विचार कविता पृष्ठभूमि, तात्पर्य एवं स्वरूप - thought poem background, meaning and form
सन् 1969 में 'दिविक' पत्रिका के माध्यम से विचार कविता का विचार सर्वप्रथम उभरकर आया किन्तु इसे वास्तव में स्थैर्य मिला 'संचेतना' पत्रिका के माध्यम से सन् 1973 में महीप सिंह और नरेन्द्र मोहन के सम्पादकत्व में 'संचेतना पत्रिका का विचार कवितांक 'विचार कविता' शीर्षक के साथ प्रकाशित वैसे हुआ। साठोत्तरी समय में कई काव्यान्दोलन हुए किन्तु उनमें से अधिकांश नाम विफल ही रहे। विचार कविता अपने समय का एक सार्थक काव्यान्दोलन माना जाता है। विचार कविता को बलदेव वंशी, मुक्तिबोध, नरेन्द्र मोहन, वेणु गोपाल, ज्ञानेन्द्रपति, चन्द्रकान्त देवताले आदि कवियों का समर्थन प्राप्त हुआ।
विचार कविता में 'विचार' सर्वोपरि था। वैसे देखा जाए तो कोई रचना विचार से मुक्त हो ही नहीं सकती।
रामदरश मिश्र इस सन्दर्भ में कहते हैं कि "आज की कोई भी स्वस्थ कविता, वह चाहे गीत ही क्यों न हो, विचार से मुक्त नहीं रह सकती।" मिश्रजी के विचारों से सहमति दर्शाते हुए विचार कविता आगे बढ़ने लगी। इस कविता की प्रवृत्ति स्पष्ट करते हुए नरेन्द्र मोहन अपनी पुस्तक 'कविता की वैचारिक भूमिका' में लिखते हैं- "कविता के विचार को किसी एक विचार में आबद्ध नहीं किया जा सकता न किसी विचारधारा में बंद किया जा सकता है.. कविता में विचार के अनुपस्थित और अप्रासंगिक हो जाने का अर्थ विचार के अनुपस्थित और अप्रासंगिक होने से नहीं है। विचार कविता के सम्पूर्ण विधान में गुँथा रहता है। कविता विचार को ओढ़ती नहीं है, उसे अपने लिए वास्तविकता की पहचान के निमित्त तलाशती है। 945
विचार समसामयिक परिस्थितियों में निहित होता है और कविता में संचरित होकर अभिव्यक्त होता है। विचार कविता ने नारेबाजी, जुमलेबाजी और बड़बोलेपन से थोड़ा बचकर जीवन की असंगतियों और विरोधाभासों का साक्षात्कार करने पर बल दिया। संयमित अनुभूतियों को विचार कविता ने महत्त्व दिया। जीवन के अनुभवों को विचार का अधिष्ठान प्रदान कर कविता का रूप तैयार किया जाता था। अतः इस कविता में अनुभूति और विचार का उत्कृष्ट समीकरण देखा जा सकता है। अनुभवाधारित होने के कारण विचार कविता संवेदना से रहित नहीं थी। इस सन्दर्भ में बलदेव वंशी का एक कथन बड़ा महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं- "समकालीन हिन्दी कविता अपनी प्रगति और प्रभाव से जिस मानवीय संघर्ष की साझेदारी में उतरी है, उसके पास लड़ने के लिए आधार और शस्त्र 'विचार' हैं।
यह विचार वैज्ञानिक दक्षता अथवा विचारधारात्मक कठोरता से रहित, सामाजिक अनुभवों से उद्भूत मानवीय और संवेदनात्मक विचार है। "46.
तात्पर्य यह कि विचार कविता भाव से मुक्त नहीं थी बल्कि विशिष्ट विचारधारा की कट्टरता से व्युत्पन्न कठोरता से मुक्त थी। कई बार विचार कविता ने कट्टरपन का ठेठ विरोध किया "ये कविताएँ अकविताई और वामपंथी दुस्साहस से अलग हटकर हैं। 'विचार कविता' का प्रतिनिधि रूप इन कविता में उपलब्ध है । अकविताओं और 'विचार कविता' का विरोध तो साफ है, किन्तु विचार कविता का वामपंथ से कोई खास विरोध हो, ऐसी बात नहीं है। वास्तव में यहाँ विरोध दुस्साहसिकता से है ..... 47.
बिना किसी हो-हल्ले के एक धूर्त राजनीतिज्ञ को सम्बोधित करता नरेन्द्र मोहन का वैचारिक संवाद 'विचार कविता' में निहित विचार-प्रधानता को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है-
मैं नहीं मान सकता
हाँ, यह ज़रूर है आपने साधना द्वारा
आपकी चमड़ी है ही नहीं इतना सख्त बना लिया है इसे कि किसी बड़े धमाके के बिना इसमें कोई हरकत नहीं होती। 48
इस कविता में निहित तटस्थ आलोचक दृष्टि सम्पूर्ण समकालीन कविता में विशिष्ट नजर आती है। विचार कविता में कोई हंगामा नहीं, अतिवाद नहीं, केवल वैचारिक प्रक्रिया को उत्तेजित करते वक्तव्य हैं जिन्होंने इस कविता को भीड़ में भी विशिष्ट बना दिया।
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