शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट - Structure of Shamsher's poetry
विजयदेवनारायण साही के आलोचना वैशिष्ट्य को उद्घाटित करता प्रो. निर्मला जैन का कथन है- "विजयदेवनारायण साही की दृष्टि सदैव आधारभूत तथ्यों की ओर उन्मुख रहती है।" शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट की विवेचना करते हुए साही स्पष्ट करते हैं कि किसी कविता में जब बदलाव आता है तो केवल बाह्य कलेवर का नहीं होता, अपितु वह बदलाव गहरे स्तर पर अनुभूति से भी जुड़ा हुआ होता है। इस सन्दर्भ में उन्होंने इस विचार पर जोर दिया है कि "नयी कविता की बहसों में यह मान्यता अन्तर्भुक्त रही है कि न सिर्फ कविता का ऊपरी कलेवर बदला है,
या नये प्रतीकों या बिम्बों या शब्दावली की तलाश हुई हैं, बल्कि गहरे स्तर पर काव्यानुभूति की बनावट में ही परिवर्तन आ गया है। लेकिन बहस में इस पर बल कम दिया गया है। चेतना के जो सत्व काव्यानुभूति के आवश्यक अंग दिखते थे, उनमें कुछ अनुपयोगी या असार्थक दिखने लगे, कुछ अन्य जो पहले अनावश्यक या विरोधी लगते थे, काव्यानुभूति के केन्द्र में आ गए। कुल मिलाकर काव्यानुभूति और जीवन के काव्येतर अनुभूतियों में जो रिश्ता दिखता था, वह रिश्ता भी बदल गया। "
'शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट में साही मलार्मीय विडम्बना का उल्लेख करते हैं जो एक संकोच के रूप में उनकी काव्यानुभूति को आलोकित करती है।
साही का मानना है कि "शमशेर इसका हल अपने ढंग से निकालते हैं वस्तुपरकता के मर्म में आत्मपरकता का और आत्मपरकता के मर्म में वस्तुपरकता का आविष्कार करके। उनकी कविता के हाशिए पर केवल मार्क्सवाद नहीं लिखा है। उनकी कविता का एक और हाशिया भी है जिस पर सुर्रियलिज्म या अतियथार्थवाद का नाम भी लिखा है।" समवेततः साही मलामें की काव्यानुभूति के सादृश्य पर शमशेर की कविता की बनावट को समझने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ भी विजयदेवनारायण साही का बल शमशेर के काव्य पर अपने किसी निष्कर्षों से बचकर काव्य-चेतना के स्पन्दन को महसूस करना है।
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