मूल्य विवेचन - value proposition
अज्ञेय विवेक को समस्त मूल्यों का स्रोत स्वीकार करते हैं। अपने काव्य-चिन्तन में उन्होंने कुछेक स्थलों पर मूल्य सम्बन्धी चर्चा की है। इस चर्चा का सम्बन्ध विशेष रूप से सौन्दर्यबोध, शिवत्वबोध, मूल्य-चेतना तथा नैतिक मूल्यों से है । सौन्दर्यबोध पर चर्चा करते हुए उनका कहना है कि सौन्दर्यबोध मूलतः बुद्धि का व्यापार है। किसी वस्तु से सौन्दर्य के गुणों का पृथक्करण बुद्धि ही करती है जो मनुष्य के अनुभव की कसौटी पर कसे जाते हैं। न केवल सौन्दर्य तत्त्व बुद्धि पर आधारित है, अपितु सौन्दर्य का आस्वादन भी बुद्धि व्यापार है। चूंकि, मनुष्य के अनुभव निरन्तर विकासशील हैं, इसलिए शाश्वत मूल्यों की बात नहीं की जा सकती।
इस सम्बन्ध में अज्ञेय परम्परा की बात करते हैं और इस पर बल देते हैं कि प्रत्येक नया अनुभव पुराने अनुभव से जुड़कर ही सार्थक बनता है। उनके अनुसार अनुभव के गणित में जोड़ ही जोड़ है, बाकी जरा भी नहीं है; यही साहित्य की परम्परा है, काव्य की परम्परा है।
शिवत्व का सम्बन्ध नीतितत्त्व से है। वह एक नैतिक मूल्य है। अज्ञेय ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है। कि नैतिक निर्णय बाह्य कर्मों पर आधारित नहीं हो सकते, उनके लिए आभ्यन्तर उद्देश्यों पर विचार होना चाहिए।
वे स्थूलता को नैतिकता नहीं मानते किन्तु एक उच्चतर नैतिकता की बात अवश्य करते हैं और इसी उच्चतर नैतिकता के सहारे उन्होंने सौन्दर्यतत्त्व को शिवतत्त्व के साथ जोड़ा हैं। उनकी प्रबल धारणा है कि किसी भी कृतिकार में उच्च कोटि का सौन्दर्यबोध और नैतिकबोध एक साथ चलते हैं। दोनों बुद्धि के व्यापार हैं और मनुष्य का विवेक दोनों का ही स्रोत है। उनके अनुसार "विवेकशील मानव की विशेषकर उस विवेकशील मानव की जिसमें सृजनात्मक शक्ति या प्रतिभा भी है ग्राहकता दोनों को भी पहचानती है। बुद्धि और जिस पर बुद्धि आधारित है,
वह अनुभव, निरन्तर विकासशील और संस्कारशील है, निरन्तर सूक्ष्म होती हुई संवेदना एकांगी भी हो सकती है, पर जहाँ सृजनात्मक शक्ति है, वहाँ एकांगिता की सम्भावना कम है और पुष्ट सौन्दर्यबोध के साथ अधिक पुष्ट नैतिक बोध होता ही है।"
'आत्मनेपद' में भी अज्ञेय नैतिक मूल्यों पर विचार करते हैं। उनका मत है कि "मूल्यों पर इतना जोखिम कभी नहीं हुआ था, जितना आज हैं, आज जो मूल्य हैं, वे संदिग्ध हैं और उनसे इनकार भी उतना ही संदिग्ध है। आज का मानव समाज यन्त्र के सहारे उन्नति कर रहा है,
किन्तु यन्त्र नैतिक नहीं है, नैतिकता से यन्त्रों का कोई मतलब नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता है कि नैतिकता से मनुष्य का भी कोई मतलब न हो।"
अज्ञेय के अनुसार "आज आधुनिकता की एक नयी समस्या हमारे सामने खड़ी हो गई है। आज ईश्वरसम्भूत नैतिकता की प्रवृत्ति निरन्तर कम होती जा रही है। नैतिकता का उत्तर प्राप्त करने के लिए आज मनुष्य की ओर देखना पड़ रहा है। इस प्रकार नैतिकता का आधार स्वयं होकर अथवा अपनी बुद्धि को बनाकर हमने अपनी समस्या को कठिनतर ही बनाया है जो दायित्व अब तक धर्म और ईश्वर पर था, वह मानव ने अपने ऊपर ओढ़ लिया है।"
मूल्य-विवेचन के सन्दर्भ में अज्ञेय ने श्लील और अश्लील पर भी अपने विचार अभिव्यक्त किए हैं। उनकी दृष्टि में अश्लीलता वहीं पर है जहाँ कवि की दृष्टि अधूरी और उघड़ी हुई है। यही बात पाठक के बारे में भी कही जा सकती है। उनका स्पष्ट कहना है कि "देखना अश्लील नहीं है, अधूरा देखना अश्लील है।" अज्ञेय मूल्य व नैतिकता के सम्बन्ध में किसी रूढ़िगत धारणा के अनुगामी नहीं हैं।
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