मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष - self struggle of liberation

 मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष - self struggle of liberation


डॉ. रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध के सम्पूर्ण साहित्य के अध्ययन के आधार पर उनका मूल्यांकन किया और अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनके अनुसार मुक्तिबोध स्वानुभूत सत्य को चित्रित करने पर अधिक जोर देते थे। वह मूलतः अपने संघर्ष, अपने अनुभवों और अपनी समस्याओं को ही कविता में चित्रित करते हैं। लेकिन आत्मकेन्द्रित होने पर भी उनकी दृष्टि में सामाजिक चिन्ता बराबर मौजूद रहती है। मुक्तिबोध के काव्य-कौशल के सम्बन्ध में डॉ. शर्मा का मत है कि उनकी कला निरन्तर विकसित होती रही है। उनकी रचनाओं के ढाँचे और काव्य-कौशल में बहुत विविधता है। उन्हें अद्भुत के चित्रण में सर्वाधिक सफलता मिली है। उनकी काव्य-कला का घनिष्ठ सम्बन्ध उनकी विचारधारा से है।


डॉ. शर्मा ने मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष के विभिन्न स्तरों को दिखाया है- “उनके आत्मसंघर्ष के अनेक स्तर हैं। एक स्तर है निम्न वर्ग की भूमि को छोड़कर सर्वहारा वर्ग से तादात्म्य स्थापित करने का दूसरा स्तर है मन के दुःस्वप्नों, पापबोध, मृत्युचिन्तन, असामान्य मानसिक स्थिति से निकलकर स्वयं को और संसार को वस्तुगत रूप से देखने का, तीसरा स्तर है अपनी काव्य-कला को निरन्तर विकसित करने का।" (- 'नयी कविता और अस्तित्ववाद') इस प्रकार "मुक्तिबोध का साहित्य उस व्यक्ति का साहित्य है, जो जीवन की अनिवार्य विशेषताओं के बीच निरन्तर अपने विवेक के अनुसार अपने व्यक्तित्व के निर्माण में प्रयत्नशील रहता है।" (- 'नयी कविता और अस्तित्ववाद')


डॉ. शर्मा के अनुसार मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष का कारण मध्यवर्ग की अपनी भूमि को छोड़ने की उनकी कठिनाई है। उनकी कविता में प्रकट वेदना का मुख्य स्रोत उनका आत्मकेन्द्रित व्यक्तित्व है। मुक्तिबोध के सामने अपने व्यक्तित्व के रूपान्तरण की समस्या है। व्यक्ति को केन्द्र बनाने के कारण वे आसानी से अस्तित्ववाद के • प्रभाव में आ जाते हैं। डॉ. शर्मा कहते हैं कि मुक्तिबोध में मार्क्सवाद के प्रति गहन आकर्षण था। लेकिन उसे पूरी तरह से स्वीकार न कर पाने की विवशता उनके आत्मसंघर्ष को तीव्र बना देती है। मार्क्सवादी विचारधारा उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न थी। वे कविता के लिए जीते थे और उनकी कविता की एक बुनियादी समस्या मार्क्सवाद से उनके व्यक्तित्व के सम्बन्ध की थी।


मुक्तिबोध प्रगतिवाद से असंतुष्ट थे और स्वयं को नयी कविता' का कवि मानते थे। डॉ० रामविलास शर्मा की मान्यता है कि मुक्तिबोध 'नयी कविता' के भीतर मार्क्सवाद से प्रभावित कवि हैं, इसलिए प्रगतिशील धारा के कवि हैं। रामविलास जी ने ही सर्वप्रथम यह बताया कि मुक्तिबोध समाजवाद की आवश्यकता समझते थे तथा मार्क्सवादी विचारधारा के नज़दीक होने के कारण उनमें जनता से लगाव था। समाजवाद के लिए संघर्ष की छटपटाहट मुक्तिबोध की कविताओं का केन्द्रीय तत्त्व है। डॉ. शर्मा ने मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय दिया है कि उन्होंने अपने समय के बुद्धिवादियों के अवसरवाद को पहचाना और साम्राज्यवाद के साथ मार्क्सवाद के सम्बन्धों को समझते हुए उनकी प्रगतिवाद विरोधी रचनाओं का खण्डन किया।

डॉ. शर्मा ने इस बात के लिए मुक्तिबोध की प्रशंसा की है कि स्वाधीनता आन्दोलन के प्रति उनका रुख सकारात्मक था और वे छायावादी साहित्य की गरिमा स्वीकार करते थे। मुक्तिबोध ने पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत समझौतापरस्त लोगों की कठोर आलोचना की है। उन्होंने जहाँ भी पूँजीवाद की आलोचना की है, वह मूल्यवान् है। डॉ. शर्मा विश्वासपूर्वक कहते हैं कि भावबोध की अस्थिरता और विचारों की उलझन के बावजूद मुक्तिबोध की कविता में सीखने और समझने के लिए बहुत कुछ है ख़ास तौर से कवियों के लिए।