कारकों का वर्गीकरण हिन्दी की प्रकृति की दृष्टि से - Classification of factors from the point of view of the nature of Hindi
यह हम ऊपर बता चुके हैं कि वाक्य में संज्ञाओं और क्रिया के सम्बन्धों को ध्यान में रखकर संस्कृत के प्राचीन वैयाकरणों ने कारकों के छह भेद किए थे तथा आगे चलकर इस सूची में दो नाम और जोड़ दिए। भले ही 'सम्बन्ध' तथा 'सम्बोधन' कारक नहीं हैं पर हम यहाँ परम्परा का अनुसरण करते हुए परवर्ती संस्कृत आचार्यों की तरह उनकी चर्चा कारकों के ही अन्तर्गत कर रहे हैं।
1. कर्त्ता कारक (Nominative Case) :
(कारकीय चिह्न: 'शून्य' (O), 'ने', 'से', 'के द्वारा', 'को')
;वाक्य में संज्ञा / सर्वनाम के जिस रूप से यह पता चले कि वह क्रिया को पूरा करने का कार्य कर रहा है तो
वह संज्ञा 'कर्त्ता कारक' में होती है।
ध्यान रखिए 'कर्त्ता कारक' को व्यक्त करने वाला केवल 'ने' चिह्न ही नहीं है बल्कि 'शून्य', 'से', 'के द्वारा', 'को' आदि भी कर्त्ता कारक के चिह्न हैं। नीचे दिए गए वाक्यों की रेखांकित संज्ञाएँ 'कर्त्ता कारक' में हैं।
2. कर्म कारक (Accusitive Case)
(कारकीय चिह्नः 'शून्य' (O), 'को', 'से')
वाक्य की जिस संज्ञा पर क्रिया का फल या प्रभाव पड़ता है वह संज्ञा 'कर्म कारक' में होती है।
;3. करण कारक (Instrumental Case) :
(कारकीय चिह्न 'से')
'करण' का अर्थ है- 'साधन' अर्थात् वाक्य की क्रिया को पूरा करने में जो संज्ञा 'साधन' बनती है वह 'करण कारक' में होती है।
4. सम्प्रदान कारक (Dative Case) :
(कारकीय चिह्नः 'के लिए', 'को')
वाक्य की क्रिया जिस संज्ञा के लिए घटित होती है वह संज्ञा सम्प्रदान कारक' में कही जाती है।
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5. अपादान कारक (Ablative case) :
(कारकीय चिह्न 'से' (अलग होने के अर्थ में))
वाक्य की क्रिया के द्वारा जब किसी एक संज्ञा से (दूसरी संज्ञा के अलग होने का भाव प्रकट होता है तो
वह संज्ञा 'अपादान कारक' में कही जाती है।
6. अधिकरण कारक (Locative Case) : (कारकीय चिह्न: 'में', 'पर', 'ऊपर', 'के ऊपर', 'के नीचे', 'के पहले', 'के बाद' आदि)
क्रिया जिस स्थान या समय पर घटित होती है उस स्थान या समय के लिए जो संज्ञा आधार बनती है वह अधिकरण कारक में कही जाती है,
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जैसे 'बच्चा छत पर बैठा है' वाक्य में 'छत' संज्ञा बच्चे के बैठने का आधार बनी है अतः यहाँ संज्ञा 'छत' अधिकरण कारक में है तथा क्रिया के साथ उसके इस सम्बन्ध को बताने वाला कराकीय चिह्न है 'पर' ।
7. सम्बन्ध कारक (Genetive case ) :
(कारकीय चिह्न 'का', 'के', 'की' 'रा', 'रे', 'री')
जहाँ किसी संज्ञा या सर्वनाम का किसी दूसरी संज्ञा या सर्वनाम के साथ सम्बन्ध दिखाया जाता है वहाँ वे संज्ञा / सर्वनाम 'सम्बन्ध कारक' में होते हैं, जैसे 'रमेश का भाई बीमार है' वाक्य में 'रमेश' तथा 'भाई' दोनों - संज्ञाओं के बीच के सम्बन्ध को 'का' परसर्ग से दिखाया गया है।
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यहाँ संज्ञा 'रमेश' दूसरी संज्ञा 'भाई' के साथ
'सम्बन्ध कारक' में है।
8. सम्बोधन कारक ( Vocative Case)
( कारकीय चिह्न : 'हे', 'र', 'अरे', 'ओ' आदि)
जब वक्ता द्वारा किसी संज्ञा का ध्यान आकर्षित किया जाए या उसे सम्बोधित किया जाए तो वह संज्ञा
सम्बोधन कारक में होती है। सम्बोधित संज्ञा से पहले प्रायः हे, रे, अरे, आदि विस्मयादिसूचक शब्द लगाये जाते
;है, जैसे- 'हे' / 'रे'/ 'अरे' 'ए' आदि।
(1) हे राम ! या लड़का कब सुधरेगा । (ii) अरे भाई ! इधर मत बैठो।
(iii) ए लड़के ! यहाँ से भाग ।
(iv) हे भगवान् ! मेरी रक्षा करो।
(v) भाइयो और बहनों ! मेरी बात ध्यान से सुनिए ।
(vi) लड़कियों ! चाकू से मत खेलो।
;इस तरह आपने देखा कि एक कारकीय चिह्न एक से अधिक कारकों में प्रयुक्त हो सकता है, जैसे 'को' परसर्ग 'कर्म कारक' में भी आता है और 'कर्त्ता कारक' में भी या 'से' परसर्ग 'कर्त्ता कारक', 'करण कारक' तथा 'अपादान कारक' तीनों में आ सकता है। अतः केवल चिह्न देखकर किसी भी कारक का निर्धारण नहीं किया जाना चाहिए। कारक-निर्धारण से पहले 'अर्थ' को समझना चाहिए तथा यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि वाक्य में आयी संज्ञाएँ उस वाक्य की क्रिया को पूरा करने में क्या भूमिका निभा रही हैं।
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