सौन्दर्य का सामाजिक और वस्तुवादी आधार - social and material basis of beauty

काव्य- चिन्तन के क्षेत्र में प्रारम्भ से ही सौन्दर्यतत्त्व की विवेचना होती रही है और काव्यशास्त्र के आचार्यों विशेषकर पश्चिम के आचार्यों ने सौन्दर्य को कला तथा कविता के केन्द्रीय तत्त्व के रूप में मान्यता दी है। सौन्दर्य की अनेक परिभाषाएँ तथा व्याख्याएँ भी सामने आती रही हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में सौन्दर्य शब्द को लेकर और उसे काव्य या कला का केन्द्रीय तत्त्व मानकर चर्चा नहीं हुई है। हिन्दी आलोचना परम्परा में सौन्दर्यसम्बन्धी विवेचन सौन्दर्य के वस्तुगत तथा सामाजिक आधार का उल्लेखनीय आख्यान प्रस्तुत करता है। इस सन्दर्भ में रामविलास शर्मा का योगदान महत्त्वपूर्ण है। मुक्तिबोध इसकी विस्तृत विवेचना करते हैं।

'सौन्दर्य-प्रतीति और सामाजिक दृष्टि' नामक निबन्ध में मुक्तिबोध ने लिखा है कि "जिस समाज में सौन्दर्य प्रतीति और सामाजिक दृष्टि में परस्पर विरोध माना जाता है अथवा दूसरे शब्दों में इन दोनों के भीतर किसी आन्तरिक गहरी एकता का अस्तित्व नहीं माना जाता, वह समाज भी खूब है और वे दार्शनिक या विचारक भी खूब हैं जो इन मान्यताओं को लेकर चलते हैं।" मुक्तिबोध ने गहराई में जाकर सौन्दर्य-प्रतीति का सम्बन्ध सामाजिक दृष्टि से जोड़ते हुए यहाँ तक कहा है कि "केवल सौन्दर्य ही नहीं, हमारी आस्था में जो कुछ है, वह सब समाज प्रदत्त है, चाहे वह निष्कलुष अनिन्द्य सौन्दर्य का आदर्श ही क्यों न हो।

हमारा सामाजिक व्यक्तित्व हमारी आत्मा है और इस आत्मा का सार तत्त्व प्राकृतिक रूप से सामाजिक है; व्यक्ति और समाज का विरोध बौद्धिक विक्षेप है, इस विरोध का कोई अस्तित्व नहीं।"


मुक्तिबोध ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा में ही सौन्दर्य का सामाजिक आधार स्पष्ट करते हुए उसका सम्बन्ध जीवनानुभूति से स्थापित किया है। विदित है कि अपने काव्य-चिन्तन में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्यानुभूति और जीवनानुभूति को एक ही स्वीकार किया है।

उनका कहना है कि वास्तविक जीवनानुभूतियाँ हमें काव्यानुभूतियों के समान ही रस तथा सौन्दर्य के संवेदन प्रदान करती हैं।


मुक्तिबोध ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि जीवनानुभूति सौन्दर्यानुभूति से पृथक् और समानान्तर न होकर उसी का एक उदात्तीकृत रूप है, जीवनानुभवों का ही वह एक कल्पनोद्भासित पुनः अनुभव उसमें जीवनानुभवों की संवेदनापूर्ण कल्पना के द्वारा पुजित होता है। किन्तु इसके लिए वे एक आवश्यक शर्त रखते हैं कि इस पूरे अनुभव में रचनाकार की आत्मबद्ध दशा का परिहार होना जरूरी है।

मुक्तिबोध का मानना है कि "ऐसा नहीं है कि अपनी व्यक्ति सत्ता से ऊपर उठने की प्रवृत्ति केवल सौन्दर्यानुभूति के क्षणों में ही होती है, वह जीवन के सामान्य अनुभवों के भीतर भी हुआ करती है। वस्तुतः सौन्दर्यानुभूति का क्षण जीवन वास्तविक जीवन का ही एक अंग है जो इसी वास्तविक जीवन को न केवल अधिक सम्पन्न बनाता है वरन उसे अधिक स्निग्ध, सुगम और सार्थक बनाता है।"


सौन्दर्यानुभूति मानव के अन्तःकरण में जीवन के वास्तविक अनुभवकाल में ही संचित होती रहती है।

अतएव उन्हें जीवनानुभूति से अलग नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि मुक्तिबोध ने कविता या कला की सौन्दर्यवादी मनोवैज्ञानिक व्याख्या के साथ-साथ ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि अपनाने पर भी बल दिया है। उनका कहना है कि सौन्दर्य केवल विधान तक ही सीमित न होकर आन्तरिक होता है। सौन्दर्य की यह आन्तरिकता वस्तुतः अनुभूति के मूल में स्थित मानव सम्बन्धों, विश्व दृष्टि तथा जीवन मूल्यों से बनती हैं। ये जीवनमूल्य, मानव-सम्बन्ध तथा विश्व दृष्टि ही साहित्यिक सांस्कृतिक क्षेत्र में अपने को अभिव्यक्त कराती हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सौन्दर्यात्मक मनोवैज्ञानिक पक्ष की सम्यक् समीक्षा के लिए ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय पक्ष पहले आवश्यक है।