सहज कविता : तात्पर्य एवं स्वरूप - Sahaj Poetry: Meaning and Form

सहज कविता की स्थापना की पृष्ठभूमि उपर्युक्त कथन में स्पष्ट करने के पश्चात् रवीन्द्र भ्रमर ने 'सहज' शब्द और 'सहज कविता' की दृष्टि से अपेक्षित व महत्त्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "यह जो सहज की माँग है, सरलता या सुविधा की माँग नहीं है। इसे युग-जीवन की जटिलता और संघर्षों से पलायन मान लेने की धारणा पूर्वाग्रहयुक्त और अवैज्ञानिक होगी। रचनागत परिप्रेक्ष्य में सहज का दायित्व अनुभूति और अभिव्यक्ति की अनपेक्षित कृत्रिमताओं से बचने का दायित्व है जो अपने आप में कला साधना का प्रतिमान बनता है। प्रस्तुत सन्दर्भ में सहज शब्द का व्युत्पत्तिगत अर्थ लेना होगा।

'सहजायते इति सहजः' अर्थात् जो रचना यथार्थ अनुभूति संवेग के साथ वाणी के मूर्त माध्यम से जन्म लेती है वह सहज है। सहज की माँग व्यक्तिमूलक होते हुए भी समाज सापेक्ष है। ऐसी कोई भी अभिव्यक्ति अथवा भावसंरचना, जिससे मानव की आस्था और मर्यादा के विघटन का बोध होता है, असहज और अस्वाभाविक कही जाती है। जिसे सहज होना है, उसे सार्थक भी होना है। सहज कविता वस्तुतः कविता की दिशा में एक मंगलकारी प्रस्थान है ।... आज की विषम काव्य-परिस्थितियों में वह कविता की खोज मात्र है। सहज कविता विवेक और संतुलन बनाये रखने की माँग है... #41


यह कथन सहज कविता के लक्ष्यों का अधोरेखन करता है। जड़ मूल्यों और बेजान मर्यादाओं को समाप्त करने की बात करने वाली सहज कविता जीवन और समाज के प्रति प्रतिबद्धता का अनुभव करती है। अति मुक्त जुमलेबाज़ी के स्थान पर सहज कविता ने वैचारिक व सर्जनात्मक स्तर पर शिष्टता एवं अनुशासन की स्थापना को महत्त्व दिया। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी और रामधारीसिंह 'दिनकर' जैसे कई विद्वानों ने सहज कविता का स्वागत किया। पश्चात् हिन्दी कविता के क्षेत्र में 'सहज कविता' की बात उठती रही। सन् 1994 मैं डॉ. सुधेश ने 'सहज कविता' नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया।

इसमें डॉ. सुधेश ने पुनः कविता की सहजता पर विचार किया "सहज कविता में प्रतीक, बिम्ब, अप्रस्तुत विधान का समावेश स्वाभाविक रीति से होता है, पर ये कविता के साध्य न होकर अभिव्यंजना के माध्यम भर होते हैं। इन्हें कविता का पर्याय नहीं माना जा सकता । इन्हें कविता का पर्याय मानने से कृत्रिमता शुरू हो जाती है। "42 कविता के क्षेत्र में जिस प्रकार सपाटबयानी और अतिरिक्त गद्यात्मकता प्रचलित हुई थी, उसका सहज कविता अस्वीकार करती है। छन्द, लय, राग, तुक आदि के स्वीकार की ओर सहज कविता का स्वभाविक रुझान है।

कविता के वादों से सम्बद्ध होने के समय में भी केवल नवगीतों ने अपनी लोकप्रियता को बनाये रखा था।

सहज कविता की दृष्टि से इसका एक कारण नवगीतों की सहज सम्प्रेषणीयता और छन्द, लय, तुकों का स्वाभाविक निर्वाह है। नवगीत की इसी विशेषता का निर्वाह करने पर सहज कविता ने बल दिया। आर्थिक शोषण जैसी वस्तु को भी लयबद्ध अभिव्यक्ति प्रदान की-


आधी सदी काट दी उसने खाकर चना चबेना जी । मेहनत उसकी मौज तुम्हारी, यह सब और चलेना जी। 2


इस सन्दर्भ में 'सहज कविता' की सोच कुछ इस प्रकार है- "आज हिन्दी कविता की अलोकप्रियता का एक बड़ा कारण उसकी गद्यात्मकता है, ऐसी गद्यात्मकता जिसमें न गद्य की स्पष्टता और तार्किकता है और न कविता की लय और अभिव्यंजना की सहजता तथा सम्प्रेषणीयता ।... इसलिए मेरा विचार है कि आज हिन्दी में 'सहज कविता' की बड़ी आवश्यकता है अथवा कविता में सहजता अपेक्षित है। 4 सहजता के लिए आग्रही 'सहज कविता' व्यापक समर्थन के बावजूद उतनी ही असफल रही जितनी कि सहज कहानी ।