आचार्य देव का ध्वनि निरूपण - voice representation of Acharya Dev

काव्यशास्त्र से पूर्व 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग व्याकरण के क्षेत्र में मिलता है। भाषाशास्त्र की दृष्टि से वर्णों के स्फोट को ध्वनि कहा जाता है। व्याकरण के स्फोट का सम्बन्ध भाषा की अभिधा शक्ति से माना जाता है परन्तु काव्यशास्त्र की ध्वनि व्यंजना पर आधारित है। हिन्दी के कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा में ध्वनि सिद्धान्त की प्रेरणा-स्रोत व्याकरण की विचारधारा रही है। आचार्य देव ने शब्दशक्ति प्रकरण में व्यंजना शक्ति की विवेचना की है जहाँ कहीं-कहीं उन्होंने परोक्ष ढंग से अपने सूक्ष्म ध्वनि-निरूपण तथा काव्य- - कौशल का बहुत सुन्दर परिचय दिया है। लेकिन ध्वनि के भेदोपभेद का उन्होंने कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। यही वजह है कि परवर्ती समीक्षकों ने उनके अवदान को केवल प्रतीकात्मक तौर पर स्वीकार किया है।