परम्परा और आधुनिकता - tradition and modernity

हिन्दी आलोचना परम्परा में कविता तथा कला के मूल्यांकन के सन्दर्भ में परम्परा तथा आधुनिकता पर गहराई से विचार किया गया है। मुक्तिबोध द्वारा कविता तथा कला के वर्गीय आधारों में अब तक की कला तथा कविता को वर्गबद्ध समाज की देन माना गया है। इस स्थापना पर परम्परा के अवमूल्यन का आरोप भी लगाया जाता है। परम्परा तथा आधुनिकता के सम्बन्ध में मुक्तिबोध ने आधुनिकतावादी दृष्टि के नाम पर वास्तविक आधुनिक दृष्टि का नहीं, अपितु उसके नाम पर हासोन्मुखी विचारधाराओं का विरोध किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आधुनिकता समूचे दृष्टिकोण में होती है। उस सारे दृष्टिकोण में जो सारे चिन्तन सर्जन के बीच प्राणशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होता है। उनकी दृष्टि में "अनास्थावादी काव्य दृष्टि आधुनिक भाव बोध नहीं है; क्योंकि उसमें जन साधारण के भयानक जीवन संघर्ष, तज्जनित संताप और विरोध भावनाओं के लिए स्थान नहीं है। "