काव्य मीमांसा का सैद्धान्तिक आधार - Theoretical Basis of Kavya Mimamsa

कवि आलोचकों ने आलोचना कर्म में उल्लेखनीय हस्तक्षेप किया है। उनकी स्थापनाओं को एक आलोचक की वस्तुपरकता और गम्भीरता के साथ लिया जाना उचित है। हिन्दी के छायावादी काव्य- चिन्तन का एक सुस्पष्ट निर्देश व विवेचन हमें जयशंकर प्रसाद के काव्य- चिन्तन में उपलब्ध होता है। यद्यपि उनके विचार समीक्षा की दृष्टि से बहुत गहरे और तात्विक नहीं हैं किन्तु स्वानुभूति से सम्बद्ध होने के कारण वे प्रामाणिकता से युक्त हो उठे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में डॉ. नामवर सिंह का मत अवलोकनीय है- "छायावादी कवियों की समीक्षाओं का ऐतिहासिक महत्त्व इस बात में है कि ये उनके साहित्य-सृजन के अनुभवों से उत्पन्न हुई है। इसलिए ऐसी समीक्षाएँ अधिक सृजनात्मक तथा प्रभावशाली होती हैं।

इनकी उपयोगिता एवं महत्त्व किसी विषय अथवा समस्या सम्बन्धी विवेचना की पूर्णता, व्यवस्था अथवा सांगोपांगता में नहीं अपितु मौलिक संकेतों में हैं ।" छायावादी कवियों में जयशंकर प्रसाद एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने पश्चिमी दर्शन और पश्चिमी साहित्य से प्रभाव न ग्रहण करते हुए अपने काव्य सम्बन्धी विचारों को विशुद्ध भारतीय साहित्य और दर्शन की पीठिका दी है। पाश्चात्य स्वच्छन्दतावादी काव्य-चिन्तकों के मतों से यदि उनके विचारों का साम्य दिखाई पड़ता है तो इसका प्रधान कारण यही है कि वे उस सर्जना के पुरस्कर्त्ता हैं जो विशुद्धतः आत्मानुभूति की प्रधानता पर बल देती हैं।


जयशंकर प्रसाद का काव्य- चिन्तन पर भारतीय शैव दर्शन और संस्कृत के काव्य संस्कारों का घनीभूत प्रभाव है। अपनी सुसंस्कृत और प्रांजल शैली में उन्होंने छायावादी कविता की तात्विकता को स्पष्ट किया है। समकालीन आलोचक मधुरेश तार्किक ढंग उनकी आलोचना-शैली का वैशिष्ट्य प्रतिपादित करते हैं- "छायावादी कवियों के लिए आलोचना बहुत कुछ एक आपद्धर्म की तरह थी। छायावाद के चौतरफा और व्यापक विरोध ने ही वस्तुतः तत्युगीन कवियों को आलोचना-कर्म के लिए विवश किया।

जैसे कभी अंग्रेजी कविता में कवि वईसवर्थ के लिए 'लिरिकल वैलेड्स' की भूमिका को रोमांटिक काव्यान्दोलन के घोषणापत्र के रूप में लिया गया और फिर उसके बाद प्रायः उस आन्दोलन से जुड़े सभी कवियों ने महत्त्वपूर्ण गद्य भी लिखा। अपनी परवर्ती काव्य संवेदना की व्याख्या एवं स्पष्टीकरण में लगभग यही स्थिति छायावादी कवियों के साथ भी थी। ... छायावाद के प्रवर्तन का श्रेय भले ही कुछ लोग मुकुटधर पाण्डेय को देते रहे हों लेकिन इस काव्य आन्दोलन और कविता की बदलती हुई संवेदना का जैसा सूक्ष्म व व्यवस्थित विवेचन उसके चार प्रमुख कवियों- जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी वर्मा में उपलब्ध है, वह छायावादी काव्य प्रवृत्ति की समझ को तो विस्तार देता ही है, वह हिन्दी आलोचना की भी एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। "