नन्ददुलारे वाजपेयी की आत्मानुभूति और काव्यानुभूति - Self-realization and poetry of Nanddulare Vajpayee

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी कवि की आत्म-प्रेरणा को ही काव्य की मुख्य प्रेरक शक्ति मानते हैं- "कवि के पूर्ण व्यक्तित्व का उत्सर्जन करने वाली आत्म-प्रेरणा ही काव्यानुभूति बनकर उस कल्पना व्यापार का संचालन करती है जिससे काव्य बनता है।" (- 'हिन्दी आलोचना के आधार स्तम्भ) वाजपेयी जी के अनुसार काव्य का प्रयोजन न तो मनोरंजन है और न ही सामाजिक विषमता से पलायन । यदि ऐसा होगा तो कवि को आत्मानुभूति के प्रकाशन का पूरा अवसर नहीं मिलेगा और उसकी रचना अपूर्ण और कमजोर रह जाएगी। क्योंकि "काव्यानुभूति स्वतः एक आत्मिक व्यापार है जिसे किसी भी दार्शनिक, राजनैतिक,

सामाजिक या साहित्यिक खण्ड-व्यापार या वाद से जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं समस्त साहित्य में इस अनुभूति या आत्मिक व्यापार का प्रसार रहता है । काव्य के अनन्त भेद हो सकते हैं, उसके निर्माण में असंख्य सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का योग हो सकता है, परन्तु उसका काव्यत्व तो उसकी सर्वसंवेद्य अनुभूति प्रवणता में ही रहेगा।" (- 'हिन्दी आलोचना के आधार स्तम्भ' )


आचार्य शुक्ल द्वारा राम के चरित्र में दिखाए गए शक्ति, सौन्दर्य और शील की पराकाष्ठा को ही बाद के कवियों और समीक्षकों द्वारा काव्य-चरित्रों के अनिवार्य गुण माने जाने को वाजपेयी जी एक भ्रान्ति मानते हैं और उसे कला की विवेचना में एक बाधा की तरह देखते हैं।

उनके अनुसार केवल शक्ति, सौन्दर्य या शील की पराकाष्ठा दिखाना किसी काव्य का लक्ष्य नहीं हो सकता। काव्य का लक्ष्य रस- विशेष की प्रतीति या अनुभूति उत्पन्न करना होता है।


वाजपेयी जी के अनुसार काव्य हमें अनुभूतिशील या भावनाशील तो बनाता ही है, परन्तु यह उसकी प्राथमिक प्रक्रिया है। उसका मुख्य कार्य मनुष्य को सचेतन बनाना है। इस कार्य को सही ढंग से सम्पन्न करने के लिए कवि को अपने युग की चेतना और प्रगति को समझना होता है, तभी वह श्रेष्ठ काव्य का सृजन कर पाता है। कवि की प्रतिभा और अध्ययन-परिश्रम के साथ-साथ उसे देश काल की परिस्थितियों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है।

युग-बोध को काव्य की मुख्य कसौटी मानते हुए वाजपेयी जी ने लिखा है कि "उच्च प्रशस्त कल्पनाएँ, परिश्रमलब्ध विद्या और काव्य योग्यता उच्च साहित्यसृष्टि की हेतु बन सकती हैं, किन्तु देश और काल की निहित शक्तियों से परिचित न होने से एक अंग फिर शून्य ही रहेगा। हमारी दार्शनिक या बौद्धिक शिक्षा तथा साधना भी काव्य के लिए अत्यन्त उपयोगिनी हो सकती हैं, किन्तु इससे भी साहित्य के चरम उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो सकती। इन सबकी सहायता से मूर्तिमती होने वाली जीवन सौन्दर्य की प्रतिमा ही प्रत्येक कवि की अपनी देन है। इसी से उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता और शताब्दियों तक स्थिर रहता है। इसके बिना कवि की वास्तविक सत्ता प्रकट नहीं होती।" (- 'हिन्दी आलोचना के आधार स्तम्भ' )