हिन्दी नवगीत की परम्परा - Tradition of Hindi Navgeet
भारतीय साहित्य में गीतिकाव्य की परम्परा प्रारम्भ से प्रचलित है। मानव में आरम्भ से ही गीत रचने और गुनगुनाने की प्रवृत्ति रही है। 'गायन' और 'नर्तन' दोनों ही कलाओं में मानवीय मन सदा से रम रहा है। कहना न होगा कि नर्तन गायन सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही अस्तित्व में आया। हमारा वैदिक साहित्य गीत का अमूल्य भण्डार है। 'सामवेद' की ऋचाएँ गीतों का श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।
‘सामवेद' के पश्चात् लौकिक संस्कृत में जयदेव पहले एवं लोकप्रिय गीतकार हुए जिनका 'गीतगोविन्द' गीतिकाव्य का उत्कृष्ट नमूना है। 'गीतगोविन्द' एक आदर्श गीतिकाव्य है जिसमें जयदेव ने गीतों के माध्यम से ईश्वर (कृष्ण) की स्तुति की है, यहाँ कवि ने अलौकिक प्रेम की व्यंजना करने के लिए लौकिक प्रेम का सहारा लिया हैं।
हालाँकि जयदेव से पूर्व एवं वैदिककाल के पश्चात् बौद्ध साहित्य की 'थेरी गाथाओं', कालिदास व भवभूति की कृतियों एवं आचार्य क्षेमेन्द्र के 'दशावतारचरित' में कुछ गेय पदों की रचनाएँ मिलती हैं पर वे परिमाण में अल्प एवं रूप में भिन्न हैं इसलिए गीति-परम्परा का प्रारम्भ जयदेव से ही माना जाना उचित है। जयदेव के गीतों का वर्ण्य- विषय कृष्ण एवं राधा की शृंगारपरक लीलाएँ हैं। संस्कृत में जयदेव के उपरान्त यह परम्परा लुप्तप्राय हो गई । जयदेव के समकालीन सिद्ध कविओं द्वारा रचित 'चर्यापद' अपने समय की जनभाषा में लिखित गीत ही थे। प्रथम सिद्ध कवि सरहपा (8वीं शती) की रचनाएँ गेय पदों में मिलती हैं।
हिन्दी साहित्य का आदिकाल गीति-काव्य के विकास हेतु उपयुक्त न था तथापि 'सिद्ध साहित्य' में अवश्य ही कुछ सुन्दर गीत दीख पड़ते हैं। इसके साथ ही 'बीसलदेव रासो' व 'परमाल रासो' (आल्हाखण्ड) आदि कृतियाँ भी गीतिकाव्य के अन्तर्गत परिगणित की जाती हैं। सच तो यह है कि गीतिकाव्य का समुन्नत विकास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल में ही सम्भव हो सका। जयदेव के 'गीतगोविन्द' से प्रभावित होकर परवर्ती कवियों विद्यापति और चण्डीदास ने गीत रचकर राधाकृष्ण की प्रेमलीलाओं का मधुर वर्णन किया। हिन्दी साहित्य में कृष्णकाव्य के जन्मदाता विद्यापति ही माने जाते हैं। उनकी 'पदावली' में राधाकृष्ण के सौन्दर्य तथा प्रेम एवं संयोग और वियोग के हृदयग्राही चित्र अंकित किये गए हैं। विद्यापति कृत 'पदावली' गीतिकाव्य का अनुपम उदाहरण है।
ऐसा नहीं है कि गीतिकाव्य की परम्परा केवल भक्तिपरक, प्रेमपरक और शृंगारपरक रचनाओं में ही विकसित हुई प्रत्युत यह गीतिकाव्य पद्धत्ति वीरगाथाकाल में वीरगीतों के रूप में भी उतनी ही तीव्रता के साथ प्रयुक्त हुई। इन वीरगीतों के माध्यम से कवियों ने अपने आश्रयदाताओं के शौर्य, पराक्रम, ऐश्वर्य तथा प्रेमगाथाओं का वर्णन किया है। भक्तिकाल में यह पद्धत्ति निर्बाध रूप में व्यवहृत हुई जहाँ निर्गुण एवं सगुण भक्तकवियों ने इस पद्धत्ति में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की। गीतपरक रचना करने वाले निर्गुण सन्त कवियों में कबीर, रैदास, नामदेव, नानक, दादू तथा सगुण भक्त कवियों में तुलसीदास, सूरदास, रसखान, मीरा आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
गीतिकाव्य की इस धारा ने रीतिकाल को अपनी मधुरिमा से सिंचित किया। बिहारी, पद्माकर, देव, घनानन्द आदि की काव्य-माधुरी गीति काव्यधारा से सराबोर दिखाई देती है। विशेषकर रससिद्ध कवि बिहारी के दोहे कोमलता से युक्त गेय शैली पर आधारित हैं । गीति काव्य की यही परम्परा आधुनिककाल में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त', सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', हरिवंश राय बच्चन आदि कवियों के काव्य में विकसित हुई है।
हिन्दी साहित्य का पहला गीत कौन-सा है ? इसके रचनाकार कौन थे ? इस प्रश्न का सीधा-सीधा उत्तर नहीं दिया जा सकता। वस्तुतः गीत- परम्परा का स्रोत लोकजीवन में निहित है।
लोकजीवन में प्रचलित लोकगीतों से प्रभावित होकर ही गीतिकारों ने गीत- रचना प्रारम्भ की। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि सभी भाषाओं में लोकगीत रचे गए हैं।
हिन्दी 'नवगीत' का उद्भव देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् ही हुआ। निराला के परवर्ती गीतों में 'नवगीत' के बीज विद्यमान हैं । कुछ आलोचकों ने निराला की रचना 'नवगीत नव लय, ताल- छन्द नव' को तो कुछ ने 'बाँधो न नाव इस ठाँव बन्धु' को नवगीत के बीजरूप में देखा है। गीत की टेक्नीक की दृष्टि से तथा नये-नये छन्दों का प्रयोग करने वाले गीतकारों में निराला का प्रमुख स्थान है। माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य-संग्रह 'बीजुरी काजर आँज रही' और 'वेणु लो गूँजे धरा' के कई गीतों में कुछ विद्वानों ने 'नवगीत' की छाया ढूँढने का प्रयत्न किया है।
छायावादोत्तर काल के प्रसिद्ध गीतकार हरिवंश राय बच्चन ने भी लोक-जीवन से सम्पृक्त अनेक गीतों की रचना की। गीतों के विकास में बच्चनजी का विशिष्ट योगदान है।
स्वतन्त्रता के बाद भारतीय जनमानस एक नवीन चेतना दृष्टि से सम्पन्न हुआ । फलस्वरूप सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों के साथ ही सांस्कृतिक क्षेत्र में भी नवीनता का आभास होने लगा। चित्रकला, स्थापत्य कला के साथ-साथ संगीत, गायन तथा नृत्य कला में नूतन प्रवृत्तियों का समावेश हुआ । काव्य में सर्वप्रथम निराला ने गीत के छन्द, राग और लय में नये प्रयोग किए। निराला की यह गीतात्मक चेतना वस्तु-शिल्प की दृष्टि से पूर्ववर्ती परम्परा से बहुत भिन्न थी।
विभिन्न कवि अपने-अपने क्षेत्रों में नये-नये प्रयोग कर रहे थे। नये सोच-विचार के साथ आधुनिकता की लहर में गोता लगा रहे थे। उसी समय ठाकुर प्रसाद सिंह ने संथाल परगना के एक बहुत बड़े उपेक्षित वर्ग की पीड़ा, करुणा, अभाव, लाचारी, निराशा एवं दुःख-दर्द का अनुभव समेटकर 'वंशी और बादल' काव्य-संग्रह प्रकाशित किया जिसकी ताज़गी, कथ्य और शिल्प की नवीनता ने हिन्दी काव्य-परम्परा को एक नूतन विधा से परिचित कराया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निराला प्रवर्तित नवगीत के बीजों को ठाकुर प्रसाद सिंह ने 'वंशी और 'बादल' रूपी हवा-पानी प्रदान कर अंकुरित किया तथा डॉ. शम्भुनाथ रूपी किसान ने अपनी प्रतिभा रूपी खाद से उसे विकसित-पुष्पित एवं पल्लवित किया। इस नवीन गीत-विधा को विद्वानों ने अलग-अलग पहचान दी ।
रामदरश मिश्र और सियारामशरण प्रसाद ने गीत के इस नये स्वर को 'आज का गीत' कहा है। बालस्वरूप राही और शलभ सिंह ने इसे ‘नया गीत' नाम दिया जबकि गंगाप्रसाद विमल और ओंकार ठाकुर ने इसे 'आधुनिक गीत' की संज्ञा से विभूषित किया। इस नवीन गीतात्मक चेतना को लिखित रूप में सर्वप्रथम राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा 'नवगीत' शीर्षक से अभिहित किया गया जो सर्वमान्य हुआ ।
नवगीत के नामकरण के प्रश्न पर डॉ. रवीन्द्र भ्रमर ने अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि- "नवगीत जैसा यह नाम 'नयी कविता' के वजन पर आया है लेकिन कुछ समय के लिए इसकी सख्त जरूरत भी है
जिससे व्यतीत जीवी भावबोध और बासी शैली- शिल्प से लिखे जाने वाले गीतों की लम्बी कतार से अत्याधुनिक गीतों को अलग-थलग किया जा सके।" डॉ० रामदरश मिश्र ने 'नवगीत' शीर्षक में नवीन संभावनाओं को तलाशने का प्रयत्न किया है। वे कहते हैं कि “जिसे हम नया गीत कहते हैं, वह परम्परागत गीतों से कई अर्थों में भिन्न है। वह गीत की चुकती हुई संभावनाओं को नये ढंग से स्थापित करता है। "
यहाँ सहज ही एक प्रश्न उठता है कि 'नवगीत' में 'नव' विशेषण क्यों लगाया गया ? इसमें 'नया' क्या है ? विचारपूर्वक इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है कि यह 'नव' विशेषण जहाँ एक ओर उसे परम्परागत गीतों से अलग करता है,
वहीं दूसरी ओर आधुनिक युग-बोध एवं यथार्थ को भी अभिव्यक्त करने में पूर्णतया समर्थ है । इस सम्बन्ध में बालस्वरूप रही का कथन समीचीन प्रतीत होता है- "महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि नया क्या है, महत्त्वपूर्ण यह है कि हमारे लिए प्रासंगिक या सार्थक क्या है ? नये के नाम पर अजूबा खड़ा कर देना, कलात्मकता की कोई विशेष पहचान नहीं है। जो चीज आज के सन्दर्भ में महत्त्व रखती है वह चाहे पुरानी हो या नयी हमेशा महत्त्वपूर्ण रहेगी।" 'नवगीत' के प्रवर्तक डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने 'नवगीत दशक- 2' की भूमिका में विचार करते हुए लिखा है कि "नवगीत का 'नव' विशेषण 'गीत' के सामयिक सन्दर्भ से जुड़े होने का बोधक - है।"
डॉ. रघुवंश ने तर्कसम्मत ढंग से इस नयी बुनावट के बारे में महत्त्वपूर्ण बात कही है- "मानवीय जीवन की भूमिका और परिवेश के बदलने के साथ उनके अनुभव, सन्दर्भ और विधान भिन्न हो जाते हैं तथा रचनाकार जब उनको रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है तो उसे नया रचना-विधान खोज प्रदान करता है।" वस्तुतः मानव का जीवन व परिवेश दिन-प्रतिदिन बदलता रहता है, साथ ही साथ उसकी आवश्यकताएँ भी बदलती रहती हैं। परम्परागत गीत जब पूरी तरह से युगयथार्थ को अभिव्यक्ति देने में असफल हुआ तभी 'नवगीत' अस्तित्व में आया । अतः कहा जा सकता है कि 'नवाता' से सम्बद्ध होने के करण ही परम्परागत गीत 'नवगीत' के साँचे में ढल गया।
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