आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का परम्परा, आधुनिकता और परिवर्तन - Tradition, modernity and change of Acharya Hazariprasad Dwivedi

आचार्य द्विवेदी परम्परा को अपने परिवेश के संग्रह त्याग की आवश्यकताओं के अनुरूप क्रियाशील रहने वाली एक जीवन्त प्रक्रिया मानते हैं। परम्परा अतीत की समानार्थक नहीं है। परम्परा के सन्दर्भ में ही आधुनिकता को सही ढंग से समझा जा सकता है। द्विवेदी जी के अनुसार मनुष्य ने अपने अनुभवों से जिन महान् मूल्यों को अर्जित किया है उन्हें नये सन्दर्भों में देखने की दृष्टि आधुनिकता है। वे इतिहास की स्वीकृति और 'सचेत परिवर्तनेच्छा' को आधुनिकता का प्रमुख लक्षण मानते हैं। आधुनिकता समाज के विकास की एक अवस्था से निर्मित मानव-चेतना का एक रूप है। जिस साहित्य में आधुनिक जीवन के ज्वलन्त प्रश्नों और सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति होती है, वही साहित्य आधुनिकता बोध से युक्त माना जा सकता है।


आचार्य द्विवेदी के आलोचनात्मक विवेक का विकास अपने समय की बौद्धिक चुनौतियों से टकराते हुए और ऐतिहासिक प्रश्नों को हल करने के प्रयासों के अन्तर्गत हुआ है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बौद्धिक उपनिवेश से मुक्ति के लिए वैचारिक आधार प्राप्त करने की थी। उन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति की विलुप्त परम्पराओं की खोज की और इतिहास की टूटी हुई कड़ियों को जोड़ा। यह कार्य चुनौती भरा इसलिए भी था कि स्वयं द्विवेदी जी के चिन्तन पर प्राचीन और मध्यकालीन मूल्यों का गहरा प्रभाव था। आधुनिक समय की साहित्यिक और सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान प्राप्त करने में इन मूल्यों से जूझना उनके लिए आवश्यक था।

प्राचीन और मध्यकालीन ऐतिहासिक प्रश्नों को आधुनिक समय की ज़रूरतों की दृष्टि से पुनर्व्याख्यायित करने की प्रक्रिया में ही द्विवेदी जी साहित्य और संस्कृति की विभिन्न चुनौतियों से टकराए और अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। इसलिए उन्हें साहित्य का विशुद्ध आलोचक नहीं कहा जा सकता। इतिहास के प्रश्नों के उत्तर साहित्य और संस्कृति की टूटी हुई कड़ियों को जोड़कर प्राप्त करने का कार्य कितना कठिन होता है, यह आत्मसंघर्ष और उलझन द्विवेदी जी के रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन में मौजूद है।


आचार्य द्विवेदी इतिहास की दिशा को पहचानते हुए एक और परम्परा और आधुनिकता को विकास- प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तो दूसरी ओर वर्तमान और भविष्य के बीच विकसित होते सम्बन्धों को भी सदैव अपनी चिन्ता के केन्द्र में रखते हैं।

भारत में काल्पनिक भारतमाता का जयघोष करने वाले लोग भारतवर्ष को किस • प्रकार एक अर्थहीन शब्द बना रहे हैं, द्विवेदी जी यह देख रहे थे। उनके नारों की निरर्थकता बताते हुए उन्होंने लिखा हैं कि "भारतवर्ष उन करोड़ों दलित और मूक जनता से अभिन्न है, जिन्हें छूने से भी पाप का अनुभव किया जाता है।" (- 'अशोक के फूल') सुधारवादी आन्दोलनों की सीमाओं को दिखा कर समाज के निम्न वर्ग के लोगों के वास्तविक उत्थान की दिशा का संकेत करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं- "इस देश में बहुत से साधुमना व्यक्ति हैं, जो समझते हैं कि वेद पढ़ा देने या जनेऊ पहना देने से इन जातियों का उद्धार हो जायेगा।

बहुत से लोग इनका छुआ अन्न ग्रहण कर लेने के कारण अपने को बड़ा सुधारवादी समझते हैं। यह मनोवृत्ति उचित नहीं है। जन जागृति जिस दिन सचमुच होगी, उस दिन ऊँची मर्यादा वाले इनका उद्धार नहीं करेंगे, ये स्वयं अपनी मर्यादा उच्च बनायेंगे। वह अपूर्व साम्य होगा जब शताब्दियों से पददलित, निर्वाक्, निरन्न जनता समुद्र लहरियों के फूत्कार के समान गर्जन से अपना अधिकार माँगेगी। उस दिन हमारी सभी कल्पनाएँ न जाने क्या रूप धारण करेंगी, जिसे हम 'भारतीय सभ्यता', 'हिन्दू संस्कृति' आदि अस्पष्ट भुलावे वाले शब्दों से प्रकट किया करते हैं। ... निस्सन्देह यह जागृति धर्म और समाज सुधार का सहारा नहीं लेगी। वह आर्थिक और राजनैतिक शक्तियों पर कब्जा करेगी।"

(- 'अशोक के फूल') समाज के कमजोर वर्ग के कष्ट और शोषण को समाप्त करने के लिए सुधारवादी दृष्टिकोण की आलोचना तथा जनता के संघर्ष में अटूट विश्वास और सामाजिक परिवर्तन की आशा की अभिव्यक्ति द्विवेदी जी के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक चिन्तन के आधुनिक और प्रगतिशील होने के प्रमाण हैं।


आचार्य द्विवेदी साहित्य का सम्बन्ध मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से मानते हैं। उन्होंने साहित्य में जीवन की समग्र अभिव्यक्ति और सामाजिक परिवर्तन को आवश्यक बताते हुए लिखा है कि "आज जनता की दुर्दशा को यदि आप सचमुच ही उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो आप चाहे जो भी मार्ग लें, राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकते,

अर्थनीति की उपेक्षा नहीं कर सकते और विज्ञान की नयी प्रवृत्तियों से अपरिचित रह कर कुछ नहीं कर सकते। साहित्य केवल बुद्धि-विलास नहीं है। वह जीवन की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकता।" (- 'अशोक के फूल')


सामाजिक परिवर्तन का साहित्य के रूपों और उसकी सामाजिक स्वीकृति अस्वीकृति पर प्रभाव पड़ता है। द्विवेदी जी ने इस प्रभाव को महत्त्वपूर्ण माना है। साहित्य के सृजन और आस्वादन दोनों ही दृष्टियों से सामाजिक मूल्यों और व्यवस्थाओं के परिवर्तन की जानकारी आवश्यक होती है, क्योंकि साहित्यिक मूल्यों के परिवर्तन से सामाजिक मूल्यों के परिवर्तन का गहरा सम्बन्ध होता है। समाज और साहित्य की विकास प्रक्रिया अन्तरसम्बन्धित है।