आचार्य देव का दोष-निरूपण - Vindication of Acharya Dev

ध्यातव्य है कि ध्वनिपूर्ववर्ती और ध्वनि परवर्ती आचार्य काव्य-विषयक विभिन्न धारणाओं को प्रकट करते हुए दोष की निन्दा और उसकी हेयता के सम्बन्ध में एकमत हैं। हिन्दी कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा में वि आचार्य देव ने 'शब्द रसायन' में सरस, निरस, उदास, सन्मुख, विमुख, स्वनिष्ठ और परनिष्ठ दोषों का विवेचन किया है। उन्होंने आठ प्रकार के नीरस दोषों का भी उल्लेख किया है। यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने आचार्य केशवदास के अनरस दोषों से अभिप्रेरणा प्राप्त कर दोष-निरूपण की परिकल्पना प्रस्तुत की है। अथवा स्वतन्त्र रूप से । दोष निरूपण के सम्बन्ध में आचार्य देव के मन्तव्यों का समाहार निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-


(1) आचार्य देव का दोष-प्रकरण अपेक्षाकृत सरल व संक्षिप्त है। इस सम्बन्ध में आचार्य केशवदास का उन पर गहरा प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। कतिपय उदाहरणों को छोड़कर उनका दोष निरूपण शाखा है।


(ii) वस्तुतः किसी भी दोष का काव्य विघातक घटक उसके रसापकर्ष पर निर्भर करता है। अतः देव ने दोषों के स्वरूप का सरल व सुबोध शैली में प्रतिपादन किया है।


(iii) पदगत, वाक्यगत और अर्थगत दोषों के निरूपण में देव के चिन्तन का वैशिष्टय सहज ही देखा जा सकता है। उन्होंने हिन्दी भाषा को ही लक्ष्य कर ही उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।


(iv) उपमेय के विशेषणों की अपेक्षा उपमान के विशेषणों की हीनता और अधिकता नामक दोष साम्यभाव अथवा विषमता का ही परिचायक होता है।


(v) देव की स्थापना है कि दोष वस्तुतः रस के बोध में घातक होता है। उसका स्वरूप प्रायः शब्दगत, अर्थगत और रसगत होता है।


(vi) संस्कृत के ग्रन्थों का आधार ग्रहण करते हुए भी दोष विषयक लक्षणों के उदाहरणों को उन्होंने प्रायः समकालीन हिन्दी रीतिकालीन वातावरण में प्रस्तुत किया है।


(vii) देव प्रतिपादित दोष-प्रकरण के कतिपय स्थलों में भाषा की असर्मथता के कारण विषय निरूपण कुछ दुर्बोध भी बन गया है।