त्रिलोचन - Trilochan

जनकवि त्रिलोचन को 'पोएट ऑफ़ पब्लिक' कहा जाता है और उनके लिए यह उपाधि बहुत सार्थक भी हैं। वे कविता में सीधे जनता की आवाज़ को मुखरित करते हैं, उस जनता की आवाज़ को जो अपनी आवाज़ ख़ुद नहीं उठा सकती, जो शोषण की चक्की में पिस रही है। त्रिलोचन इस जन की आवाज़ का माध्यम अपनी कविता को बनाकर अपने कवि होने को सार्थक करते हैं। यही काम जनकवि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेरबहादुर सिंह ने किया। जनकवियों की यह चौकड़ी प्रगतिशील जनवादी कविता का आधार है। बाकी का प्रगतिशील जनवादी कविता साहित्य इसके ऊपर बने हुए भवन हैं। अपने देश की जनपीड़ा को कविता में दर्ज करना और प्रतिरोध में आवाज़ बुलंदकरना इन कवियों ने अपनी अगली पीढ़ी को सिखाया है। ये जनकविता की बृहत् पाठशालाएँ हैं।

'खुले हृदय के द्वार' कविता में त्रिलोचन अपने हृदय के द्वार समग्र मनुष्यता के लिए खोलकर सारे अपरिचय को ही समाप्त कर देते हैं। वे भ्रम के कुहासे को छाँटकर फूल की तरह खिलना सिखाते हैं और किसी भी आधार पर अलगाव को ख़ारिज करते हैं। अपनी एक अन्य कविता 'हाथों के दिन में त्रिलोचन का सपना है कि जो हाथ देश के नवनिर्माण में श्रमपूर्वक निरन्तर संलग्न हैं और छले जा रहे हैं, उन हाथों के दिन भी अवश्य फिरेंगे। पर उनके मन में जन हाथों की दुर्दशा देखकर पीड़ा से उपजा प्रश्न भी है कि आखिर जनता के हाथों के दिन कब फिरेंगे ? कब उनके न्याय संगत दिन आयेंगे ? कब किसानों, मज़दूरों का शोषण बंद होगा ? दुखद है कि 'हाथों के 'दिन' आज तक नहीं आए और इस गम्भीर संकट की पहचान त्रिलोचन ने अपने समकाल में कर ली थी।


त्रिलोचन की कविता 'जनपद का कवि' उनकी प्रतिनिधि कविताओं में से एक है। यह कविता उनके काव्य संकलन 'जनपद का कवि' की शीर्षक कविता भी है। यहाँ वह उल्लेख करते हैं कि मैं उस ग्रामीण जनपद का कवि हूँ जहाँ की जनता भूखी और नंगी है। जहाँ पीड़ा और दर्द चारों ओर बिखरे हैं। जहाँ दुःख का सन्नाटा है। वहाँ की जनता न कला जानती और न ही सौन्दर्यबोध की कोई परिभाषा ही। वहाँ तो भूख सबसे बड़ा सवाल है। इस कविता के माध्यम से त्रिलोचन भारतीय ग्रामीण समाज की ग़रीबी और दयनीय हालातों का उल्लेख करते हैं और वे यह भी कहना नहीं भूलते कि ग्रामीण जन अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के बजाय भजन करने में लगे हैं।

राजनीति ने उसे लड़ना नहीं, भजन करना सिखाया है और उसका यही भोलापन उसके शोषण का जनक है। आज भी यही हो रहा है जिसका जिक्र सात दशक पहले किया गया था। व्यवस्था के लिए कितना अच्छा फार्मूला है कि भजन करो और सो जाओ। कोई भी चिल्लाचोंट जब नहीं होती है तभी सरकारों को खूब निर्विघ्न सुख की नींद आती है। इसलिए भगतों आप लोग भजन करो और हमें देश को लूटने दो। 'भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा 'कल' कविता जनता के दुखों की दैन्यता की पराकाष्ठा है। दाता / अन्नदाता ही भिखारी बना दिया गया ? कवि की इस पीड़ा को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। हक़ की भीख नहीं माँगी जाती, हक़ की लड़ाई लड़ी जाती है। इसलिए अब माँगो नहीं, लड़ो दोस्तों !


त्रिलोचन की एक प्रसिद्ध कविता 'चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती' बेहद उल्लेखनीय कविता है। इसमें शिक्षा को लेकर तत्कालीन ग्रामीण स्त्री समाज की दुर्दशा का ज़िक्र उसकी समग्रता में है। यहाँ ग्रामीण स्त्री का भोलापन, प्रेम, समर्पण, सरलता और तरलता कवि को अपने रिश्ते में बाँध देती है। त्रिलोचन के 'सॉनेट' (Sonnet) हिन्दी में एक प्रकार के प्रयोग हैं, इसे उन्होंने अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ से ग्रहण किया था । त्रिलोचन अपनी काव्य-भाषा के माध्यम से ग्राम्य चेतना का आंचलिक और वैश्विक संसार एक साथ रचते हैं। वे प्रेम, विद्रोह, जागरण और आंचलिक सरलता के दुर्लभ और बड़े कवि हैं। जन-चेतना की धारा त्रिलोचन की कविता की नदी की खासियत है त्रिलोचन ने अपने समय और समाज के ज्वलन्त मुद्दों को अपनी कविता में प्रमुखता से उठाया और उसके साथ खड़े हो गए। इसलिए वे जनपक्षधरता के संवेदनशील जनकवि हैं।