हिन्दी आलोचना की परम्परा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - Tradition of Hindi criticism and Acharya Ramchandra Shukla

आचार्य शुक्ल ने जब लेखन कार्य शुरू किया था तब भारतेन्दु-युग की आधुनिक चेतना और नवजागरण का प्रसार समाज और साहित्य में हो रहा था। आधुनिकता के साथ हिन्दी में गद्य-युग आरम्भ हो चुका था । रीतिकालीन संस्कारों और नवीन युगीन प्रवृत्तियों का द्वन्द्व अभी चल रहा था। राष्ट्रीय जन-जागरण की लहरें तथा विदेशी चिन्तन की विभिन्न धाराएँ जनमन को आलोड़ित कर रही थीं। भारतीय समाज नवनिर्माण की हलचलों से आन्दोलित था । आलोचना में यद्यपि नयी प्रवृत्तियाँ प्रकट हो रही थीं, परन्तु रीति-साहित्य अभी भी आलोचना की कसौटी बना हुआ था।

ऐसे परिवेश में शुक्ल जी ने नये सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति में रीति-काव्य की कोई भूमिका नहीं देखी । यह भूमिका उन्होंने भक्ति काव्य में देखी। उन्होंने भक्ति-साहित्य को साहित्यिक चर्चा और आलोचना का केन्द्र बनाया तथा युगीन सन्दर्भों में उसकी व्याख्या की। उनके साहित्य-संस्कार भक्ति काव्य के अवगाहन तथा संस्कृत साहित्य की परम्परा से निर्मित हुए थे। उन्होंने देश-काल की परिस्थितियों और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान का अनुशीलन करके अपना साहित्य-विवेक अर्जित किया था।


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के छायावाद काल में आलोचना में प्रवृत्त हुए थे। उस समय भारत के सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में व्यापक परिवर्तन लक्षित हो रहे थे।

उन्नीसवीं सदी में आरम्भ हुए सामाजिक सुधार अब जन-आन्दोलन का रूप ले रहे थे। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए जनता की बढ़ती हुई भागीदारी सामन्तवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध जन-संघर्षो में प्रकट हो रही थी। प्राचीन और नवीन की टकराहट साफ थी लेकिन लक्ष्य अस्पष्ट था। शुक्ल जी ने इसी संक्रमण-काल में दायित्व बोध से लैस होकर अपनी साहित्य- परम्परा को आत्मसात किया तथा हिन्दी आलोचना का एक सुसंगत ढाँचा तैयार करने का ऐतिहासिक कार्य किया।


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में द्विवेदी युग तक की हिन्दी आलोचना के स्वरूप को रूढिगत ही माना है।

इसके विकास पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है कि "यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुणदोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परम्परागत विषयों तक पहुँची । स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें किसी कवि की अन्तर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती हैं, बहुत ही कम दिखाई पड़ी। " शुक्ल जी के अनुसार समालोचना के इस आदर्श में सन् 1918 से आरम्भ हुए हिन्दी साहित्य के तृतीय उत्थान में परिवर्तन आया तथा आलोचकों ने कृति के गुण-दोष प्रदर्शन से आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और अन्तः प्रवृत्ति की छानबीन की ओर ध्यान दिया। कहना न होगा कि यह कार्य सबसे पहले स्वयं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ही किया।

अपनी पूर्ववर्ती आलोचना में उन्हें जो कमियाँ दिखाई दीं, अपनी आलोचना में पूरी तरह से तटस्थ रहकर उन्होंने उन कमियों को पूरा किया और आलोचना का एक व्यवस्थित और सुसंगत ढाँचा खड़ा किया।


आचार्य शुक्ल ने नागरी प्रचारिणी सभा की योजनाओं से जुड़कर 'हिन्दी शब्द-सागर' (1929 ई.) का सम्पादन किया और 'हिन्दी साहित्य का विकास' शीर्षक से उसकी भूमिका लिखी, जिसे बाद में कुछ परिवर्द्धित रूप में 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' नाम से स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित करवाया।

उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन कार्य भी किया। उन्होंने व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में हिन्दी के तीन महान् कवियों सूर, तुलसी और जायसी के ग्रन्थों का सम्पादन किया और उनकी भूमिकाएँ लिखीं। अपने गौरवशाली ग्रन्थ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' के अतिरिक्त 'गोस्वामी तुलसीदास', 'जायसी ग्रन्थावली', 'भ्रमरगीत सार' आदि के सम्पादन के माध्यम से शुक्ल जी ने हिन्दी में व्यावहारिक आलोचना को कृति के गुण- दोष विवेचन से ऊपर उठाकर साहित्य के मर्म का उद्घाटन करने की राह दिखाई। उन्होंने जर्मन वैज्ञानिक हैकल की पुस्तक Riddle of the Universe का 'विश्वप्रपंच' शीर्षक से अनुवाद किया और हिन्दी पाठकों के लिए उसकी लम्बी भूमिका लिखी।

इसमें शुक्ल जी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पता चलता है, जो उनके साहित्यिक विचारों को समझने में भी सहायक है। कुछ कृतियों के हिन्दी अनुवाद के अतिरिक्त शुक्ल जी ने सैद्धान्तिक समीक्षा पर प्रचुर मात्रा में लिखा। उनका यह लेखन 'चिन्तामणि' और 'रस मीमांसा' पुस्तकों में विद्यमान है ।


हिन्दी आलोचना में शुक्ल जी के आगमन से हिन्दी पाठकों की साहित्यिक रुचि में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ तथा आलोचना का केन्द्र देव - बिहारी के झगड़े से ऊपर उठकर भक्तिकाव्य बन गया। यद्यपि शुक्ल जी ने कवियों का कोई श्रेणी विभाजन नहीं किया, परन्तु अपने चुनाव और पसंद से उन्होंने हिन्दी की साहित्यिक परम्परा का पुनर्गठन किया।


इस पृष्ठभूमि में अब हम शुक्ल जी की आलोचना को समझने का प्रयास करेंगे