्फ़ मुझे ही चक्रव्यूह ढहाना है क्योंकि यह जीने की अनिवार्य शर्त है। 34


व्यवस्था से असंतुष्ट इस समय के कवियों ने विद्रोह को अपनी लेखनी का स्थायी भाव बना लिया । नामकरण करने में समय गँवाने की अपेक्षा यह कवि विद्रोहाभिव्यक्ति की परम्परा जारी रखते हैं। इलाहाबाद से प्रकाशित 'विद्रोही पीढ़ी' के बैनर तले विद्रोही भाव की कविता रचने की घोषणा की गई किन्तु बीटनिक विरोधी भूमिका एकमात्र अजेंडा बनाने के कारण वह अल्पायु ही सिद्ध हुई किन्तु विद्रोह का सकारात्मक रूप अपनाकर व्यवस्था से टक्कर लेने वाली विद्रोही कविता की परम्परा न केवल जीवित है बल्कि दनदनाती हुई आगे बढ़ रही है।