आचार्य देव का शब्दशक्ति निरूपण - word power representation of Acharya Dev
शब्दशक्ति निरूपण में आचार्य देव ने 'काव्यप्रकाश' का आधार ग्रहण किया है। लेकिन अपने विचार प्रतिपादन में उन्होंने केवल पूर्ववर्ती आचार्यों का अन्धानुकरण नहीं किया है। यद्यपि शब्दशक्ति निरूपण में उनकी कतिपय धारणाएँ अस्पष्ट भी हैं तथापि मौलिकता के वैशिष्ट्य के कारण उनका अपना महत्त्व हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित शब्दशक्ति निरूपण को बिन्दुवार इस प्रकार परिगणित किया जा सकता है -
(1) "तात्पर्या' वृत्ति के सन्दर्भ में देव द्वारा किए गए उल्लेख से अभिहितान्वयवाद-सम्मत इस वृत्ति का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट नहीं होता।
उनके विचारों से यह प्रकट होता है कि तात्पर्य से उनका आशय या तो वाच्य, लक्ष्य और व्यंग्य से है अथवा व्यंग्यार्थ से।
ii) देव ने लक्षणा के मम्मट सम्मत गौणी नामक भेद को 'मिलित' नाम दिया है जो कि गौणी के यथार्थ स्वरूप 'सादृश्य सम्बन्ध' का किसी भी रूप में द्योतक प्रतीत नहीं होता है।
(iii) अभिघा के मूल भेद के रूप में उन्होंने जाति, क्रिया, गुण और यदृच्छा का उल्लेख किया है। परन्तु ये भेद अभिधा के मूल भेद न होकर संकेतित अर्थ के ही अलग-अलग रूप प्रतीत होते हैं।
उनके द्वारा निरूपित जाति आदि के उदाहरणों में गुण को छोड़कर बाकी तीनों प्रकार के उदाहरणों में भी नितान्त अस्पष्टता है। उदाहरणार्थ 'शब्द रसायन' में उल्लिखित निम्नलिखित उक्ति देखिए-
जाति अहीरी क्रिया पकरि, हरगुन सुकुल सुवानि । चोर द्रक्ष्या चहूँ विधि अभिधा मूल बखानि ॥
(iv) आचार्य देव लक्षणा और अभिव्यंजना के चार-चार प्रकारों का उल्लेख करते हैं।
कार्य-करण, सदृशता, वैपरीत्य और आक्षेप के रूप में उन्होंने लक्षणा के चार भेद गिनाए हैं। हालाँकि, लक्षणा के ये भेद क्रमशः शुद्धा, गौणी, विपरीत-लक्षणा और उपादान-लक्षणाओं से सम्बद्ध माने जा सकते हैं।
(v) व्यंजना के चार भेद के तौर पर उन्होंने वचन, क्रिया, स्वर और चेष्टा को निरूपित किया है। चूँकि, स्वर और चेष्टा आर्थी व्यंजना से सम्बद्ध हैं तथा क्रिया को भी चेष्टा का रूपान्तर मानते हुए व्यंजना से सम्बद्ध माना जा सकता है, इसलिए इस विभाजन को मूलभेद की संज्ञा देना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है।
(vi) आचार्य देव ने अभिधादि शक्तियों के परस्पर सम्बन्ध से जनित बारह प्रकार के भेदों का निरूपण किया है जिनमें से कुछ शास्त्र सम्मत हैं और कुछ शास्त्र असम्मत। शास्त्रम सम्मत प्रकारों में अभिधा, अभिधा में लक्षणा और व्यंजना, लक्षणा, लक्षणा में व्यंजना, व्यंजना, व्यंजना में व्यंजना प्रमुख हैं जबकि शास्त्र असम्मत भेदों में अभिधा में अभिधा, लक्षणा में अभिधा और लक्षणा, व्यंजना में अभिधा और लक्षणा उल्लेखनीय हैं।
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