काव्य की आत्मा - soul of poetry
अज्ञेय ने कविता से सम्बन्ध रखने वाले बुनियादी सवालों पर परम्परागत पद्धति से भिन्न नये विचारों का प्रतिपादन किया है। विचारों के नयेपन के बावजूद काव्यसम्बन्धी उनके अभिमत को ऐसे कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सुविधापूर्वक रखा जा सकता है जो काव्य-विवेचन के अनुक्रम में परम्परा से मान्य रहे हैं। उदाहरण के तौर पर काव्य की आत्मा क्या है, इस सवाल पर परम्परा से विचार होता रहा है। अज्ञेय ने यद्यपि सीधे-सीधे इस पर अपना अभिमत नहीं दिया है, लेकिन काव्य के केन्द्रीय तत्त्व के रूप में उन्होंने जिन बातों की ओर ध्यान आकर्षित किया है, उन्हें सारतः 'काव्य की आत्मा' शीर्षक के अन्तर्गत विश्लेषित किया जा सकता है।
काव्य की आत्मा के सम्बन्ध में अज्ञेय के विचार परम्परागत विचारों से न केवल भिन्न हैं, नये भी हैं। किसी परम्परागत काव्य सम्प्रदाय का उल्लेख न करते हुए उन्होंने काव्य के आन्तरिक गुण के रूप में चमत्कार की स्थिति स्वीकार की है। उनके अनुसार "काव्य का रस कवि में या कवि के जीवन में, या वर्ण्य विषय या अनुभूति में, या किसी शब्द विशेष में नहीं है, वह काव्य-रचना की चामत्कारिक तीव्रता में है।" इस सम्बन्ध में डॉ. सुरेशचन्द्र गुप्त का कथन है कि "अज्ञेय का यह विचार भारतीय आचार्यों द्वारा प्रतिपादित वक्रोक्ति सिद्धान्त से बहु छू नहीं है।
अपने लेखन में कुछ अन्य जगहों पर भी अज्ञेय ने चमत्कार को केन्द्र में रखते हुए कविता के आन्तरिक गुण की ओर संकेत करने का सफल प्रयास किया है।" 'दूसरा तारसप्तक' के वक्तव्य में अज्ञेय के विचारों को देखा जा सकता है - "जरा भाषा के मूल प्रश्न पर 'शब्द और उसके अर्थ' सम्बन्ध पर ध्यान दीजिए। शब्द में अर्थ कहाँ से आता है, क्यों और कैसे बदलता है, अधिक या कम व्याप्ति पाता है ?" एक उदाहरण देते हुए वे अपनी बात को आगे इस प्रकार स्पष्ट करते हैं कि "हम कहते हैं 'गुलाबी और उससे एक विशेष रंग का बोध हमें होता है। निस्सन्देह इसका अभिप्राय है गुलाब के फूल के रंग जैसा रंग।
यह उपमा उसमें निहित है। आरम्भ में 'गुलाबी' शब्द से उसके रंग तक पहुँचने के लिए गुलाब के फूल की मध्यस्थता अनिवार्य रही होगी। उपमा के माध्यम से ही अर्थलाभ होता रहा होगा। उस समय यह प्रयोग चामत्कारिक रहा होगा, पर अब वैसा नहीं है। अब हम शब्द से सीधे रंग तक पहुँच जाते हैं । फूल की मध्यस्थता अनावश्यक है अब उस अर्थ का चमत्कार मर गया है, अब वह अभिधेय हो गया है और अब इससे भी अर्थ में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती कि हम जानते हैं गुलाब कई रंगों का होता है सफेद, पीला, लाल। यहाँ तक कि काला; तब यह क्रिया भाषा में निरन्तर होती रहती है और भाषा के - विकास की अनिवार्य क्रिया है।
चमत्कार मरता रहता है और चामत्कारिक अर्थ अभिधेय बनता रहता है; यो कहें कि कविता की भाषा निरन्तर गद्य की भाषा होती जाती है। इस प्रकार कवि के सामने हमेशा चमत्कार की सृष्टि की समस्या बनी रहती है; वह शब्दों को निरन्तर नया संस्कार देता चलता है और वे संस्कारक्रमशः सार्वजनिक मानस में बैठकर फिर ऐसे हो जाते हैं कि उस रूप में कवि के काम के नहीं रहते, बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।"
अपनी इस मान्यता को सिद्ध करते हुए अज्ञेय ने नये कवि का पक्ष लेते हुए कहा है कि अभिधेय अर्थ से युक्त शब्द तो केवल मिट्टी अथवा वह कच्चा माल है, जिससे कि कवि रचना करता है,
जिसके द्वारा एक नया अर्थ देकर उसमें नया जीवन डाल दे। वाक् और अर्थ से सम्पृक्त पार्वती परमेश्वर के प्रति कवि की प्रार्थना इसीलिए है।
इस प्रार्थना को हँसकर उड़ा देना अथवा उसमें निरा वैचित्र्य देखना तर्कसंगत नहीं है। वस्तुतः कवि आलोचक अज्ञेय के लिए परम्परागत साधारणीकरण की मान्यता भी इसी सन्दर्भ में है कि क्रमशः मृत होते हुए और अभिधेय बनते हुए चामत्कारिक अर्थ से क्षीण हुई शब्द की रोगोत्तेजक शक्ति को फिर से नया अर्थ देकर तीव्र करना।
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अज्ञेय की इस मान्यता का आशय शब्दों को नये अर्थ सन्दर्भों से जोड़कर उनमें ताजगी, नवीन अनुभूति और चेतना को उनकी नवीनता एवं सम्पूर्णता में अभिव्यंजित करने की क्षमता प्रदान करना है अज्ञेय ने ध्वनि तत्त्व को पर्याप्त महत्त्व दिया है, क्योंकि शब्द में नया चामत्कारिक अर्थ ध्वनि तत्त्व के अभाव में सम्भव नहीं है। हालाँकि, यहाँ कवि को एक नयी समस्या का सामना करना पड़ता है, वह है- शब्द में नया चामत्कारिक अर्थ भरने के क्रम में सामने आने वाली दुरूहता । अज्ञेय इस दुरूहता की समस्या से विशेष परेशान नहीं होते हैं, क्योंकि इसे वे कवि की विवशता स्वीकार करते हैं।
प्रयोगवाद का प्रवर्तन करते हुए 'तारसप्तक' के अपने वक्तव्य में अज्ञेय ने नये कवि का पक्ष लेते हुए कहा हैं कि "कवि अनुभव करता है कि भाषा का पुराना व्यापकत्व उसमें नहीं है शब्दों के साधारण अर्थ से बड़ा अर्थ - हम उसमें भरना चाहते हैं, पर उस बड़े अर्थ को पाठक के मन में उतार देने के साधन अपर्याप्त हैं, वह या तो अर्थ कम पाता है या कुछ भिन्न पाता है.... जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने वाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ़ अलौकिक अथवा दीक्षा द्वारा गम्य हो जाना अनिवार्य है; किन्तु वह उसकी शक्ति नहीं विवशता है,
धर्म नहीं आपद्धर्म है।" अज्ञेय ने अपनी इन मान्यताओं के सन्दर्भ में जिस रचनाशीलता की हिमायत की है, उसमें कवि के इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए कल्पना तत्त्व और बुद्धि-तत्त्व दोनों के सहयोग को अपेक्षित माना है।
अज्ञेय प्रयोगवाद के उन कवि आलोचकों में अग्रणी हैं जिन्होंने परम्परागत काव्यशास्त्र के अध्ययन में भी अभिरुचि दिखाई है। यद्यपि उन्होंने परम्परागत मान्यताओं को उनके मूल रूप में ग्रहण न करते हुए नये वस्तु-तत्त्व तथा विचार तत्त्व से सम्पन्न किया है।
परम्परागत आचार्यों ने जहाँ रस को काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया है, वहाँ अज्ञेय ने चमत्कार की बात कहकर वक्रोक्तिजन्य चमत्कार को मान्यता दी है। हालाँकि, ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने इस प्रसंग में रस की चर्चा ही न की हो। रस का उन्होंने समर्थन किया है किन्तु उसकी उत्पत्ति स्थायी भावों और संचारी भावों के चामत्कारिक संयोग में मानी है। उनकी प्रबल धारणा है कि रचना में चामत्करिकता परिष्कृत मानस की माध्यमिकता, तटस्थता, पृथकत्व या अलगाव द्वारा आती है। कहने का आशय है कि रस और कहीं नहीं, काव्य-रचना की चामत्कारिक तीव्रता में ही है।
अज्ञेय विशुद्ध उक्ति वैचित्र्य के द्वारा चमत्कार की सृष्टि नहीं मानते। उनके अनुसार उक्ति की वक्रता भी कविता कही जाएगी, जब उसमें स्थायी और संचारी भावों का चामत्कारिक योग हो। स्पष्ट है अज्ञेय न तो कोरे शिल्पवादी हैं और न ही कोरे चमत्कारवादी। क्योंकि चमत्कार शब्द को उन्होंने मात्र तकनीकी अथवा शिल्प तक ही सम्बद्ध न रखकर भावों और अनुभूतियों से जोड़ा है। रस को काव्य की आत्मा के रूप में उन्होंने मान्यता नहीं दी, क्योंकि वे कविता में बुद्धि तथा विचार तत्त्व की अनिवार्य स्थिति भी स्वीकार करते हैं। इस प्रकार उन्होंने रस सम्बन्धी चिन्तन का सर्वथा तिरस्कार नहीं किया है, बल्कि काव्य के विवेचनार्थ उसे नूतन अभिप्राय प्रदान किया है ।
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