काव्य की आत्मा - soul of poetry

काव्य की आत्मा के प्रश्न पर जयशंकर प्रसाद ने बहुत सीधे ढंग से विचार नहीं किया है, किन्तु काव्य की रचना में उन्होंने आत्मानुभूति की केन्द्रीयता दृढतापूर्वक स्वीकार की है। वे काव्य विश्लेषण में आत्मा को इतना महत्त्व प्रदान करते हैं कि काव्य की प्रत्येक समस्या को आत्मानुभूति से हल करने का प्रयास करते हैं। वे कवित्व को ‘आत्मा की अनुभूति' कहते हैं। उदाहरण के तौर पर तुलसी और सूर के वात्सल्य वर्णन की तुलना करते हुए प्रसाद यह सवाल उठाते हैं कि क्या कारण है कि रामचन्द्र के वात्सल्य रस की अभिव्यंजना उतनी प्रभावशालिनी नहीं हुई जितनी की सूरदास के श्याम की। इस सवाल का जवाब स्वयं देते हुए वे कहते हैं कि "... वही प्रमाण हैं आत्मानुभूति की प्रधानता का सूरदास के वात्सल्य में संकल्पनात्मक मौलिक अनुभूति की तीव्रता है, उस विषय की प्रधानता के कारण... जहाँ आत्मानुभूति की प्रधानता है,

वहीं अभिव्यक्ति अपने क्षेत्र में पूर्ण हो सकी है। वहीं कौशल या विशिष्ट पद रचना युक्त काव्य शरीर सुन्दर हो सका है।" वे 'आत्मा', 'आत्मानुभूति' या 'अनुभूति' शब्द की कोई व्याख्या नहीं करते हैं। इसलिए उनका विश्लेषण लोकोत्तर धरातल पर ही स्थिर रहता है। उन्होंने प्रकारान्तर से काव्य के अन्तर्गत रस तत्त्व को भी काव्य की आत्मा का गौरव प्रदान किया है। उनका रस सम्बन्धी विवेचन विशुद्ध रूप से शैवाद्वैत से ही सम्बन्धित है। अपने छायावाद सम्बन्धी विवेचन में प्रसाद ने स्वानुभूतिम अभिव्यक्ति को ही छायावाद कहा है। छायावादी रचनाओं के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए वे कहते हैं कि "जो नये भाव छायावादी रचनाओं में आए, वे एक आन्तरिक स्पर्श से पुलकित थे।"


अनुभूति के स्तर पर ही उन्होंने छायावादी रचनाओं को पूर्ववर्ती रचनाओं से भिन्न नहीं किया, अपितु कला व शिल्प के स्तर पर भी उन्होंने छायावाद के वैशिष्ट्य को स्पष्ट किया है। यथार्थवाद और छायावाद के विषय में उन्होंने जो भी कुछ लिखा वह उनकी चिन्तनपरक दृष्टि का परिचायक है। हिन्दी की परम्परा किस प्रकार सामाजिकता और लोकमंगल की भावना की ओर बढ़ रही थी, यह प्रसाद के यथार्थवाद सम्बन्धी विचारों से भलीभाँति प्रकट हो जाता है। उन्होंने 'छायावाद' की गुत्थी यह कहकर सुलझा दी कि "वह वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमय अभिव्यक्ति है। " वेदना शब्द से उनका अभिप्रेत यथार्थवाद के मूल भाव से है। वेदना के आधार पर वे कहीं-न-कहीं यथार्थवाद और छायावाद की एकसूत्रता तलाश लेते हैं।


छायावादी काव्य-भाषा पर जयशंकर प्रसाद सुयोग्य भाषा वैज्ञानिक की तरह विचार करते हैं। वे आचार्य शुक्ल के साथ इस विषय में एकमत हैं कि छायावाद आभ्यन्तर प्रभाव-साम्य पर ही विशेष लक्ष्य रखकर चला है। उसके लिए नवीन शैली, नया वाक्य विन्यास आवश्यक था। हिन्दी में नवीन शब्दों की भंगिमा स्पृहणीय आभ्यन्तर वर्णन के लिए प्रयुक्त होने लगी, शब्द विन्यासों में ऐसा पानी चढ़ा कि उसमें एक तड़प उत्पन्न करके सूक्ष्म अभिव्यक्ति का प्रयास किया गया। यहाँ प्रसाद ने छायावादी कविताओं में ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार- वक्रता आदि का उल्लेख किया है और प्रकारान्तर से यह भी ध्वनित किया।


है कि इन विशेषताओं को समझे बिना छायावादी कविताओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। छायावाद पर लगाए गए आरोपों का उत्तर देते हुए उन्होंने छायावादी कविताओं के स्वरूप को स्पष्ट किया है।


जयशंकर प्रसाद ने छायावादी कविता में हृदय तत्त्व अथवा अनुभूति तत्त्व को प्रधान मानते हुए उसे प्रकृति सौन्दर्य से भी अनुप्राणित बताया है। उन्होंने रहस्यवाद को छायावाद का पर्याय मान लेने का विरोध भी किया है। छायावादी कविता के सम्बन्ध में उनका यह मत बहुत तात्त्विक प्रतीत होता है कि "छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है।

ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृत्ति छायावाद की विशेषताएँ हैं। अपने भीतर मोती के पानी की तरह अन्तस् स्पर्श करते भाव समर्पण करने वाली अभिव्यक्ति छायाकान्तिमयी होती है ।" वस्तुतः प्रसाद का काव्य-चिन्तन आलंकारिक होते हुए छायावादी कविता और एक प्रकार से कविता मात्र के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण को अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों ही आयामों पर अभिव्यक्त करता है। प्रसाद कविता को न केवल स्वानुभूति की अभिव्यक्ति मानते हैं, अपितु वे उसके लिए प्रचलित परिपाटी से हटकर नये-नये विन्यास की आवश्यकता भी महसूस करते हैं।


यद्यपि प्रसाद का काव्य चिन्तन पूरी तरह से भारतीय है तथापि उनके तथा पश्चिम के स्वच्छन्दतावादी कवि चिन्तकों के विचारों में साम्य भी परिलक्षित होता है। यह सच है कि उनकी मान्यताएँ कॉलरिज और ब्लैक की स्थापनाओं की संगति में ही हैं। काव्य में कल्पना तत्त्व के सन्दर्भ में प्रसाद ने जो मत स्थापित किया है, वह भी कॉलरिज की कल्पना सम्बन्धी विचार से मेल खाता है। उदाहरण के तौर पर कॉलरिज ने कल्पना को ईश्वर का पर्याय स्वीकार किया है।

अपनी एक प्रारम्भिक कविता में जयशंकर प्रसाद भी प्रकारान्तर से कल्पना के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। -


हे कल्पना सुखदान,


तुम मनुज जीवन प्राण,


तुम विशद् व्योम समान,


तब अंत नर नहीं जान ।