आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का रीतिकाव्य और सामन्तवाद-विरोध - Ritikavya and anti-feudalism of Acharya Ramchandra Shukla
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में रीतिकाल और रीतिकालीन कवियों पर विस्तार से विचार किया है। अन्य निबन्धों में भी प्रसंगवश उन्होंने रीतिकालीन कविता पर अपना पूर्वाग्रह रहित मत प्रकट किया है। रीतिकालीन कवियों के काव्य की विषयवस्तु राजदरबारों और सामन्ती संस्कृति से आयी है और उसी का गुणगान करती है। शुक्ल जी ने इस दरबारीपन पर प्रहार करते हुए लिखा है कि "हिन्दी के रीतिकाल के कवि तो मानो राजाओं-महाराजाओं की कामवासना उत्तेजित करने के लिए ही रखे जाते थे। एक प्रकार के कविराज तो रईसों के मुँह में मकरध्वज रस झोंकते थे, दूसरे प्रकार के कविराज कान में मकरध्वज रस की पिचकारी देते थे, पीछे से तो ग्रीष्मोपचार आदि के नुसखे भी कवि तैयार करने लगे।" (- 'कविता क्या है ?', चिन्तामणि, पहला भाग)
सामन्तवाद का विरोध शुक्ल जी के साहित्य-चिन्तन का एक मुख्य पहलू है। रहस्यवादी कविता का विरोधी होते हुए भी उन्होंने भक्ति काव्य की प्रशंसा की है, क्योंकि वे मानते थे कि भक्ति का काव्य-प्रवाह जनता के बीच से फूटा था, सामन्तों के बीच से नहीं। उन्होंने रीतिकाव्य को पतनशील काव्य कहकर उसकी कड़ी आलोचना की है। भक्ति-काव्य में अन्तर्निहित सामन्तवाद विरोधी प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए लिखा है कि "सूर और तुलसी आदिस्वच्छन्द कवियों ने हिन्दी कविता को उठाकर खड़ा ही किया था कि रीतिकाल के शृंगारी कवियों ने उसके पैर छानकर उसे गंदी नालियों में भटकने के लिए छोड़ दिया।" (- 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र', चिन्तामणि, पहला भाग) कविता की इस दुर्दशा का कारण कवियों के आश्रयदाता राजा-महाराजाओं की कुत्सित प्रवृत्ति था,
जिनके जीवन में कर्मण्यता और वीरता समाप्त हो गई थी जबकि जनता की रुचि इस कविता में बिलकुल नहीं थी ।
शुक्ल जी ने कविता में कृत्रिमता और चमत्कार प्रदर्शन का विरोध किया है। रीतिकालीन कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए मर्यादाहीन शृंगार-वर्णन करने की आलोचना शुक्ल जी ने कई जगह की है। कविता में कुतूहल और चमत्कार पैदा करने के लिए केशव, बिहारी आदि कवियों द्वारा शब्द-क्रीड़ा करते हुए भाषा को दुरूह बनाने की आलोचना भी शुक्ल जी ने की है।
चमत्कार प्रदर्शन के लिए अलंकारों की झड़ी लगाना, कहावतों और मुहावरों का अवांच्छित प्रयोग तथा कविता में आचार्यत्व के प्रदर्शन को शुक्ल जीसामन्ती संस्कृति का ही प्रभाव और लक्षण मानते हैं। रीतिकालीन काव्य के मूल्यांकन में शुक्ल जी ने काव्य की विषयवस्तु और कलात्मक सौन्दर्य, दोनों पक्षों का पूरा ध्यान रखा है। जहाँ उन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण कविता दृष्टिगत हुई उन्होंने उसे रेखांकित किया है। मतिराम के काव्य में स्वाभाविक सरसता है, लेकिन अनावश्यक शब्दाडम्बर नहीं है। शुक्ल जी ने इसे उनकी काव्य-शैली का गुण बताया है तथा मतिराम की बाधा का संकेत करते हुए उनकी प्रशंसा में अपने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है कि "इनका सच्चा कवि हृदय था।
ये यदि समय की प्रथा के अनुसार रीति की बँधी लीकों पर चलाने के लिए विवश न होते, अपनी स्वाभाविक प्रेरणा के अनुसार चलते तो और भी स्वाभाविक और सच्ची भाव-विभूति दिखाते, इसमें कोई सन्देह नहीं ।" देव के बारे में शुक्ल जी का मत है कि उनमें कवि की प्रतिभा थी, परन्तु आचार्यत्व प्रदर्शन की लालसा और दरबारी रुचि ने उनकी प्रतिभा का विकास अवरुद्ध कर दिया था। शुक्ल जी ने पद्माकर में भी सहज कवि-प्रतिभा के लक्षण देखे और उनकी भाषा की लाक्षणिकता की सराहना की हैं। शुक्ल जी प्रेम को जीवनोत्सव के रूप में देखते हैं, सहसा उठ खड़े हुए तूफ़ान या विप्लव के रूप में नहीं। रीतिकाल के कवियों में जहाँ भी उन्होंने प्रेम के इस रूप की झलक देखी, उदारतापूर्वक उसकी प्रशंसा की है। घनानन्द द्वारा उन्मुक्त मन से किए गए प्रेम और विरह के चित्रण को शुक्ल जी ने इसीलिए पसंद किया है।
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