आचार्य चिन्तामणि का दोष-निरूपण - Vindication of Acharya Chintamani
दोष-विषयक धारणा एवं दोषों का स्वरूप
आचार्य चिन्तामणि के अनुसार दोष शब्द, अर्थ और रस का अपकर्ष करता है। उनका मानना है कि इसे (दोष) सुनने से हर्ष यानी काव्य का आनन्द नष्ट हो जाता है। दोष विषयक इस धारणा में उन्होंने आचार्य मम्मट- सम्मत दोष स्वरूप के परिवर्तित स्वरूप को प्रस्तुत किया है-
शब्द, अर्थ, रस को जु इत देखि परै अपकर्ष । दोष कहत है ताहि को, सुनै छदत है हर्ष ॥
चिन्तामणि के अनुसार दोष चार प्रकार के होते हैं-
1. शब्दगत
श्रुतिकटुत्व, च्युतसंस्कृति, अप्रयुक्त, असमर्थ, निहितार्थ, अनुचितार्थ, निरर्थक, अवाचक, अश्लील, संदिग्ध, अप्रतीत, ग्राम्य, नेयार्थ, क्लिष्ट, विरुद्धमतकृत
2. वाक्यगत
प्रतिकूलाक्षर, हतवृत्त, न्यूनपद, अधिकपद, कथितपद, पतत्प्रकर्ष,
समाप्तपुनरात्त, चरनान्तरपद, अभवन्मजतजोग, अकथितवाच्य,
अस्थानस्पथपद, संकीर्ण, गर्भित, प्रसिद्धहत, भग्नक्रम, अक्रम, अमतपरार्थ
3. अर्थगत
अपुष्ट, कष्ट, व्याहत, पुनरुक्त, ग्राम्य, संसयित, निर्हेतु, प्रसिद्धिविरुद्ध,
अनवीकृत, नियमहीन, अनियमहीन, विशेषहीन, सामान्यहीन, साकांक्ष,
अपदयुक्त, सहचरभिन्न प्रकाशितविरुद्ध, त्यक्तपुनः स्वीकृत, अश्लील
4. रसगत
संचारीभाव, स्थायीभाव और रस की स्वशब्दवाच्यता, अनुभाव और विभाव की कष्ट कल्पना से अभिव्यक्ति; प्रतिकूल विभावादि का ग्रहण, मुख्यांगी का अनुसंधान अंग की बहुप्रकृति
दोष स्वरूप निरूपण में चिन्तामणि का वैशिष्ट्य निम्नलिखित उदाहरणों से परखा जा सकता है-
जे नहि प्रोगी सत कविन काची भाषा जान । मथुरा मण्डल ग्वारियै की परिपक्व बखान ॥
- (अप्रयुक्त शब्द-दोष)
जहं वाक्यार्थ समाप्त कै बहुरि विसेषै देइ । सो समाप्तपुनरातताजानि सन्ने तेह।
- (वाक्पदोष)
सुधि न जहाँ निज कथन की सो व्याहतत ज्ञान । जो निर्जित कहिये प्रथम सोइ पुनि उपमान ॥
- (अर्थदोष)
भली भई बहुतै अली लागि घर में आगि । मेरे कर की गागरी लीन्हीं साजन भागि ।
- (रसदोष)
दोष परिहार
दोष परिहार के सम्बन्ध में चिन्तामणि आचार्य मम्मट के मत का अनुवाद मात्र प्रस्तुत करते हैं।
यहाँ वे कोई उदाहरण भी प्रस्तुत नहीं करते हैं। 'कविकुलकल्पतरु' में उल्लिखित उद्धरण देखिए-
(i) 'अवतंस' के साथ 'कर्ण' पद का प्रयोग वैसे तो उत्पादक है, परन्तु निकटता के ज्ञान के लिए इसका प्रयोग सम्मत है। इसी तरह अन्य प्रसंगों में भी ऐसे प्रयोग सदोष नहीं होते-
कहूं कर्न अवतंस इत्यदि पदन को दान। संनिधान इत्यादि के बोध होत सजान ॥
(ii)
आवश्यक हेतु को प्रदर्शित न करना निस्सन्देह 'निर्हेतु' दोष है,
लेकिन प्रसिद्ध हेतु को प्रदर्शित न करने में कोई दोष नहीं है-
जहाँ होत परसिद्ध है तहं निरहेत न दोष।
(iii) किसी का अनुकरण करते समय सदोष कथन किसी दोष से दूषित नहीं होते-
सब अदुष्ट अनुकरन मै, इनते नहीं अतोख ।
(iv) वक्ता, श्रोता आदि के औचित्य से दोष भी गुण हो जाते हैं-
वक्तादि औचित्य ते दोषो गुन है जाइ।
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