आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समीक्षा-सिद्धान्त - Review theory of Acharya Ramchandra Shukla
साहित्य-सिद्धान्त साहित्यकार के जीवन-दर्शन से अनुप्रेरित होता है। आचार्य शुक्ल के साहित्य-चिन्तन की पृष्ठभूमि में भारतीय दर्शन की भाववादी परम्परा है। लेकिन उन्होंने संस्कृत साहित्य और हिन्दी काव्य का गहन अनुशीलन करने के साथ-साथ समकालीन ज्ञान-विज्ञान और यथार्थ चेतना का अवगाहन भी गम्भीरता से किया। इस प्रक्रिया में अर्जित विवेक के आधार पर उन्होंने हिन्दी आलोचना को मनुष्य जीवन के बुनियादी सरोकारों के साथ जोड़ा और आलोचना का एक सुव्यवस्थित ढाँचा खड़ा किया। शुक्ल जी का वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनकी लोकवादी चेतना के साथ मिलकर व्यापक मानवीय सन्दर्भों में साहित्य की व्याख्या करता है और इसी आलोक में उनकी आलोचना भाववादी सीमाएँ लाँघकर वस्तुवाद की दिशा में आगे बढ़ती है।
रस और रसानुभूति का स्वरूप
आचार्य शुक्ल रस को काव्य की आत्मा मानते हैं। उनका साहित्य-सिद्धान्त रसवाद है। लेकिन यह रसवाद प्राचीन और मध्यकालीन रसवाद से बहुत अलग है। परम्परागत रूप से रस की अनुभूति को एक अलौकिक वस्तु माना जाता था। शुक्ल जी ने इस मान्यता का खण्डन किया और स्पष्ट किया कि "रसानुभूति प्रत्यक्ष या वास्तविक अनुभूति से पृथक् कोई अन्तर्वृत्ति नहीं है, बल्कि उसी का एक उदात्त और अवदात्त स्वरूप है । हमारे यहाँ के आचार्यों ने स्पष्ट सूचित कर दिया है कि वासना रूप में स्थित भाव ही रसरूप में जगा करते हैं। यह वासना या संस्कार वंशानुक्रम से चली आती हुई दीर्घ भावपरम्परा का मनुष्य जाति की अन्तः प्रकृति में निहित संचय है।" (- 'रसात्मक-बोध के विविध रूप', चिन्तामणि, पहला भाग) शुक्ल जी के अनुसार रसानुभूति की अवस्था में हम अपनी अनुभूति को लोक की अनुभूति से मिला देते हैं।
लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम ही रस- दशा है। यह रसदशा मनुष्य के हृदय को स्वार्थमुक्त कर देती है और साहित्य की सार्थकता इस कार्य के सफलतापूर्वक निष्पादन में है। उनके अनुसार जीवनानुभूति ही रसानुभूति है। रस की यह व्याख्या साहित्य और जीवन को आपस में जोड़ती है। शुक्ल जी रस के अनुभूति पक्ष के साथ-साथ सहृदय पर पड़ने वाले प्रभाव का विवेचन भी करते हैं।
शुक्ल जी ने भरत के रस निष्पत्ति सिद्धान्त को ग्रहण किया, लेकिन संस्कृत आचार्यों की रस सम्बन्धी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया।
इन आचार्यों ने रस को आनन्दस्वरूप माना है। शुक्ल जी के अनुसार रस आनन्द भी देता है लेकिन इस आनन्द को काव्य का चरम लक्ष्य स्वीकार कर लेने से काव्य का उद्देश्य आनन्द प्राप्त करना मात्र हो जाता है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार यह जगत् अनेक रूपात्मक है उसी प्रकार मनुष्य का हृदय भी अनेक भावात्मक है। संसार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी रूपों और क्रिया व्यापारों को मनुष्य के भावों में मार्मिक रूप से अभिव्यक्त करना ही काव्य का प्रयोजन है। उन्होंने लिखा है कि "कवि-वाणी के प्रसार से हम संसार के सुख दुःख, आनन्द-क्लेश आदि का शुद्ध स्वार्थमुक्त रूप में अनुभव करते हैं। इस प्रकार के अनुभव के अभ्यास से हृदय का बन्धन खुलता है और मनुष्यता की उच्च भूमि की प्राप्ति होती है।" (- 'कविता क्या है ?') इसलिए काव्य में आनन्द ही नहीं मनुष्य के सभी भावों का जगत् के विभिन्न रूपों और क्रिया व्यापारों के साथ सामंजस्य होता है।
शुक्ल जी के अनुसार कविता से प्राप्त रस को लोकोत्तर आनन्द कहने से भी रस की सही व्याख्या नहीं होती है, क्योंकि कविता से मनुष्य के हृदय में क्रोध, भय, शोक, जुगुप्सा, करुणा आदि भाव भी उत्पन्न होते हैं जिनकी अनुभूति आनन्ददायी नहीं हो सकती, दुःखात्मक ही होती है। शुक्ल जी का स्पष्ट मत है कि इन भावों को "लोक से सम्बद्ध देखेंगे तब हम रसभूमि की सीमा में पहुँचे रहेंगे।" ( - 'रस मीमांसा')
आचार्य शुक्ल के अनुसार काव्य और जीवन के भावों में कोई मौलिक अन्तर नहीं होता है, इसलिए रस की न तो अलौकिक सत्ता है और न ही उससे किसी लोकोत्तर आनन्द की सृष्टि होती है। अपने निबन्ध 'काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था' (- 'चिन्तामणि',
पहला भाग) में कवियों द्वारा कर्म-सौन्दर्य के कठोर और तीक्ष्ण पक्ष की उपेक्षा करके केवल कोमल और मधुर पक्ष को ही काव्य का विषय बनाए जाने की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है कि "काव्य का उत्कर्ष केवल प्रेम भाव की कोमल व्यंजना में ही नहीं माना जा सकता जैसा कि टॉलस्टाय के अनुयायी या कुछ कलावादी कहते हैं। क्रोध आदि उग्र और प्रचण्ड भावों के विधान में भी, यदि उनकी तह में करुण भाव अव्यक्त रूप में स्थित हो, तो पूर्ण सौन्दर्य का साक्षात्कार होता है।" शुक्ल जी ने अपने साहित्य-चिन्तन में सिद्ध किया है कि मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। मनुष्य के भावों की वस्तुगत सत्ता होती है और भावों को कर्म से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए स्थायी भावों को रस रूप में प्रकट करना ही साहित्यिक क्रिया की पूर्णता नहीं है, बल्कि उन भावों के कर्म में प्रवृत्त होने पर ही रस - निष्पत्ति मानी जा सकती है।
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