डॉ. रामविलास शर्मा का परम्परा मूल्यांकन - Tradition evaluation of Dr. Ram Vilas Sharma

डॉ० रामविलास शर्मा ने वैदिक साहित्य से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य का मूल्यांकन किया हैं। उनके अनुसार हम नये समाज और नयी संस्कृति का निर्माण न तो अपनी परम्परा से विच्छिन्न होकर कर सकते हैं और न ही उसके अनुसरण मात्र के आधार पर। डॉ. शर्मा ने लिखा है कि "समाज-व्यवस्था बदलने के साथ, उसके विचार भी बदलते हैं, लेकिन नयी विचारधाराओं का विकास हवा में नहीं होगा, वे पहले की विचारधाराओं से अपने लिए बहुत से तत्त्व समेट कर अपना विकास करती हैं।... हम पुराने साहित्यकारों से रचना-कौशल,

भाव-सौन्दर्य, इन्द्रियबोध का परिष्कार ही नहीं सीख सकते, उनसे विचारधारा के क्षेत्र में भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।" (- 'मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य)


प्रगतिशील रचनाकार मनुष्य के शोषण और दमन को समाप्त कर एक नये समाज और सांस्कृतिक परिवेश का निर्माण करना चाहता है। परम्परा का मूल्यांकनभी इसलिए किया जाना जरूरी है ताकि हम उससे सबक लेकर एक शोषणविहीन समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकें। डॉ. शर्मा के शब्दों में "साहित्य की परम्परा का मूल्यां कनकरते हुए सबसे पहले हम उस साहित्य का मूल्य निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता है।

इसके साथ हम उस साहित्य पर ध्यान देते हैं जिसकी रचना का आधार शोषित जनता का श्रम है, और यह देखने का प्रयत्न करते हैं कि वह वर्तमान काल में जनता के लिए कहाँ तक उपयोगी है और उसका उपयोग किस तरह से हो सकता है।" (- 'परम्परा का मूल्यांकन) केवल इतना ही नहीं, बल्कि "जो साहित्य सीधे सम्पत्तिशाली वर्गों की देख-रेख में रचा गया है और उसके वर्ग हितों को प्रतिबिम्बित करता है, उसे भी परख कर देखना चाहिए कि वह अभ्युदयशील वर्ग का साहित्य है या हासमान वर्ग का ।" (- 'परम्परा का मूल्यांकन') वस्तुतः यही वह पद्धति है जिसे डॉ. शर्मा ने साहित्य और परम्परा के मूल्यांकन में अपनाया है।