व्यक्तिवादी आलोचना - subjective criticism

साहित्य के विवेचन में व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व और विचारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्तिगत रुचियों, मानसिक स्थितियों और व्यक्तिगत संवेदनाओं के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन करना ही व्यक्तिवादी आलोचना पद्धति कहलाती है। साहित्य में रचनाकार और आलोचक के आत्मगत चिन्तन और मान्यताओं का महत्त्व असंदिग्ध है। लेकिन साहित्य के विवेचन में पूर्णरूप से आत्मगत मान्यताओं पर निर्भर होकर निर्णय देने से साहित्य का निष्पक्ष और सम्यक् मूल्यांकन नहीं किया सकता। व्यक्तिगत आग्रह साहित्य के आभ्यन्तर और बाह्य विशेषताओं के उद्घाटन में बाधा बन जाते हैं। साहित्य-समीक्षा में आलोचक का अपने व्यक्तित्व और व्यक्तिगत मान्यताओं से पूरी तरह मुक्त होना सम्भव नहीं है, लेकिन आलोचना के दूसरे उपकरणों और प्रतिमानों के सन्दर्भ में ही व्यक्तिगत मान्यताएँ साहित्य-समीक्षा में उपयोगी हो सकती हैं।