सौन्दर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र - aesthetics and poetics
सौन्दर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र के अन्तरसम्बन्धों के सन्दर्भ में पाश्चात्य और भारतीय दृष्टिकोण में अन्तर । पाश्चात्य देशों में सौन्दर्यशास्त्र का विकास दर्शन से हुआ है लेकिन भारत में इसका विकास काव्यशास्त्र से हुआ है । यद्यपि काव्यशास्त्र का विवेच्य विषय काव्य की परिणति में व्यक्त वह सौन्दर्य ही है, जो सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन का मूलाधार है, लेकिन काव्यशास्त्र में केवल शब्दों के माध्यम से निर्मित काव्य के शास्त्र का ही विवेचन- विश्लेषण किया जाता है जबकि सौन्दर्यशास्त्र समस्त ललित कलाओं में व्यक्त सौन्दर्य का विवेचन-विश्लेषण किया जाता है।
जिस प्रकार सभी ललित कलाओं का माध्यम अलग-अलग होता है उसी प्रकार उनका शास्त्र भी अलग- अलग होता है।
लेकिन इन समस्त कलाओं का एक सामान्य शास्त्र भी होता है जिसमें कला विशेष का अध्ययन कला- सामान्य के आधार पर किया जाता है, इसे सौन्दर्यशास्त्र कहा जाता है। हम जानते हैं कि कला सौन्दर्य-सृष्टि का ही नाम है। कला में एक नयी निर्मिति होती है, जो काव्य में भी होती है। इस प्रकार काव्य या साहित्य भी एक कला है । जब काव्य का विवेचन कलाओं के विवेचन की तरह किया जाता है तब वह काव्य-चिन्तन सौन्दर्यशास्त्रीय चिन्तन हो जाता है। यहीं काव्यशास्त्र का सौन्दर्यशास्त्र के साथ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यहाँ एक नया प्रश्न पैदा होता है कि यदि काव्य का अध्ययन सौन्दर्यशास्त्र के अन्तर्गत हो सकता है तो फिर उसके अध्ययन के लिए पृथक् काव्यशास्त्र की क्या आवश्यकता है?
भारतीय दृष्टि से काव्य और कलाओं में भेद संस्कृत आचार्यों द्वारा काव्य की गणना विद्या में और कलाओं की गणना उपविद्याओं में करने के कारण पैदा हुआ है। इस भेद के कारण ही काव्यशास्त्र के आचार्यों ने ललित कलाओं को काव्यशास्त्र से अलग रखा है। भारतीय चिन्तन में विद्याओं के अन्तर्गत जिन चौदह विद्याओं की सूची दी गई है, उसमें चार वेद, छह वेदांग और चार शास्त्र शामिल हैं। प्रत्यक्ष रूप से काव्य इस सूची में नहीं है। लेकिन राजशेखर ने 'काव्यमीमांसा' में चौदह विद्याओं के अनन्तर काव्य को पन्द्रहवीं विद्या के रूप में स्थान दिया है और माना है कि यह सभी विद्याओं का एकमात्र सार है।
प्राचीन आचार्यों द्वारा कला को उपविद्या के अन्तर्गत मान्यता देने के कारण हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद आदि ने काव्य को कला से ऊँचा स्थान दिया है।
शुक्ल जी ने काव्य को कला के अन्तर्गत मानने का तीव्र विरोध किया है। उनके अनुसार काव्य में 'सुन्दर' के लिए कोई स्थान नहीं है। काव्य अनुभूति का व्यापार है, जबकि सुन्दर का सम्बन्ध इन्द्रिय-बोध से होता है। इसलिए सुन्दर का सम्बन्ध कला तक ही सीमित है काव्य में उसके लिए स्थान नहीं है। सुन्दर यदि रमणीय रूप में प्रस्तुत किया जाए तो वह अनुभूति के नज़दीक आ सकता है अन्यथा नहीं। शुक्ल जी के अनुसार सौन्दर्यशास्त्र कोई सुसंगत शास्त्र नहीं है क्योंकि उसके सिद्धान्तों का अभी तक पूरा विकास ही नहीं हुआ है । पाश्चात्य चिन्तन में भी यह बात मान ली गई है कि काव्यशास्त्र को सौन्दर्यशास्त्र से जितना टू रखा जाए उतना ही अच्छा है। काव्य कला से भिन्न है, यह धारणा स्वीकृत हो चुकी है।
वार्तालाप में शामिल हों