सैद्धान्तिक आलोचना - theoretical criticism
नयी कविता के पुरस्कर्त्ताओं, विशेषकर कवि आलोचकों ने नयी कविता को पूर्ववर्ती कविता का क्रमिक विकास मानते हुए उसे एक स्वतन्त्र सर्जना के रूप में अभिव्यक्त किया है। साथ ही, उस रचना में निहित सर्जनात्मक दृष्टि की पूर्ववर्ती कविता से तुलना करते हुए विस्तारपूर्वक व्याख्यायित भी किया है। विजयदेवनारायण साही ने इस कार्य को पूरे मनोयोग से किया है तथा नयी कविता के सिद्धान्त पक्ष की नवीन व्याख्या प्रस्तुत की है। जो उसे पूर्ववर्ती काव्य की तुलना में एक वैशिष्ट्य प्रदान करती है।
लघु मानव
परम्परा से कविता और कला में मनुष्य का कोई-न-कोई रूप उद्घाटित होता रहा है।
प्रत्येक युग के रचनाकार ने अपने युगीन सन्दर्भों के अनुरूप मनुष्य को अपनी रचना में रूपायित किया है। मनुष्य के सम्बन्ध में हर युग की कविता अपने ढंग से चिन्तनशील रही है और उसने अपनी सीमा में उस मनुष्य को रूपायित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद सभी काव्य आन्दोलन मनुष्य के किसी-न- किसी रूप को लेकर सामने आए हैं। छायावाद में जो हम मनुष्य का रूप देखते हैं, वह एक विशिष्ट मानव है जिसमें समूचे छायावादी आदर्श अपनी अभिव्यक्ति पाते हैं।
हालाँकि, कालान्तर में छायावाद का यह मानव अपनी प्रासंगिकता खो देता है। प्रगतिवाद में आकर मानव का एक नया रूप प्रकट होता है जो यद्यपि छायावादी युग के मानव से अलग है, फिर भी एक विशिष्ट प्रकार का मनुष्य ही है जिसमें प्रगतिवाद का अपना आदर्श मुखरित हुआ है। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि प्रयोगवाद में आकर यह विशिष्ट मानव भी बे-पहचान मालूम होने लगता है। और विशिष्ट मानव के स्थान पर एक ऐसे मानव का उदय होता है जो अपनी परिस्थितिगत विषमता से पूरी तरह बोझिल है। इसके बावजूद बे-पहचान मानव में अपने परिवेश के प्रति चिन्ता के साथ-साथ उसका दबाव भी है और उस दबाव के बीच अपनी अस्मिता को बनाए रखने की तीव्र इच्छा भी ।
'क्षण' के बाद 'लघु मानव' का सिद्धान्त भी नयी कविता युगीन कवि आलोचकों की बहस का विषय रहा है। इसे आलोचना के केन्द्र में प्रस्तुत करने का श्रेय विजयदेवनारायण साही को जाता है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित निबन्ध 'लघु मानव के बहाने हिन्दी कविता पर एक बहस' में छायावादी महामानव और प्रगतिवाद के सामान्य मानव से इसको पृथक् कर उसके स्वरूप पर एक सार्थक बहस प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। उनकी स्थापना है कि लघु और महत् में कोई शत्रुता नहीं हैं, द्वेष नहीं है।
वे कहते हैं- "अच्छा हो कि हम मानकर ही चलें कि लघु की कल्पना मनुष्य में जो महत् है उसका निषेध नहीं करती।... छायावादी युग का लघु प्रति क्षण महत् में विसर्जित या विलीन हो जाने को आतुर है। या हम यों कहें कि छायावादी दृष्टि उसे उस आतुरता के क्षण में ही पकड़ती है। उससे पहले या उसके तले देखते ही नहीं। उसके लिए लघु का कोई साकार ठोस प्रतिरोधी रूप प्रस्तुत ही नहीं होता। मानव या तो महामानव है या है ही नहीं। चाहे यह महामानव प्रधानतः नैतिक हो या कल्पनात्मक, इसमें शक नहीं कि छायावादी दृष्टि में एनर्जी और अनुगूँज है, क्योंकि हर तरह का विसर्जन एनर्जी को जन्म देता है, लेकिन मनुष्य का प्राण शक्ति का यही एक मात्र दिग्दर्शन नहीं है।"
वस्तुतः साही छायावादी लघु मानव के भीतर प्रतिरोधी शक्ति का अभाव देखते हैं, क्योंकि वह विसर्जन से ही ऊर्जा प्राप्त करता है और लघु से महत् होने में ही अपनी सार्थकता देखता है। यही कारण है कि उनका लघु मानव साकार ठोस प्रतिरोधी रूप लिए विसर्जन में भी अपनी पहचान को बनाए रखता है। चूँकि साही में सघन सामाजिकता है, इसलिए वे लघु मानव के बहाने काव्य की विशिष्ट, अर्थवत्ता को कला और जीवन की सापेक्षता में स्पष्ट करते हुए एक खास काव्य- य-चिन्तन व दृष्टि का परिचय देते हैं।
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