लघुमानव की प्रतिष्ठा - reputation of miniman
संवेदना-पक्ष और शिल्प-पक्ष दोनों ही दृष्टियों से नयी कविता हिन्दी की समकालीन कविता में अपना महत्त्व रखती है। नयी कविता के अन्तर्गत 'नये भाव बोधों की अभिव्यक्ति के साथ ही नये मूल्यों और नये शिल्प 'विधानों का अन्वेषण' किया गया। भले ही इस काव्य प्रवृत्ति के मूल में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की प्रेरणा विद्यमान हो, इस कविता ने अपना विशिष्ट स्थान निर्माण किया और कुछ ऐसे सिद्धान्त सारस्वत जगत् को दिए जिनका महत्त्व निर्विवाद है। जीवन के प्रति आस्थावान् यह कविता क्षणवाद में विश्वास करती है। जीवन की ओर देखने की दृष्टि में क्वचित निराशा और अनास्था भले ही उभरे लेकिन मूलतः नयी कविता की स्थायी दृष्टि आस्थावादी, सकारात्मक और स्वीकारवादी रही है।
जीवन को भरपूर रूप से जीने की आकांक्षा के कारण ही नयी कविता क्षणवादी दृष्टिकोण अपनाती है। क्षणों की अनुभूतियाँ समग्र जीवन की अनुभूतियों को भोगने की दृष्टि से पूरक सिद्ध हुआ करती हैं। क्षण-क्षण को महत्त्वपूर्ण और सत्य मान लेने से आपाततः समग्र जीवन को उसकी प्रत्येक अनुभूति को, सुख-दुःख को सत्य मानकर सघन रूप से जीने की प्रवृत्ति बलवती होती है।
क्षणवादी प्रवृत्ति में जीवन के प्रति जो स्वागतार्ह दृष्टिकोण है, उसी की अगली कड़ी के रूप में नयी कविता के अन्तर्गत लघुमानव की सत्ता महत्ता को स्वीकारा गया।
लघुमानव को प्रतिष्ठित करने के पीछे भी जीवन को पूर्णता प्रदान करने की भावना ही कार्यरत रही। नयी कविता के उन्नायकों ने लघुमानव की संकल्पना को यथाविस्तार स्पष्ट किया है। लघुमानव से उनका तात्पर्य है - "वह सामान्य मनुष्य जो अपनी सारी संवेदना, भूख- प्यास और मानसिक आँच को लिये दिये उपेक्षित था। इस लघुमानव का अर्थ यदि मनुष्य की लघुता को खोज- खोजकर सत्य रूप में उसकी प्रतिष्ठा करने से है, तो निश्चय ही यह अतिवादी, प्रतिक्रियावादी और असत्य जीवन- दृष्टि हैं। स्वस्थ नयी कविता ने कभी भी इस अर्थ को स्वीकार नहीं किया ।" नयी कविता में लघुमानव की संकल्पना को बहुत ही अलग रूप में ग्रहण किया गया।
इस संकल्पना के प्रतिपादन में डॉ. लक्ष्मीकान्त वर्मा और विजयदेव नारायण साही का योगदान निश्चित रूप से उल्लेखनीय है । लक्ष्मीकान्त वर्मा ने 'नयी कविता के प्रतिमान' में लघुमानव का सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे उन्होंने 1967 में 'कल्पना' की लेखमाला में भी दोहराया। लक्ष्मीकान्त वर्मा नयी कविता के ऐसे हस्ताक्षर हैं जो यथार्थवाद और प्रगतिवाद दोनों की निन्दा करते हैं। उन्होंने नयी कविता को लघुमानव के लघु परिवेश की अभिव्यक्ति बताया। उनका लघुमानव व्यक्ति मानव है। उनका कहना था कि व्यक्ति और समाज परस्परविरोधी हैं। वे स्वयं को व्यापक मानवता के प्रति आस्थावान् बताकर बार-बार मानवतावाद की चर्चा करते हैं। लघुमानव का सिद्धान्त इसी मानववाद पर आधारित है।
लक्ष्मीकान्त वर्मा लघुमानव के रूप से एक ऐसे मनुष्य की परिकल्पना करते हैं जो सारी व्यवस्था के सामने छोटा होते हुए भी अपनी स्वतन्त्रता और विवेक का स्वयं नियन्ता है। ऐसे मनुष्य की कुछ विशेषताओं का संकेत लक्ष्मीकान्त वर्मा इस प्रकार देते हैं-
1. लघुमानव के लघु परिवेश की बात इन कुण्ठाओं से पृथक् है और मानवानुभूति और मानव सार्थकता के
महत्त्व से सम्बद्ध है।
2. लघुमानव का परिवेश अनुभूति की गहराई और विवेक की मर्यादा से प्रशासित होता है।
3. भविष्य के प्रति वह अपनी आस्था तो रखता ही है किन्तु लघु परिवेश की सार्थकता के साथ ।
4. उसकी अभिव्यक्ति में यह विश्वास भी निहित है कि उसका भावबोध किसी पूर्व निश्चित नियतिवाद या चमत्कार से प्रभावित नहीं।
5. स्वतन्त्रता की कोई और परिभाषा बिना इस मानवीय स्तर के अर्थात् लघु मानव और लघु परिवेश के पूरी
नहीं होती।
6. वह जीवन क्रियाशील के (या क्रियाशील जीवन के) उस रूप को चाहता है, जिसमें समग्रता हो, संकीर्णता न हो ।
7. जीवन की समग्रता का व्यावहारिक रूप एक-दूसरे को सहन करने में है न कि उस अव्यावहारिक आधिपत्य में,
जिसके विरोधों का नाश करके केवल एक सतारूढ़ व्यक्ति के प्रति समस्त चेतना अर्पित की जाए।"39 लघुमानव सम्बन्धी नयी कविता में चल रहे चिन्तन को लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध ने कहा कि लघुमानव व्यक्तिवाद का सगा भाई है क्योंकि यह समाज और सामाजिक चेतना से आतंकित है और व्यक्ति सत्ता में ही अपनी अद्वितीयता को खोजता और पाता है। वे लघुमानव की संकल्पना को ही शीतयुद्ध की साम्राज्यवादी विचारधारा की व्युत्पति मानते हैं। लघुमानव के सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक परिवर्तन के सारे प्रयत्न व्यर्थ हैं, मानव मुक्ति के सारे लक्ष्य निरर्थक हैं।
मुक्तिबोध को लगता है। कि दुःख की स्थिति को प्राकृतिक देन की भाँति स्थायी मान लेने के बाद उसे दूर करने के सारे प्रयास स्वाभाविक रूप से व्यर्थ ही लगेंगे। उनके मतानुसार लघुमानववाद को स्वीकारने का अर्थ है पूँजीवादी समाज व्यवस्था को ध्वस्त कर एक शोषणमुक्त समाज व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा और प्रयास से मुँह फेरा जाए। इसी कारण मुक्तिबोध ने लिखा है "यह मुख्यतः मानव-मुक्तिवादी विचारधाराओं के विरुद्ध है, इसकी तीखी नोक खासकर साम्यवादी धारणाओं के विरुद्ध है, क्योंकि साम्यवादी धारणाओं में यह बताया गया है कि मनुष्य चाहे तो अपना भाग्य परिवर्तन कर सकता है। "40
लघुमानव की संकल्पना को मुक्तिबोध ने जिस रूप में ग्रहण किया, उस रूप में उन्हें यह कदापि स्वीकारणीय नहीं लगा। उनका मानना था कि दुःख के स्थायित्व,
लघुत्व की मूल स्थिति तथा उच्चतर गुणों के माया स्वप्नत्व का पाठ पढ़ाकर मनुष्य को मानव सत्ता के उच्चतर रूपान्तर के कार्यों और कार्यक्रम से अलग करना ही लघुमानव के सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य है। अतः जहाँ लक्ष्मीकान्त वर्मा और विजयदेव नारायण साही जैसे लेखक लघुमानव की संकल्पना को आगे बढ़ाते हैं, वहीं मुक्तिबोध इसे नकारवादी, निराशावादी और प्रतिक्रियावादी मानते हैं।
जैसे आरम्भ में संकेत दिए गए हैं, डॉ० नगेन्द्र जैसे लोग लघुमानव का अर्थ मनुष्य की लघुता को खोज- खोजकर, सत्य रूप में उसकी प्रतिष्ठा करने जैसी स्थिति को अत्यन्त हीन बताते हैं ।
स्वीकृत अस्वीकृत की सीमारेखा पर आलोचकों में लघुमानव को लेकर चाहे जितनी बहस छिड़ती हो, यह सत्य है कि नयी कविता ने लघुमानव के अस्तित्व को न केवल स्वीकारा बल्कि प्रतिष्ठित भी किया। इस सन्दर्भ में, रघुवीर सहाय जैसे कवियों ने मानव की लघुता और गरिमा का एकसाथ गौरव करते हुए लिखा है "इस गरम सुबह, तपती दुपहर में निकल पड़े, श्रमजीवी धरती के प्यारे।"
नये कवियों ने लघुमानव को गरिमापूर्ण पद्धत्ति से प्रतिष्ठित कर उसे समसामयिक सन्दर्भों से संलग्न किया। लक्ष्मीकान्त वर्मा कहते हैं- "यह लघु मानव आडम्बरयुक्त विश्वबन्धुत्व से कहीं अधिक समसामयिक दायित्व को महत्त्वपूर्ण समझता है ... लघुता का परिवेश और उसका सन्दर्भ जाग्रत् क्षण में पूर्ण है
जो उसे संवेदना देता है और उस संवेदना के साथ-साथ उसे सन्दर्भ के प्रति गतिशील बनाता है और उसकी अनुभूति को प्रभावित करके जीवन की सक्रिय प्रस्तुति करता है।"41 विजयदेव नारायण साही ने भी 'लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर बातचीत' जैसा लेख लिखकर वर्माजी के मत को पुष्टि प्रदान की। यह लेख अत्यधिक विवादास्पद रहा। कुछ मान्यवर लघुमानव को नियतिशरण तो कुछ उसे सामयिक सन्दर्भों में जाग्रत बताकर अपने-अपने विचारों का प्रतिपादन करते रहे। 'लघुमानव' शब्द को लेकर ऐसे विवाद समकालीन कविता में बार-बार उठे। डॉ० रमाशंकर तिवारी ने अपनी पुस्तक 'प्रयोगवादी काव्यधारा' में लघु को महत् का विरोध सिद्ध कर अपनी आपत्ति जतायी। दूसरी ओर जगदीश गुप्त भी इस खतरे की ओर अंगुलिनिर्देश करते हैं कि यदि उत्साहवश लघुमानव की स्थापना में लगे रहे तो यह भ्रम पैदा हो जाएगा कि हम मानव व्यक्तित्व को अनिवार्यतः लघु मानते हैं।
पश्चात् वे लघुमानव के सन्दर्भ में अपनी संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहते हैं "नया मनुष्य रूढ़िग्रस्त चेतना से मुक्त, मानव मूल्यों के रूप में स्वातन्त्र्य के प्रति सजग, अपने भीतर, अनारोपित सामाजिक दायित्व का स्वयं अनुभव करने वाला, समाज को समस्त मानवता के हित में परिवर्तित करके नया रूप देने के लिए कृत संकल्प, कुटिल स्वार्थ भावना से विरत, मानव मात्र के प्रति स्वाभाविक सहअनुभूति से युक्त संकीर्णताओं और कृत्रिम विभाजनों के प्रति क्षोभ का अनुभव करनेवाला हर मनुष्य को जन्मतः समान मानने वाला, मानव व्यक्तित्व को उपेक्षित, निरर्थक और नगण्य सिद्ध करने वाली किसी भी दैविक शक्ति या राजनैतिक सत्ता के आगे अनवनत, मनुष्य की अन्तरंग सद्वृत्ति के प्रति आस्थावान, प्रत्येक व्यक्ति के स्वाभिमान के प्रति सजग, दृढ़ एवं संगठित अन्तःकरण संयुक्त सक्रिय किन्तु अपीड़क, सत्यनिष्ठ तथा विवेकसम्पन्न होगा ।"2 इस समय लिखी गई कई रचनाओं में ऐसा ही मानव रूप उभरकर आया। उदाहरणस्वरूप कुछ कवितांश प्रस्तुत हैं -
किसी भी साम्राज्य से बड़ा है
एक बन्धु
एक अनाम मनुष्य !!
मुझे मनुष्य में विराजे देवता में
सदा विश्वास रहा है। 13
या जैसा कि धर्मवीर भारती अपने 'अन्धा युग' में स्पष्ट करते हैं- -
जब कोई भी मनुष्य
उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।
अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को नियति नहीं है पूर्वनिर्धारित- उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनाता मिटाता है। 4
इन सबसे बढ़कर कवियों द्वारा मानव के प्रति व्यक्त हुआ यह भाव असाधारण महत्त्वपूर्ण है-
कितने ही लघु हों
इससे क्या ?
सार्थक हैं।
स्वत्व है हमारा
कर्म
हमारी जलती हुई आँखों में बँधी हुई मुट्ठी में भिंचे हुए ओठों
इन यात्रित पैरों में संकल्पित प्रज्ञा है ।
वर्चस्वी निष्ठा है। हम केवल चलते हैं
उत्सर्गित इच्छा है।
अपने में अपने से बाहर
धूप और अन्धकार चीरे हम चलते हैं 45
लघुमानव अपने अस्तित्व का वाहक है किन्तु समष्टिवाद का विरोधक नहीं। उसका संघर्ष सामाजिकता से नहीं, समाज में व्याप्त मूल्यहीनता से है। वह इस बात में विश्वास करता है कि इकाई की अस्मिता सामाजिक की अस्मिता से कम महत्त्वपूर्ण नहीं। आत्महीनता को अनुभव किये बिना, सम्पूर्ण विवेक के साथ संकटों से जूझने के लिए तत्पर लघुमानव को नयी कविता ने अत्यधिक गर्व के साथ प्रतिष्ठापित किया।
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