नन्ददुलारे वाजपेयी की पाश्चात्य समीक्षा और हिन्दी साहित्य - Western criticism and Hindi literature of Nanddulare Vajpayee

हिन्दी साहित्य के विवेचन और मूल्यांकन के लिए वाजपेयी जी ने पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टियों की कमियाँ और अयोग्यताएँ बतायी हैं और उन्हें अनुपयोगी बताया है। विशेष रूप से मनोविश्लेषणवादी और मार्क्सवादी आलोचना पद्धतियों को लक्ष्य करते हुए वाजपेयी जी कहते हैं कि पहली पद्धति नितान्त अन्तर्मुखी है और वह साहित्य को अन्तश्चेतना के दलदल की ओर ले जा रही है, वहीं दूसरी पद्धति उसे बौद्धिकता के अनुर्वर और रेतीले मैदान में पहुँचा रही है। इन अतिवादों के बीच में कुछ प्रवृत्तियाँ और भी हैं जो साहित्य के लिए बाधाएँ पैदा कर रही हैं। वाजपेयी जी का विचार है कि ऐसी स्थिति में सही आलोचना को अपना कार्य करने का अच्छा अवसर मिलता है।

लेकिन इस अवसर का उपयोग कर साहित्य समीक्षा में प्रवृत्त होने के लिए एक आलोचक में सम्यक् साहित्यिक चेतना, अशेष अध्यवसाय और अतिशय आत्मनिर्भरता जैसे गुणों का होना आवश्यक है।


वाजपेयी जी ने मनोवैज्ञानिक, मार्क्सवादी, कलाविज्ञानवादी और उपयोगितावादी समीक्षा पद्धतियों की आलोचना करते हुए आगाह किया है कि इन वादों या इन पर आधारित साहित्यिक समीक्षा-पद्धतियों को हमें अपने देश में लागू नहीं करना है। यद्यपि हम इनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं, लेकिन ऐसा हम अपनी परम्परा और मौलिकता को बचाकर ही कर सकते हैं, उसे खोकर नहीं।


पाश्चात्य समीक्षा-पद्धतियों की आलोचना के अनन्तर अपने आलोचना-विवेक पर विश्वास प्रकट करते हुए वाजपेयी जी ने कहा है कि "पिछले पचास वर्षों में हिन्दी साहित्य की जो मर्यादा बन गई है, उसे हम किसी भी स्थिति में टूटने नहीं देंगे।" (- 'आधुनिक साहित्य') इससे स्पष्ट है कि वाजपेयी जी किसी भी नये साहित्यिक सिद्धान्त या समीक्षा प्रवृत्ति को हिन्दी साहित्य की प्राचीन और परम्परागत पद्धतियों के परिप्रेक्ष्य में ही ग्राह्य समझते हैं। उनका कथन है- "हमें क्रमशः आगे बढ़ना है, अतीत की सामग्री का उपयोग करते हुए, साथ ही नये प्रकाशन को अपनाते हुए।" (- 'आधुनिक साहित्य')