केदारनाथ सिंह की कविताओं का कथ्य - Text of Kedarnath Singh's poems

गाँव और लोक से गहरी सम्पृक्ति


नयी कविता मुख्य रूप से शहरी जीवन और शहरी भावबोध की कविता रही है। लेकिन केदारनाथ सिंह कविता के इस राजमार्ग पर नहीं चलते. वे अपने लिए एक नयी पगडंडी बनाते है जो गाँव की और जाती है । गाँव और गवई जीवन के अनेकानेक दृश्यों और आख्यानों के सहारे वे हिन्दी कविता के पाठक को लोकजीवन की विशेषताओं से परिचित कराते हैं। लोक और गाँव से उनका लगाव इकहरा न होकर बहुस्तरीय है। प्रगतिवादी कवि त्रिलोचन की तरह भोजपुरी अंचल की मिट्टी, हवा, पानी, बोली-बानी और पशु-पक्षी से लेकर लोक-संस्कृति और लोकसंचित ज्ञान तक को केदारनाथ सिंह बेहद आत्मीयता से अपनी कविता में जगह देते हैं।

उनकी कविता में लोक के सौन्दर्य और संघर्ष दोनों को जगह मिली है। भोजपुरी भाषा के शिखर संस्कृति-पुरुष भिखारी ठाकुर को याद करते हुए कवि अपनी कविता 'भिखारी ठाकुर' में उनका एक मोहक चित्र खींचता है-


इस तरह सरजू के कछार-सा


नाचते हुए बन जाता था


एक सपाट चेहरा कभी घोर पियक्कड़ कभी पृथ्वी का सबसे सुन्दर मूर्ख


कभी वर की खामोशी


कभी घोड़े की हिनहिनाहट


सरयू नदी के कछार जैसे सपाट चहरे वाले भिखारी ठाकुर अपनी नाच मण्डली के लेखक और निर्देशक ही नहीं थे अपितु उसके मुख्य अभिनेता भी थे। कवि इस काव्यांश में नाच मण्डली में उनके द्वारा निभाये गए विभिन्न भूमिकाओं के बिम्ब खींचता है। पहली पंक्ति में ही 'सरजू (सरयू नदी) के कछार' जैसे उपमान का प्रयोग करके कवि अपनी कविता पर भोजपुरी इलाके की संस्कृति और भूगोल के प्रभाव का प्रमाण दे देता है। उनकी कविता में लोक संस्कृति के अनेक रंग हैं। वे कभी नानी और दादी की लोरियों को याद करते हैं और शहरों से गायब होती लोरियों के लिए बिसूरते हैं तो कभी दादरी मेले में लगने वाले पशुमेले का चित्र खींचते हैं।

वे इस लोक में बहुत गहराई से रचे बसे हैं। भोजपुरी अंचल की स्थानीय साँस्कृतिक विशिष्टताएँ और पर्व-त्योहार भी केदारनाथ सिंह की काव्य संवेदना को झंकृत करती रहती है। वे उन पर्वों और उत्सवों में निहित मानवीयता और उल्लास के कायल हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश में प्रचलित आग पर चलने के उत्सव को याद करते हुए वे अपनी कविता में आदमी के आग पर चलने का पूरा विवरण देते हैं-


इसमें कितना समय लगा मेरी स्मृति से वह हिस्सा धुल-पुंछ गया है पर इसके बाद जो हुआ वह एक अंगारे की तरह याद है आदमी ने कुछ सोचा फिर आव देखा न ताव बस पहले ही अंगारे पर रख दिया पाँव तब से पाँव और अंगारा मेरी स्मृति में हुए उसी तरह पड़े हैं।

मैंने कोशिश बहुत की


पर एक को दूसरे से अलगा नहीं सका आज तक


मैं अपने पूरे वजूद से


आदमी के आग पर चलने के करिश्मे पर विश्वास करना चाहता हूँ


कवि के मानस पर लोक का प्रभाव बहुत गहरा है। यह उनकी स्मृति में गुँथे हुए पाँव और अंगारे से स्पष्ट


। शहर में रहने वाले पढ़े-लिखे आधुनिक लोग किसी आदमी के आग पर चलने की घटना पर अविश्वास ही करेंगे। कवि भी शहर में रहते हुए अब तक इस पर अविश्वास ही करता रहा है लेकिन लोकजीवन की सहजता और मानवीयता उसे मजबूर करती है कि वह उस पर विश्वास करे।

कवि के लिए वह उत्सव और उस उत्सव से जुड़ी मानवीयता, उत्साह, सहजता और पवित्रता का अधिक महत्त्व है। इसीलिए कविता उसे मजबूर करती है कि वह अपने पूरे वजूद से उस घटना पर भरोसा करे। इतना ही नहीं केदारनाथ सिंह उस भोजपुरिया अंचल के लोकसं चित ज्ञान पर भी भरोसा करना चाहते हैं। लोकसंचित ज्ञान पर भरोसा करना कहीं-न-कहीं आधुनिक और औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की अपर्याप्तता की ओर इशारा करना भी है। उनकी कविता में एक किसान अपने संचित अनुभव को अपने बेटे से साझा करते हुए कहता है- 


अगर कभी लाल चीटियाँ


दिखाई पड़ें


तो समझना


आँधी आने वाली है


अगर कई कई रातों तक


कभी सुनाई न पड़े स्यारों की आवाज़


तो जान लेना बुरे दिन आने वाले हैं


ऐसा नहीं है कि कवि लोक की आत्मीयता, सहजता, मानवीयता और अनुभवसंचित ज्ञान से ही प्रभावित है बल्कि वह तो भोजपुरी अंचल में रहने वाले भोजपुरियों की अद्भुत जिजीविषा और संघर्ष का भी कायल है। नदियों से घिरा भोजपुरी का यह क्षेत्र सिर्फ़ अपनी कृषि के लिए ही नहीं जाना जाता बल्कि हर साल आने वाले बाढ़ के लिए भी जाना जाता है। लेकिन बाढ़ के पानी में घिरने के बावजूद यहाँ के लोग हताश और निराश नहीं होते, पानी में बहुत कुछ बह जाने के बाद भी जीवन में उनकी आस्था क्षीण नहीं होती -


मगर पानी में घिरे हुए लोग


शिकायत नहीं करते कहीं न कहीं बचा कर रखते हैं


वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में


थोड़ी-सी आग


केदारनाथ सिंह की कविता में यह आग बार-बार आता है जो मनुष्य की जिजीविषा और संघर्ष करने की क्षमता का प्रतीक है।

इस तरह केदारनाथ सिंह की कविता गाँव और लोक की बहुरंगी छवि और अद्भुत जीवटता के चित्र प्रस्तुत करती है।


महानगरीय जीवन से अरुचि


केदारनाथ सिंह की निगाहों में शहर अथवा महानगर मानवीयता, संवेदनशीलता, सहजता, आत्मीयता आदि के कब्रगाह हैं। इसीलिए उनकी कविता गाँव के बनिस्पत शहर के जीवन को पसंद नहीं करती है। धूमिल की तरह केदारनाथ सिंह की कविता में भी शहर गाँव का विलोम है। शहरी जीवन में सम्बन्धों की कृत्रिमता से केदारनाथ सिंह को चिढ़ है और वे इसे नमक शीर्षक कविता के माध्यम से व्यंजित करते हैं-


कि ठीक उसी समय


पुरुष जो कि सबसे अधिक चुप था "दाल फीकी है"


धीरे से बोला --



"फीकी है ?"


स्त्री ने आश्चर्य से पूछा "हाँ, फीकी है- मैं कहता हूँ दाल फीकी है" पुरुष ने लगभग चीखते हुए कहा


न सही दाल


कुछ न कुछ फीका ज़रूर है


सब सोच रहे थे


लेकिन वह क्या है ?


आपसी सम्बन्धों में फीकापन, बनावटीपन, छल-कपट और आडम्बर शहरी जीवन का यथार्थ है। इसी यथार्थ के कारण कवि को शहरी जीवन नापसंद है। शहरी जीवन की अजनबियत, बनावटीपन, कृत्रिमता, अमानवीयता, प्रकृति के सहज रूप को नियन्त्रित करने और मानवेतर की घोर उपेक्षा करने जैसी प्रवृतियों के कारण केदारनाथ सिंह की कविता शहरी जीवन को लगातार कठघरे में खड़ा करती है। शहर में बाज़ार के बढ़ते वर्चस्व ने उसकी अमानवीयता और खोखलेपन में इज़ाफ़ा ही किया है। केदारनाथ सिंह की कविता बाज़ार के इस बढ़ते वर्चस्व का रचनात्मक विरोध करती है-


कैसा रहे


बाज़ार न आये बीच में


और हम एकबार


मिल आयें नमक से


चुपके से मिल आयें चावल से कैसा रहे


पुदीने से


एकबार .... सिर्फ़ एकबार


सभ्यता और महानगरीय जीवन के आवरण को चीर कर कवि पुनः उस आदिम लोक की ओर जाने का आह्नान कर रहा है जो उसकी स्मृतियों में जीवन्त है।

इसका कारण यह है कि लोक आज भी बाजारू चमक-दमक और कृत्रिमता से दूर प्रकृति के सान्निध्य में रंग, रूप और खुशबू के पूरे वैभव के साथ मौजूद है। अपने इस वैभव से वह हमारी इन्द्रियों की संवेदन-शक्ति को उबुद्ध करता है। वह हमारे जीवन में रंग, उमंग, रहस्य और उत्सुकता की पुनर्वापसी करता है और इसतरह हमारी मानवीयता को समृद्ध करता है। केदारनाथ सिंह की कविता बाज़ार और आधुनिक सभ्यता द्वारा फैलायी जा रही अमानवीयता के खिलाफ एक रचनात्मक संघर्ष करती है।


पर्यावरण के प्रति जागरूकता


इस बाज़ार और औद्योगिक सभ्यता की अमानवीयता के खिलाफ संघर्ष का ही एक दूसरा मोर्चा है पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता।

शहर भी पर्यावरण के क्षरण के एक कारण हैं और इसके सबसे बड़े शिकार भी । पर्यावरण में प्रदूषण की वजह से ऐसा लगता है कि शहर स्वयं भी असंतुलित हो गए हैं-


नहीं मुझे कोई भ्रम नहीं


कि मैं इसे ढोकर पहुँचा दूंगा कहीं ओर


या अपने किसी करिश्मे से बचा लूँगा इस शहर को


मैं तो कौओं को


उनका उच्चारण


इसके पानी को


उसका पानीपन


उसकी त्वचा को


उसका स्पर्श लौटना चाहता हूँ


कवि,

अपनी कविता में ही सही, शहर के इस प्रदूषण और असंतुलन को दूर करना चाहता है। लेकिन सिर्फ़ शहर ही क्यों ? यह सभ्यता ही ऐसी है कि इसके प्रदूषण से कोई भी अछूता नहीं है, खुद इंसान भी अपने आन्तरिक प्रदूषण के कारण अपनी सरलता, सहजता और मानवीयता खो चुका है। आधुनिक सभ्यता की इस बाह्य और आन्तरिक प्रदूषण की पहचान करते हुए कवि बहुत वेदनामय स्वर में कहता है-


पर कोई करे भी तो क्या


समय ही कुछ ऐसा है कि पानी नदी में हो


या किसी के चेहरे पर झाँक कर देखो तो तल में कचरा


कहीं दिख ही जाता है !


कवि की स्पष्ट मान्यता है कि इस आधुनिकता और औद्योगिकरण ने सिर्फ़ बाहरी परिवेश में ही कचरा नहीं फैलाया है बल्कि हमारे भीतर की कालिमा को भी गहरा किया है। बाहर और भीतर के इस कचरे और कलुष ने हमारी मानवीयता का क्षरण किया है।


मानवता और उसके भविष्य में गहरी आस्था


शहरी जीवन और औद्योगिक सभ्यता के कारण पैदा हो रहीं विसंगतियों और अमानवीय परिस्थितियों के बावजूद कवि हताश नहीं है। उसे अब भी मानवता के भविष्य में गहरी आस्था है। उसे पूरा भरोसा है कि एक दिन मानवीयता, आत्मीयता, सहजता और सरलता को बचाया जा सकेगा। यह भरोसा भी उसको लोक से ही है। यानी लोक ही अन्ततः मानवीयता को बचाने में सफल हो सकेगा। गाँव और क़स्बे में रहने वाला गरीब-गुरबा ही अन्ततः इस मानवीयता को बचाने के लिए आगे आएगा।


सचाई यह है कि सारे माहौल में


सिर्फ़ यह धूल है


सिर्फ़ इस धूल का लगातार उड़ना जो मेरे यकीन को अब भी बचाए हुए है


नमक में


और पानी में


और पृथ्वी के भविष्य में


और दन्तकथाओं में


केदारनाथ सिंह की कविता में इस लोक की पहचान धूल की उपस्थिति से होती है। गरीब-गुरबा का जीवन इस धूल से सना होता है। केदार के कवि को इस धूल से खासा लगाव है क्योकि उन्हें गाँव में रहने वाले इन गरीब लोगों और आमजन से गहरा प्रेम है। इस गहरे प्रेम का कारण यह है कि वहीं पर आज भी मानवीयता, सहजता और निष्कलुष आत्मीयता बची हुई है।