मार्क्सवादी साहित्य-चिन्तन का प्रस्थान-बिन्दु - Departure point of Marxist literary thought
मार्क्सवाद के अनुसार कला का विकास भौतिक जगत् के विकास और समाज के इतिहास से जुड़ा हुआ है। कला के रूप और गुण भौतिक जगत् के विकास और समाज के इतिहास के साथ विकसित और परिवर्तित होते रहते हैं। प्रत्येक ऐतिहासिक काल अपने अन्तर्निहित आदर्शों के अनुरूप कला-कृतियों का जैसा सृजन करता है, वैसा ही सृजन अन्य ऐतिहासिक अवस्थाओं में नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी विशेष कलात्मक रूप या साहित्यिक विधा के विकास और प्रचलन को मनुष्य के विकास का स्तर और सामाजिक ढाँचा ही तय करते हैं। मार्क्स ने लिखा है कि "क्या प्रकृति और सामाजिक सम्बन्धों के बारे में वह दृष्टिकोण,
जो यूनानी कल्पना और इस कारण यूनानी कला के आधार में अन्तर्निहित है, ऐसे समय में सम्भव है जब स्वचालित तकुवे, रेलवे लाइनें, रेल इंजन और बिजली तार प्रणाली विद्यमान हों ?" मार्क्स के ग्रन्थ ' ए कंट्रीब्यूशन टू द क्रिटिक ऑफ़ पोलिटिकल इकोनॉमी' (1859) की भूमिका में प्रस्तुत ऐतिहासिक भौतिकवाद की आधारभूत स्थापना मार्क्सवादी साहित्य- चिन्तन का प्रस्थान- बिन्दु है-
"अपने जीवन के सामाजिक उत्पादन में मनुष्य ऐसे निश्चित सम्बन्धों में बँधते हैं, जो अपरिहार्य एवं उनकी इच्छा से स्वतन्त्र होते हैं।
उत्पादन के ये सम्बन्ध उत्पादन की भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल के अनुरूप होते हैं। इन उत्पादन सम्बन्धों का पूर्ण योग ही समाज का आर्थिक ढाँचा है- असली बुनियाद है, जिस पर क़ानून और राजनीति का ऊपरी ढाँचा खड़ा हो जाता है और जिसके अनुकूल ही सामाजिक चेतना के निश्चित रूप होते हैं। भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली जीवन की आम सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक प्रक्रिया को निर्धारित करती है। मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है।... आर्थिक बुनियाद के बदलने के साथ समस्त वृहदाकार ऊपरी ढाँचा भी कमोबेश तेज़ी से बदल जाता है।
ऐसे रूपान्तरणों पर विचार करते हुए एक भेद हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। एक ओर तो उत्पादन की आर्थिक परिस्थितियों का भौतिक रूपान्तरण है, जिसे प्रकृतिविज्ञान की अचूकता के साथ निर्धारित किया जा सकता है। दूसरी ओर वे कानूनी, राजनैतिक, धार्मिक, सौन्दर्यबोधात्मक या दार्शनिक, संक्षेप में, विचारधारात्मक रूप हैं, जिनके दायरे में मनुष्य इस टक्कर के प्रति सचेत होते हैं और उससे निपटते हैं।"
उपर्युक्त विचारों में सामाजिक विकास के सन्दर्भ में 'आधार' और 'अधिरचना' के पारस्परिक सम्बन्धों का उद्घाटन ही मार्क्स का अभीष्ट है;
कला और साहित्य सम्बन्धी विशिष्ट नियमों का विधान उनका लक्ष्य नहीं है। लेकिन अर्थव्याप्ति की दृष्टि से कला एवं साहित्य सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर भी भौतिक उत्पादन तथा सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक प्रक्रिया के पारस्परिक सम्बन्धों में निहित हैं। इसलिए मार्क्स के ये विचार कला एवं साहित्य सम्बन्धी मार्क्सवादी दृष्टि के आधारभूत सन्दर्भ-संकेत हैं। मार्क्स-एंगल्स ने अपने कई पत्रों में विशेष रचनाओं और लेखकों पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। उन्होंने दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र के अपने अध्ययनों को स्पष्ट करने के क्रम में विश्व साहित्य भण्डार का भरपूर उपयोग किया है। मार्क्स-एंगल्स के इन्हीं प्रयासों के अन्तर्गत उनके कला एवं साहित्य सम्बन्धी सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ है।
'आधार' और 'अधिरचना' के पारस्परिक सम्बन्धों का स्वरूप
कला और साहित्य के सम्बन्ध में 'आधार' और 'अधिरचना' के पारस्परिक सम्बन्धों की दृष्टि से बात करते समय प्रायः यह मान लिया जाता है कि 'आधार' या आर्थिक परिस्थिति के बदलते ही उसके अनुरूप 'अधिरचना' के अंग कला और साहित्य भी तुरंत बदल जाते हैं। मार्क्सवाद की सही समझ इस भ्रम का निवारण करती है।
21-22 सितंबर 1890 को जो. ब्लोख को एक पत्र में एंगल्स ने लिखा है कि "इतिहास की भौतिकवादी धारणा के अनुसार इतिहास का अन्तिम विश्लेषण में निर्णायक तत्त्व वास्तविक जीवन का उत्पादन और पुनरुत्पादन है।
इससे अधिक न मार्क्स ने और न मैंने ही कभी कहा है। अतः यदि कोई इसे तोड़-मरोड़कर यों कहे कि आर्थिक तत्त्व ही एकमात्र निर्णायक तत्त्व है, तो वह हमारी प्रस्थापना को निरर्थक, अमूर्त और खोखली शब्दावली मात्र बना देता है। आर्थिक परिस्थिति बुनियाद है पर ऊपरी ढाँचे के विविध तत्त्व ... ऐतिहासिक संघर्ष के प्रक्रम पर अपना प्रभाव डालते हैं और बहुत जगह तो संघर्ष के रूप के निर्धारण में इनका ही पलड़ा भारी रहता है।" स्पष्ट है कि मार्क्सवाद के अनुसार किसी भी युग को समझने के लिए आर्थिक सम्बन्धों को समझना आवश्यक है, लेकिन कला या साहित्य को उसका प्रतिबिम्ब मान लेना गलत है। सामाजिक जीवन की परिस्थितियाँ संश्लिष्ट रूप में कलाओं में अभिव्यक्त होती हैं, साहित्य और कलाएँ उनकी छायामात्र नहीं हैं, वे सापेक्ष रूप से स्वतन्त्र हैं ।
मार्क्सवाद कला को आर्थिक आधार की निष्क्रिय उपज नहीं मानता है। उसके अनुसार कलात्मक सृजन सहित सामाजिक चेतना के सभी रूप उस सामाजिक यथार्थ पर सक्रिय प्रभाव डालते हैं जिससे उनका आविर्भाव होता
मार्क्सवाद के अनुसार कलात्मक सृजन का आर्थिक विकास से गहरा सम्बन्ध होता है और सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव कलात्मक सृजन पर पड़ता है; लेकिन यह सब सीधे-सीधे यान्त्रिक रूप से नहीं होता है। ध्यान देने की बात है कि मार्क्सवाद में कलाकृतियों को भौतिक और आर्थिक कारकों का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं माना गया है।
मार्क्सवाद के संस्थापकों ने मानव चेतना के कलात्मक तत्त्वों को सामाजिक विकास में बहुत महत्त्वपूर्ण माना है तथा सामाजिक परिवर्तन की दिशा का निर्धारण करने में उनकी भूमिका को स्वीकार किया है।
मार्क्स के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि महान् कलात्मक उपलब्धियाँ उत्पादन शक्तियों के उच्चतम विकास पर निर्भर हो। यूनान के उदाहरण से स्पष्ट है कि आर्थिक रूप से अविकसित समाज में बड़ा कलात्मक सृजन हुआ। मार्क्स का प्रश्न है कि यूनानी कला और महाकाव्य हमें आज भी सौन्दर्यात्मक आनन्द प्रदान करते हैं।
और कुछ मामलों में तो उन्हें मानक और अलभ्य प्रारूप माना जाता है, ऐसा क्यों ? मार्क्स ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा है कि वह मानव जाति का ऐतिहासिक बाल्यकाल था, जहाँ उसने अपना सबसे सुन्दर रूप पाया, वह अवस्था फिर लौट कर नहीं आ सकती, हमारे आनन्द का स्रोत यह अनुभूति ही है। उनकी कला के प्रति हमारे आकर्षण और उस समाज की अपरिपक्व अवस्था जिसमें उसका जन्म हुआ, इन दोनों बातों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। हमारे आकर्षण का कारण उस समाज की वह अवस्था है जिसके अन्तर्गत इस कला ने जन्म लिया और केवल उसके अन्तर्गत ही वह जन्म ले सकती थी, और इसकी फिर कभी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती।
उसका तर्क है कि यूनानी लोग महान कला का सृजन अपने अविकसित समाज के बावजूद नहीं, बल्कि उस समाज के कारण ही कर पाए।
यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है तो क्या यूनानी कलाओं के प्रति हमारा आकर्षण मासूम बचपन की मीठी याद भर है ? इस पर मार्क्स की व्याख्या है कि कला कृतियों को विशेष सामाजिक अवस्थाओं तथा सम्बन्धों का प्रतिबिम्ब मानते समय उन विशेषताओं पर ध्यान देना ज़रूरी है जो इन कृतियों के शाश्वत मूल्य हैं। इन मूल्यों के कारण ही ऐतिहासिक रूप से भिन्न सामाजिक अवस्था की उपज होकर भी ये कला-कृतियाँ सदैव अपना महत्त्व बरकरार रखती हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि मार्क्सवाद के अनुसार साहित्य को समझने का अर्थ उस सम्पूर्ण सामाजिक प्रक्रिया को समझना है जिसका वह हिस्सा है। साहित्यिक रचनाओं का आधार कोई रहस्यमयी प्रेरणा नहीं होती है और न ही उन्हें लेखक के मनोजगत की उपज मान कर ही समझा जा सकता है। वस्तुतः साहित्य और कलाएँ दुनिया को देखने के विशेष दृष्टिकोण होते हैं और उनका अपने युग के प्रभुत्वशाली वर्ग के दृष्टिकोण अर्थात् 'विचारधारा' के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यह विचारधारा उस युग के वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों की उपज होती है जिसमें मनुष्य रहता है।
साहित्य और विचारधारा
मार्क्सवाद की एक मुख्य स्थापना यह है कि समाज के आर्थिक 'आधार' पर उसकी 'अधिरचना' खड़ी होती है।
'अधिरचना' में क़ानून, राजनीति अर्थात् एक राज्य का शासन होता है, जिसका कार्य आर्थिक उत्पादन के साधनों का स्वामित्व रखने वाले सामाजिक वर्ग की शक्तियों को मान्यता प्रदान करना है। लेकिन 'अधिरचना' में कई और तत्त्व भी शामिल होते हैं। इनमें सामाजिक चेतना के खास रूप, जैसे राजनैतिक, धार्मिक, नैतिक, सौन्दर्यशास्त्रीय आदि भी शामिल होते हैं। इन्हें मार्क्सवाद में 'विचारधारा' कहा जाता है। 'विचारधारा' का कार्य भी समाज में शासक वर्ग के हितों की रक्षा करना होता है। समाज के प्रमुख विचार उसके शासक वर्ग के विचार ही होते हैं। 'विचारधारा' ऊपरी संरचना का वह भाग है जो यह सुनिश्चित करता है कि जिस सामाजिक परिस्थिति में एक वर्ग समाज के दूसरे वर्ग पर अधिकार करता है अर्थात् उसका शोषण करता है,
उसे समाज के अधिकांश लोगों द्वारा या तो स्वाभाविक माना जाए या उस ओर बिल्कुल ध्यान न दिया जाए। कला और साहित्य समाज के ऊपरी ढाँचे अर्थात् 'अधिरचना' के अन्तर्गत 'विचारधारा' का भाग है।
मार्क्सवाद में कला को वर्गों के बीच विचारधारात्मक संघर्ष का प्रमुख अख माना जाता है। कला यदि शोषकों के हाथों वर्ग उत्पीड़न का साधन बन सकती हैं तो वह जनसाधारण में उस उत्पीड़न के प्रति संघर्ष की चेतना का विकास करने में भी सहायक हो सकती है। एंगल्स ने 'लुडविग फायरबाख और क्लासिकीय जर्मन दर्शन का अन्त' (1888) में यह लक्षित किया है कि कला राजनैतिक और आर्थिक सिद्धान्त से कहीं अधिक मूल्यवान् और गूढ़ है क्योंकि यह पूर्णरूप से विचारधारात्मक कम ही होती है।
इसका आशय यह है कि विचारधारा के साथ कला का सम्बन्ध कानून और राजनैतिक सिद्धान्त से अधिक जटिल होता है जो कि अधिक स्पष्ट रूप से शासक वर्ग के हितों को अभिव्यक्त करते हैं।
मार्क्सवाद के अनुसार वर्ग संघर्ष तीव्र होने की दशा में शासक वर्ग की विचारधारा की खुली आलोचना शुरू हो जाती है और शासित वर्ग अपने राजनैतिक विचार दृढ़ता के साथ सामने लाता है। इन विचारों के पीछे दृढ सैद्धान्तिक आधार होता है और ये विचार इस वर्ग की वर्ग-विचारधारा बन जाते हैं। अब दोनों वर्गों के बीच विचारधारात्मक संघर्ष शुरू हो जाता है।
वर्ग संघर्ष की तीव्रता के दौर में समाज के सभी वर्ग राजनैतिक विचारों के रूप में अपनी-अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं। यह बात उत्पादन प्रणाली के अन्तर्विरोधों को छुपाने वाली सामाजिक विचारधारा के अस्तित्व के सम्बन्ध में भ्रम पैदा करती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एक वर्ग की वर्ग-चेतना के निर्माण और इसकी विचारधारा के बीच निकट सम्बन्ध होता है। वर्ग-चेतना को समाज की सत्ताधारी विचारधारा की विरोधी विचारधारा के रूप में देखा जा सकता है। ग्योर्गी लूकाच के अनुसार 'विचारधारा' समाज में 'मिथ्या चेतना' का एक रूप है। यह 'मिथ्या चेतना' तब पैदा होती है जब एक वर्ग ( शासक वर्ग) की विचारधारा को पूरे समाज की वास्तविक विचारधारा मान लिया जाता है।
साहित्य में अन्तर्वस्तु और रूप की समस्या
साहित्य और विचारधारा के पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार करते समय हमने देखा कि मार्क्सवाद में विचारधारा को समाज के विभिन्न वर्गों के सामान्य दृष्टिकोण या जीवन और जगत् की उनकी समझ माना गया है। यह वर्ग विभाजित समाज में मनुष्य के जीवन यापन के तौर-तरीकों से सम्बन्धित एक धारणा है। विचारधारा को हम अपने समय के वस्तु-सत्य को जानने, समझने और ग्रहण करने के ढंग के रूप में भी समझ सकते हैं। समाज का बाह्य रूप उसके असली रूप से अलग है, यह विचार ही 'विचारधारा' की प्राथमिक समझ है। रूप और अन्तर्वस्तु प्रत्येक वस्तु में निहित हैं, इसलिए इन दोनों को पृथक् नहीं किया जा सकता है। वास्तव में तो अन्तर्वस्तु जैसी कोई चीज़ ही नहीं है,
जो भी है वह आकृति अर्थात् रूप युक्त अन्तर्वस्तु है । अन्तर्वस्तु की एक निश्चित आकृति या रूप होता है। अतः अन्तर्वस्तु से अलग रूप का कोई अस्तित्व नहीं होता है।
अन्तर्वस्तु और रूप के सम्बन्ध में मूल स्थापना यह है कि ये दोनों किसी भी कलाकृति का अभिन्न अंग हैं। और अन्योन्याश्रित हैं। दोनों तत्त्वों का सापेक्षिक महत्त्व है। यद्यपि अन्तर्वस्तु की प्राथमिकता असंदिग्ध है, तथापि रूप निष्क्रिय तत्त्व नहीं है। मार्क्सवादी चिन्तन में आर्थिक वास्तविकता को स्थापित करने की प्राथमिकता के कारण रूप के महत्त्व पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका।
मार्क्स के अनुसार रूप जब तक अपनी अन्तर्वस्तु का रूप नहीं है तब तक उसका कोई महत्त्व नहीं है। एक कलाकृति का रूप वे सभी कलात्मक साधन हैं जो सामंजस्यपूर्ण ढंग से मिलकर उसका निर्माण करते हैं। कलाकृति का महत्त्व रूप और अन्तर्वस्तु के सामंजस्य और संगति पर निर्भर करता है। रूप कलाकार की सम्पत्ति है, उसका व्यक्तित्व है और शैली कलाकृति पर कलाकार के व्यक्तित्व का प्रभाव परिलक्षित करती है। ऐतिहासिक दृष्टि से रूप जिस तरह की अन्तर्वस्तु को धारण करता है, रूप का निर्धारण उसी आधार पर होता है। जिस तरह अन्तर्वस्तु में परिवर्तन होता है, अन्तर्वस्तु के रूप में भी उसी अनुरूप परिवर्तन होता है।
इस प्रकार, अन्तर्वस्तु का अस्तित्व रूप से पहले है। जिस तरह समाज की भौतिक अन्तर्वस्तु उत्पादन प्रणाली उसकी अधिरचना का निर्धारण करती है, उसी तरह कलात्मक अन्तर्वस्तु कला-कृति के रूप का निर्धारण करती है।
भारतीय चिन्तन और साहित्य में मार्क्सवाद का प्रवेश
भारतीय दर्शन प्रायः भाववादी और अध्यात्मवादी माना जाता है। जगत् को मिथ्या और आत्मा को सत्य मानने के साथ-साथ अव्यक्त का ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति की साधना करने वाला दार्शनिक चिन्तन निश्चित रूप से भाववादी और अध्यात्मवादी है। लेकिन इसके समानान्तर लोकायत,
सांख्य, न्याय और वैशेषिक नामधारी दार्शनिक प्रणालियों में भौतिकवादी विचारों की प्रचुरता है। वेद और उपनिषद् जैसी प्राचीनतम कृतियों से लेकर रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों तक भौतिकवादी प्रवृत्ति विद्यमान रही है। संन्यास और जीवन से पलायन की प्रवृत्तियों ने इन भौतिकवादी विचारों को मुख्यधारा में आने से रोके रखा है, लेकिन आगे चलकर भारतीय चिन्तन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा में इन भौतिकवादी चिन्तन-प्रणालियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
भारत के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चिन्तन के विकास में उन्नीसवीं सदी के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलनों का विशेष महत्त्व है। धार्मिक क्षेत्र से शुरू हुए इन सुधारों ने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में भारतीय चिन्तन को प्रेरित किया।
सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद उभरी राजनैतिक चेतना के समानान्तर धर्म और धार्मिक आचरण की पुनर्व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानन्द और स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारत की बौद्धिक मनीषा को प्रखर बनाने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की। ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, आर्य समाज आदि के प्रयासों से भारत की जनता के धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण में गुणात्मक सुधार हुआ। एक सीमा तक, जन-जीवन में व्याप्त अन्धविश्वास और रूढ़िवादी विचारों को दूर करने में इन सुधारों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यहाँ से भारत में एक ऐसी वैचारिक प्रक्रिया की शुरूआत हुई जिससे आधुनिक भारत में वैज्ञानिक चिन्तन के विकास में सहायता मिली।
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