नन्ददुलारे वाजपेयी की भारतीय काव्यशास्त्र का नवनिर्माण - Revival of Indian poetry by Nanddulare Vajpayee

वाजपेयी जी 'रस' को भारतीय काव्यशास्त्र का अन्तरंग सत्व, 'अलंकार' को रस-सिद्धि का साधनमात्र, तथा 'वक्रोक्ति', 'रीति' और 'ध्वनि' को काव्य के अभिव्यंजना पक्ष के उपकरण मानते हैं। वे भारतीय काव्यशास्त्र के नवनिर्माण के उद्देश्य से इन प्राचीन मान्यताओं को आधुनिक दृष्टि से व्यापक रूप प्रदान करना चाहते हैं। इसके लिए वे काव्यशास्त्र के क्षेत्र में हो रहे भारतीय औरर पाश्चात्य आधुनिक चिन्तन का सन्तुलित उपयोग करना ही उचित समझते हैं। उन्होंने इसमें 'युग-विशेष की प्रमुख सामाजिक और सांस्कृतिक धाराओं के विवरण तथा 'मुख्य विषय के साथ कला और साहित्य के क्षेत्र में होने वाले तत्कालीन सृजन कार्यों' के परिचय को शामिल करने की आवश्यकता बतायी है।


वाजपेयी जी ने रस को काव्य की मूलभूत वस्तु तो माना, लेकिन उसके अलौकिक स्वरूप या ब्रह्मानन्दसहोदर रूप से अपनी असहमति प्रकट की। उन्होंने कहा है रसानुभूति सम्बन्धी अलौकिकता के पाखण्ड से काव्य का अनिष्ट ही हुआ है। उन्होंने रस के सम्बन्ध में एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की बात पर बल दिया हैं ।


वाजपेयी जी ने आचार्य शुक्ल की आलोचना में नवीन युग की सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलता के विवेचन का अभाव देखा है और उसे काव्य के विवेचन की दृष्टि से अनुपयुक्त बताया है।

शुक्ल जी के विपरीत उन्होंने अपने प्रतिमान प्रबन्ध-काव्य के स्थान पर प्रसाद और निराला के प्रगीत-काव्य के आधार पर निर्मित किए हैं। अपनी पुस्तक 'नया साहित्य : नये प्रश्न' में 'नवागत के ग्रहण' के सन्दर्भ में अपनी दृष्टि की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है कि "प्रसाद के 'आँसू' की मार्मिक पंक्तियाँ, निराला की 'तुम और मैं', 'जूही की कली' और अनेक रचनाएँ तथा 'पल्लव' के बहुत से प्रगीत विशिष्टता का प्रतिमान बनकर आए थे। मेरा कार्य केवल विवेचन और व्याख्या करना था। "