काव्य के विषय - theme of poetry
सामान्यतः इस बाह्य जगत की कोई भी वस्तु जो संवेदना के धरातल पर कवि या लेखक को प्रभावित करने में समर्थ है, काव्य के विषय के रूप में ग्रहण किए जाने का आधार रखती है। साहित्य में वर्ण्य विषय का चुनाव करते समय लेखक का यही दृष्टिकोण रहता है। अज्ञेय का मानना है कि "कला की सामग्री को सीमित करना अनधिकार चेष्टा है तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखकर हम जैसी प्रेरणा चाहते हैं, वह यदि साहित्यकार में स्वभावतया नहीं है तो हम बलात् उसे पैदा नहीं कर सकते।" सैद्धान्तिक तौर पर अज्ञेय का यह मत सर्वथा उचित प्रतीत होता है।
यह सच है कि साहित्य की समीक्षा को सीमित नहीं किया जाना चाहिए और यह भी किसी साहित्यकार में किसी वस्तु, घटना अथवा स्थिति के प्रति स्वभावतः यदि प्रेरणा उत्पन्न नहीं होती तो उसे बलात् पैदा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालाँकि, अज्ञेय के ये विचार काव्य-विषय को लेकर व्यक्त किए गए उनके सहज विचार न होकर एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया को सूचित करते हैं। उनकी दृष्टि में संसार की अनुभूतियाँ और घटनाएँ साहित्यकार के लिए मिट्टी हैं जिनसे वह प्रतिमा बनाता है, वह निरी सामग्री है,
उपकरण है। वह कलाकार को बाँध नहीं सकती, कलाकार उसका मनमाना प्रयोग कर सकता है, मनचाहे अंशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
अज्ञेय काव्य-विषय और काव्यवस्तु में विभेद करते हैं। उनके अनुसार "काव्य का विषय और काव्य की वस्तु अलग-अलग चीजें हैं... कवि कोई नया विषय लेकर भी वह पुरानी वस्तु भी दे सकता है और कोई पुराना विषय लेकर नयी वस्तु भी दे सकता है। इसलिए काव्य कैसा है,
यह विचार करने के लिए विषय कैसा है या क्या है, नया है या पुराना है अथवा नहीं है, इसकी परीक्षा उतनी आवश्यक व उपयोगी नहीं है, जितनी कि उसकी वस्तु की परीक्षा । विषय भी छोटे-बड़े हो सकते हैं, कम या अधिक महत्त्व के हो सकते हैं और उसका भी कुछ विचार तो होगा ही, पर साहित्यिक मूल्यांकन प्रथमतः वस्तु से सम्बन्ध रखेगा।" इस प्रकार अज्ञेय के काव्य- य-विवेचन में विषय का बहुत कम महत्त्व है। असली महत्त्व वस्तु का है। और वस्तु का महत्त्व भी इसलिए है कि वह वस्तु मानवीय है और उसके सहारे हम कृतिकार के मन में पहुँचते हैं, उसकी परख करते हैं कि कैसे वह वस्तु तक पहुँचा, कैसे उसे उसकी संवेदना ने ग्रहण किया और कैसे बहुजन संवेद्य किया कैसे प्रेषणीय बनाया।
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