आम जनजीवन की संवेदना और परिवेश के प्रति लगाव - Sense of common life and attachment to the environment

समकालीन कविता का यथार्थ कवि का स्थानीयता और परिवेश के प्रति गहरे लगाव से उपजता है । अपनी संवेदनात्मक चेतना से कवि अपने परिवेश से जुड़ता है, टकराता है और जीवन के छोटे-छोटे संवेगों को ग्रहण करता है एवं सजग भाषा में रचता है। मुक्तिबोध, धूमिल, केदारनाथ सिंह, श्रीकान्त वर्मा, रघुवीर सहाय, चन्द्रकान्त देवताले, विनोद कुमार शुक्ल, लीलाधर जगूड़ी, उदय प्रकाश, अरुण कमल और राजेश जोशी जैसे कवियों की कविताओं में स्थानीय संवेदना और परिवेश के प्रति लगाव को देखा जा सकता है। रघुवीर सहाय की 'आत्महत्या के विरुद्ध', धूमिल की 'मोचीराम' और केदारनाथ सिंह की 'बनारस' कविता में परिवेश और स्थानीयता का रंग देखा जा सकता है।

इन कविताओं में कवि अपने आस-पास के चरित्रों और घटनाओं से कविता का सृजन-संसार बुनता है। समकालीन कविता की खूबी यह है कि यहाँ कवि अपनी कविता को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ता है। जीवन और परिवेश से जुड़ी छोटी-छोटी चीजों पर लिखी गई कविताएँ समकालीन काव्य की खास विशेषता है। राजेश जोशी ने कविताओं में अपने शहर, पलम्बर, मिस्री और माली को याद करते हुए खूबसूरत कविताएँ लिखी हैं। ये मामूली लोग हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। इन्होंने हमारे जीवन को सुन्दर बनाया है। अपने शहर को याद करते हुए राजेश जोशी ने लिखा भी है।



एक एक कर अपने शहर की गलियों को याद करता हूँ


कितनी मिट्टी, कितना पानी कितनी हवा


बाहर निकलना चाहकर भी, बाहर नहीं जा पाता


मेरे फेफड़ों में जमा है मेरे शहर की किसी दूसरे शहर की गलियों में घूमते हुए उसका चेहरा अपने शहर की गलियों से मिलाता हूँ


केदारनाथ सिंह का बनारस शहर से खास जुड़ाव रहा है तभी तो 'बनारस' कविता में वह इस शहर की संस्कृति,

सभ्यता और भूगोल को संजीदगी से रचते हैं। शहर की बाह्य और आन्तरिक संरचना 'बनारस' कविता में जीवन्त बन पड़ी है। केदारनाथ सिंह के शब्दों में- -


किसी अलक्षित सूर्य को


देता हुआ अर्घ्य


शताब्दियों से इसी तरह अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर


गंगा के जल में


अपनी दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर


संघर्ष और प्रतिरोध में जीवन की महक तलाशने वाला कवि बहस पर विश्वास करता है। आम जन-मन की समस्याओं को रचकर ही वह कविता को सार्थक बनाता है। कवि देवी प्रसाद मिश्र की कविता में इसी संवेदना को उकेरा गया है-


और फिर कवि ने फुसफुसा कर कहना चाहा कि


बार-बार मनुष्य के चेहरे का वर्णन


मौलिकता का पुनराविष्कार है बार-बार


इसलिए पानी की माँग बार-बार


इसलिए बार-बार पुकार


और इसलिए बार-बार


खोई हुई कविता की खोज


और खोए गणतन्त्र को खोजने का


नैतिक उपद्रव बार-बार ।


राजेश जोशी की कविता 'मारे जायेंगे' हमारे समय का कारुणिक यथार्थ है।

1988 ई. में लिखी यह कविता आज के समय में अधिक प्रासंगिक है। यही है कविता की शक्ति। यह कविता हमारे समय की क्रूर, घातक और स्वार्थी प्रवृत्तियों को उकेरती है -


जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे


मारे जाएँगे


कटघरे में खड़े कर दिए जाएँगे, जो विरोध में बोलेंगे


जो सच-सच बोलेंगे,

मारे जाएँगे


बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो


उनकी कमीज से ज्यादा सफेद


कमीज पर जिनका दाग नहीं होगा, मारे जाएँगे


धकेल दिए जाएँगे, कला की दुनिया से बाहर जो चारण नहीं जो गुन नहीं गाएँगे मारे जाएंगे


धर्म की ध्वजा उठाए जो नहीं जाएँगे जुलूस में


गोलियाँ भून डालेंगी उन्हें काफिर करार दिए जाएँगे सबसे बड़ा अपराध है इस समय


निहत्थे और निरपराध होना


जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे।