ध्वनियों का वर्गीकरण: हिन्दी की व्यंजन ध्वनियाँ - Classification of sounds: Consonant sounds of Hindi
हिन्दी की व्यंजन ध्वनियाँ
- स्वरों की ही भाँति हिन्दी में तीन प्रकार के व्यंजन पाए जाते हैं 'मूल या केन्द्रीय व्यंजन', 'आगत
व्यंजन तथा नव विकसित व्यंजन ।
(1) मूल या केन्द्रीय व्यंजन-
हिन्दी को जो व्यंजन संस्कृत से प्राप्त हुए हैं वे ही मूल याकेन्द्रीय व्यंजन कहलाते हैं। ये इस
प्रकार हैं-
क्
ख्
ग्
छू
ज्
घ्
इ
झ्
ञ्
ट्
द
ण्
(ह)
त्
थ्
प् फ्
इ
द्
ब्
ल्
घ्
न्
भ् म्
र
(ल्ह)
व्
यू
श्
स्
ष्
ह
जहाँ तक 'इ', 'ञ्' तथा 'ष्' व्यंजनों का प्रश्न है, इनका उच्चारण हिन्दी में समाप्त हो चुका है। इनका प्रयोग केवल तत्सम शब्दों (संस्कृत से प्राप्त) में ही किया जाता है तथा मूर्धन्य 'ष' का उच्चारण तालव्य 'शू' के रूप में होने लगा है।
(2) आगत व्यंजन- अरबी, फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेजी तथा अन्य योरोपीय भाषाओं के शब्दों के हिन्दी में आ जाने के कारण जो व्यंजन आ गए हैं 'आगत व्यंजन' कहलाते हैं। इन व्यंजनों का भाषा में प्रयोग सीमित लोगों के द्वारा सीमित सन्दर्भों में ही किया जाता है।
इन व्यंजन ध्वनियों के लिए वर्ण भी बना लिए गए हैं जो इस प्रकार हैं . ख, ग, जू तथा फू जहाँ तक इन व्यंजनों के उच्चारण का सवाल है, सभी की स्थिति भिन्न है। अधिकांश हिन्दी भाषाभाषी प्रायः कृ, ख, ग, के स्थान पर इन्हीं के निकट के व्यंजन क् ख् ग् के रूप में उच्चारण करते हैं। हाँ! वे लोग जिनके पास अरबी/फ़ारसी की परम्परा है वे इनका उच्चारण सही करते हैं । जहाँ तक ज् तथा फ़ू का सवाल है चूँकि ये ध्वनियाँ अरबी-फ़ारसी के अलावा अंग्रेजी के शब्दों के आ जाने के कारण भी आयी हैं अतः शिक्षित लोग इनका उच्चारण ठीक प्रकार से करते हैं। इन व्यंजनों से बनाने वाले शब्दों के कुछ उदाहरण देखिए ताक़ ( दीवार का आला), खाना (अलमारी का - खाना), बारा (बगीचा), राज (रहस्य). फन (हुनर) आदि ।
(3) नव विकसित व्यंजन- हिन्दी में कुछ नये ऐसे व्यंजनों का भी विकास हुआ है जो संस्कृत में नहीं थे। ये व्यंजन ध्वनिय किसी अन्य भाषा के शब्दों के आने के कारण विकसित न होकर हिन्दी के संरचनात्मक विकास का परिणाम हैं। हिन्दी में नव विकसित व्यंजन हैं इ द न्ह, म्ह, ल्ह । इनमें से डू / तू क्रमश 'इ' तथा 'द' - से विकसित हुए हैं। हिन्दी में ड् / ढ् शब्दारम्भ या व्यंजन गुच्छों में ही आते हैं। जब भी ये शब्द के मध्य में दो स्वरों के बीच में तथा शब्दान्त में आते हैं तो इनका उच्चारण क्रमश: 'डू/ दू' में बदल जाते हैं, जैसे घोड़ा, जोड़ी, पहाड़ी, मोड़, तोड़, बूढ़ा, मूढा आदि।
हिन्दी में न्, म् तथा लू अल्प प्राण व्यंजन हैं। हिन्दी में अब इनके महाप्राण रूप क्रमश: न्ह म्ह ल्हू भी स्वतन्त्र व्यंजनों की भाँति प्रयुक्त होने लगे हैं और न्, म् ल् के व्यतिरेक में शब्द का अर्थ परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं, जैसे काना > कान्हा, कुमार > कुम्हार, आला > आल्हा आदि । -
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