कोमलकान्त पदविन्यास - soft posture
महादेवी के गीतों में शैलीगत सुकुमारता, कोमलकान्त पदविन्यास, वर्ण मैत्री, स्वर मैत्री, व्यंजन मैत्री के साथ-साथ नाद-सौन्दर्य भी विद्यमान है। वह कोमल भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्ण कुशल हैं। कोमलकान्त पदविन्यास का उदाहरण द्रष्टव्य है-
वे मुस्काते फूल नहीं जिनको आता है मुरझाना वे तारों के दीप नहीं जिनको भाता है बुझ जाना, वे सूने से नयन नहीं जिनमें बनते आँसू मोती, वह प्राणों की सेज नहीं जिसमें बेसुध पीड़ा सोती ।
महादेवी के गीत गीतिकाव्य की सम्पूर्ण विशेषताओं से युक्त हैं। डॉ० द्वारिकाप्रसाद सक्सेना के अनुसार - "महादेवी के गीतिकाव्य में सहज स्वाभाविकता है, सहज संगीतात्मकता है, उसमें शिल्प-सौष्ठव है, वह कोमलकान्त पदावली युक्त है, उसमें मनोभावाभिव्यंजना भाव-प्रेषक है। वे आधुनिक युग की सर्वोच्च गीत लेखिका है, उनका गीतिकाव्य हिन्दी काव्य का अमर शृंगार है। "
विविध विशेषताओं और गुणवत्ता के परिणामस्वरूप महादेवी और उनका गीतिकाव्य हिन्दी गीतिकाव्य और काव्यकारों की परम्परा में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में "गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवीजी को हुई, वैसी और किसी को नहीं। न तो भाषा का ऐसा स्निग्ध और प्रांजल प्रवाह और कहीं मिलता है, न हृदय की ऐसी भावभंगिमा । जगह-जगह ऐसी ढली हुई और अनूठी व्यंजना से भरी हुई पदावली मिलती है कि हृदय खिल उठता है।"
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