सहज कविता की पृष्ठभूमि - Sahaj Poetry Background

मार्च 1967 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय से डॉ० रवीन्द्र भ्रमर ने 'सहज कविता' का प्रवर्तन किया । अस्वाभाविकता के स्थान पर स्वाभाविकता, कृत्रिमता के स्थान पर सहजता को महत्त्व देते हुए 'अनपेक्षित मैनरिक्रम, कौशल की अतिशयता, निराशा-मृत्यु का हॉरर और पतनोन्मुख यौनाचार से कविता की मुक्ति पर बल दिया। सन् 1968 में रवीन्द्र भ्रमर ने 'सहज कविता' शीर्षक से काव्य-संकलन का प्रकाशन भी किया। 'सहज 'कविता' को लेकर भ्रमर के विचार अपने आप में काफी स्पष्ट थे "1960 के बाद एक वर्ग ने मैनरिज्म और क्राफ्टमनशिप को ही मूल लक्ष्य माना और हिन्दी कविता कुल मिलाकर टेढ़ी रेखाओं के व्यापार के रूप में सामने आयी। इसीलिए वह फैशन रही है और बहुत अर्थपूर्ण भी नहीं।

इस बीच जो नये नये नाम अथवा नारे सामने कविता के क्षेत्र में उछाले गए उनके मूल में स्वस्थ सृजन की प्रवृत्ति उतनी नहीं रही जितना कि उन नारों को उछालने वाले व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को प्रचारित करने का कौतुक । कविता के इन तथाकथित सूत्रधारों ने या तो मरे हुए विदेशी आन्दोलनों का आयात किया या फिर अनास्था और हीनतापूर्ण दलीलें पेश करके नयी पीढ़ी को गुमराह करने की साजिश की है। अहमन्यता, आत्महत्या, योनि और जंघाओं पर कविता लिखने की प्रेरणा दी है। अतएव आज कविता के नाम पर एक ओर तो कुण्ठाएँ और विकृतियाँ हैं और दूसरी ओर चमत्कार एवं अनुकरणात्मक प्रवृतियाँ, जिनके कुहासे में स्वस्थ कविता गुम है सहज कविता नये सिरे से कविता की खोज करना चाहती है... 'सहज कविता' अकृत्रिम जीवनबोध और अकृत्रिम कलारचना के क्षेत्र में नवीन प्रतिमान स्थापित करना चाहती है। 40