दीपक का प्रतीकार्थ - symbol of lamp
"काव्य में वह गोचर या अगोचर वस्तु जो किसी अन्य वस्तु या भाव का बोध कराए और जिसमें भाव जगाने की शक्ति हो, प्रतीक कहलाती है।"
- डॉ. सुरेश त्यागी
"अप्रस्तुत, अप्रमेय, अगोचर अथवा अमूर्त का प्रतिनिधित्व करने वाले उस प्रस्तुत या गोचर वस्तु- विधान को प्रतीक कहते हैं जो देश,
काल अथवा सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण हमारे मन में अपने चरित्र साहचर्य के कारण किसी तीव्र आलोचना को जाग्रत् करता है।"
- डॉ. नित्यानन्द शर्मा
"प्रतीक वह संकेतात्मक चिह्न है जो किसी गूढ़ एवं सूक्ष्म भाव या विचार का अर्थ प्रतिपादित करने के लिए स्वेच्छापूर्वक या परम्परागत रूप में प्रयुक्त होता है। "
-कृष्ण कुमार गोस्वामी
महादेवी के काव्य में सांकेतिकता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है वे अपने भावों की अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से ही करती हैं। महादेवी के प्रतीक विधान के मूल में आध्यात्मिकता, स्त्रियोचित शालीनता, संवेदनशीलता, कला-प्रियता तथा छायावादी आन्दोलन आदि कारणों को माना जा सकता है। उनका काव्य आरम्भ से अन्त तक प्रतीकवादी कहा जा सकता है। उनकी रचनाओं के शीर्षक भी प्रतीकात्मक हैं, जैसे- 'नीहार' निराशापूर्ण वेदना का, 'रश्मि' अज्ञात से मिलन की आशा का,
'सान्ध्यगीत' सुख-दुःखमय शान्त वेदना का, 'नीरजा' अनुभूति के प्रस्फुटन का और 'दीपशिखा' निष्काम साधना का प्रतीक है।
डॉ. विमल ने महादेवी वर्मा के प्रतीकों के चार भेद स्वीकार किए हैं-
वेद और उपनिषद् के प्राचीन प्रतीक सूर्य, दिवा, शतदल, निशि, उषा, संध्या, अमा, सम्पुद शंख,
मुरली आदि।
सन्त साहित्य के प्रतीक अभिसार, पिंजरा, पंछी, सेज, नदी, नाव आदि ।
छायावाद के अतिपरिचित प्रतीक कली, भ्रमर, पवन, वीणा, झंकार, मेघ, वर्षा, क्षितिज, यामिनी आदि।
अप्रस्तुतों के आवर्तक प्रयोग से बनाए गए (स्वनिर्मित) प्रतीक वेदना जल, दीप, तारा, इन्द्रधनुष, सांध्य गगन नीहार, धूम लेखा आदि ।
महादेवी की कविता में वेदना और रहस्य की प्रधानता है, उन्होंने अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग कर महादेवी ने एक ओर सूक्ष्म भावों और व्यापारों को अभिव्यक्ति दी है, वहीं दूसरी ओर कला का अपूर्व चमत्कार भी समाविष्ट कर दिया है।
उन्होंने अपनी कविताओं में विभिन्न प्रकार के प्रतीकों का सफल प्रयोग किया है, इन प्रतीकों के मध्य दीपक का प्रतीक महादेवी को विशेष प्रिय है।
महादेवी ने अपनी काव्य-यात्रा के प्रथम चरण में ही दीपक के प्रति अपने प्रेम का सूत्रपात कर दिया था। 'प्रथम आयाम' में उनकी दीपक सम्बन्धी पाँच कविताएँ संगृहीत हैं, जो उनकी दीपक के प्रति आत्मीयता सिद्ध करती हैं-
जीवन की अग्नि कथा,
धरती की मौन व्यथा, सूरज जब किरणों की लिपि में लिखा जाता है। पवन शिशु खेल ही में, पृष्ठों को चीर-चीर, व्योम में उड़ाता कभी, धूल में मिलाता है। दीपक इन खण्डों का लौ से नित चुन-चुनकर, उज्ज्वल आलोक-ग्रन्थ इनका बनाता है।
डॉ. सुरेश गौतम के अनुसार "दीपक सबसे महत्त्वपूर्ण और महादेवी का प्रिय प्रतीक है, जो इष्टदेव के चरणों में मूक, एकाकी, शनैः शनैः जलकर अपनी आत्मा का विस्तार कर अपने रंग में सबको रंगने की क्षमता पैदा करता है। दीप-लौ का यही भाव जब करुणा, सहानुभूति के तन्तुओं से कड़ी समान जुड़ जाता है,
तब महादेवी हो जाता है। प्रिय ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए कवयित्री कठोर तपस्या में विश्वास रखती हैं, दीपक उसी एकान्त साधना का प्रतीक बन कर आया है।"
यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो,
अब मन्दिर में इष्ट अकेला, इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो।
दीपक के प्रतीक के माध्यम से महादेवी ने प्रेम, वेदना, संघर्ष, आत्माभिव्यक्ति के मूल्यों का चित्रण किया
है।
उनकी 'दीपक' प्रतीकार्थ से युक्त कविताओं से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कविताओं में केन्द्रीय चरित्र की नियति जलते रहना है और यह जलना आत्मबलिदान की भावना से युक्त हो दूसरों के मार्ग को आलोकित करना है। प्रणय-क्षेत्र में आत्मोत्सर्ग को प्रमुखता देती यह पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
मधुरमधुर मेरे दीपक जल । युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल, प्रियतम का पथ आलोकित कर ।
दीपक के प्रतीक को महादेवी ने अलौकिक प्रियतम के प्रति अपनी साधना और व्याकुलता को प्रकट करने का आधार बनाया है।
उनकी रहस्यवादी और आध्यात्मिक भावनाओं को प्रकट करने के लिए भी दीपक अत्यधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। कई स्थानों पर तो महादेवी स्वयं ही दीपक बन गई हैं जैसे-
धूप-सा तन दीप मैं।
मोम सा तन घुल चुका, अब दीप सा तन जल चुका है।
तम में बनकर दीप, सवेरा आँखों में भर बुझ जाऊँगी।
महादेवी की साधना रहस्यवाद से अनुप्राणित है अतः वे लौकिक संकेतों के माध्यम से अलौकिक सत्ता की ओर संकेत करती हैं। इसके लिए उन्होंने दीपक और उसके समस्त उपकरणों का प्रभावी प्रतीकों के रूप में प्रयोग किया है। देहरूपी दीपक में प्रेमरूपी तेल डालकर महादेवी साधना के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ती हैं और अपने आराध्य के सम्मुख आकर परम आनन्द का अनुभव करती हैं-
लौ ने वर्ती को जाना है, वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने रज का अंचल पहचाना है।
महादेवी की कविता में दीपक कभी मानवीय करुणा का संवाहक बना है तो कभी अध्यात्म और रहस्य का आलम्बन तथा कभी एकनिष्ठ उपासना का उदाहरण डॉ. मेघाव्रत शर्मा के शब्दों में "दीपक की प्रतीक - योजना से महादेवी की रहस्यवादी चेतना की अभिव्यंजना शतगुण निखर आई है। इससे सशक्ततर अन्य कोई प्रतीक हो भी नहीं सकता था। महादेवी की रहस्यवादी काव्य-साधना में गहन आध्यात्मिक मर्म से समच्छ्वसित दीपक भावना का जैसा अपूर्व हृदयावर्जक अंकन है, वह निस्संदेह आधुनिक हिन्दी साहित्य की एक सर्वश्रेष्ठ स्पृहणीय उपलब्धि है।"
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