शुक्लयुगीन आलोचना: स्वरूप और परिप्रेक्ष्य - Shukla Yugi Criticism: Nature and Perspective

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सन् 1920 में 'सरस्वती' के सम्पादक पद से संन्यास ले लिया था। इस घटना के साथ ही हिन्दी आलोचना के इतिहास में जैसे एक युग समाप्त हो गया। हिन्दी साहित्य में निराला की कविता 'जूही की कली' (1916 ई.) के प्रकाशन के साथ ही छायावाद का उदय हो चुका था । कथा-साहित्य में नयी चेतना के साथ प्रेमचंद हिन्दी के महत्त्वपूर्ण लेखक स्थापित हो चुके थे। हिन्दी साहित्य में यह नयी रचनाशीलता आलोचना के लिए चुनौती बनकर सामने आ रही थी। दूसरी ओर, हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास तीव्र गति से हो रहा था।

उच्च शिक्षा में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन के लिए आलोचनात्मक ग्रन्थों की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। संस्कृत काव्यशास्त्र और रीतिकालीन काव्य-दृष्टि इस आवश्यकता की पूर्ति करने में असमर्थ थे। साहित्य-समीक्षा के नये निकष और साहित्य के सम्बन्ध में नयी दृष्टि के अभाव में आगे बढ़ना सम्भव नहीं था । 'सरस्वती' और 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' आदि पत्र-पत्रिकाएँ अपनी ऐतिहासिक भूमिकाएँ पूर्ण कर चुकी थीं। 'माधुरी', 'मर्यादा', 'सुधा', 'इन्दु' आदि पत्र-पत्रिकाएँ परिवर्तित साहित्य-चेतना की वाहक बनीं। श्री मुकुटधर पाण्डेय की छायावाद पर पहली लेखमाला सन् 1920 में 'श्रीशारदा' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इन हलचलों के मध्य हिन्दी आलोचना में भी एक नये युग का उदय हुआ ।