आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सामाजिक मानवतावाद - Social Humanism of Acharya Hazariprasad Dwivedi
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के चिन्तन का एक मुख्य पहलू मानवतावाद है। द्विवेदी जी अपनी सजग दृष्टि से देख रहे थे कि मानवतावाद के विकृत रूप ने दुनिया में नस्लवाद और साम्राज्यवाद को पनपने का अवसर दिया है। यह रूप मनुष्य को शोषण और बन्धन से मुक्त करने के आदर्शों से युक्त मानवतावाद से भिन्न है। जिस मानवतावाद में केवल व्यक्ति मानव की मुक्ति को ही अपना लक्ष्य माना जाता हो वह असली मानवतावाद नहीं है। उन्होंने लिखा है कि “सामाजिक मानवतावाद ही उत्तम समाधान है। मनुष्य को व्यक्ति मनुष्य को नहीं बल्कि - समष्टि- मनुष्य को आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण से मुक्त करना होगा।"
मनुष्य की वास्तविक मुक्ति - के लिए उभर रहे प्रगतिशील विचारों से द्विवेदी जी प्रभावित हुए हैं और उन्होंने प्रगतिशील आन्दोलन के प्रति अपनी सहानुभूति और समर्थन व्यक्त किया है। उन्होंने इस आन्दोलन को भक्ति आन्दोलन जैसी शक्ति और आदर्श निष्ठा से युक्त आन्दोलन कहा है जिसमें समाज को नये जीवन-दर्शन के आधार पर बदलने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि यदि यह आन्दोलन किसी प्रकार की संकीर्णता या साम्प्रदायिकता से दूर रहा तो मनुष्य को सभी प्रकार के शोषण और बन्धनों से मुक्त करने में अवश्य सफल होगा।
हिन्दी में भी प्रगतिशील आन्दोलन के आदर्शों से प्रेरित जो साहित्य लिखा जा रहा था द्विवेदी जी ने उसका स्वागत किया है।
उन्होंने साम्राज्यवाद और स्वार्थपरता के कारण यूरोप की वैचारिक श्रेष्ठता का पतन देखा था। विश्व में शोषण और पराधीनता को बनाए रखने के लिए यूरोपीय देश जिस प्रकार से बौद्धिक, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास कर रहे थे, द्विवेदी जी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से उसे देख रहे थे- "यूरोपीय राष्ट्रों के संघटित दलों में जो एकता है वह उस एकता से मिलती-जुलती है जो ठगों में पाई जाती है। दुनिया के शोषण के लिए इनके विशेषज्ञों ने नाना प्रकार की राजनैतिक और आर्थिक नैतिकता की 'बोलियाँ' बना रखी है।
इतिहास को देखने की इनकी अपनी विशेष दृष्टि है, नृतत्व-विद्या को समझने के अपने तरीके हैं। और सब कुछ एक विशेष प्रकार की स्थिति बनाए रखने के उद्देश्य से लिखा गया है। " द्विवेदी जी की इस इतिहास- दृष्टि के निर्माण में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के साथ-साथ प्रगतिशील आन्दोलन की गतिविधियों और वैचारिक संघर्ष का गहरा प्रभाव है।
द्विवेदी जी के लिए साहित्य मात्र आत्माभिव्यक्ति का साधन या शब्द-क्रीड़ा नहीं है। वे साहित्य को सम्पूर्ण विश्व के साथ एकत्व अनुभव करने की साधना मानते हैं।
उनके अनुसार साहित्य का उद्देश्य व्यक्तिगत संकीर्णताओं से ऊपर उठकर व्यापक मानवता के सुखदुःख का अनुभव करने और उनके प्रति सहानुभूति जगाना है । इस सहानुभूति में वे प्राणिमात्र को शामिल करते हैं। इसलिए द्विवेदी जी साहित्य में उस सौन्दर्य की अभिव्यक्ति का आग्रह करते हैं जिसमें समाज और जीवन के यथार्थ का चित्रण हो। उन्होंने लिखा है कि "साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत को असुन्दर छोड़कर सौन्दर्य की सृष्टि नहीं कर सकते । ... बाह्य असुन्दरता के 'दूह' में खड़े होकर आन्तरिक सौन्दर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौन्दर्य को देखना ही पड़ेगा। निरन्न निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौन्दर्यलोक की कल्पना नहीं कर सकते।" (- 'अशोक के फूल')
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