हिन्दी भाषा का विकास : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - Development of Hindi Language: Historical Background

भारत ईरान शाखा के कुछ आर्य भारत आये और उनके कारण भारत में भारतीय आर्यभाषा बोली जाने लगी। विद्वानों का विचार है कि आर्य भारत में कई दलों में आये। भाषा वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ग्रियर्सन आदि का कहना है कि कम से कम दो बार तो आर्य अवश्य आये। सभी विद्वान् इस बात से सहमत नहीं है। आर्यों के आने के काल के सम्बन्ध में भी विवाद है। अधिकांश लोग यह मानते है कि मोटे रूप से यह माना जा सकता है। कि 1500 ई.पू. के लगभग आर्य आ चुके थे। इसका आशय यह हुआ कि भारतीय आर्यभाषा का इतिहास 1500 ई. पू. से 20वीं सदी तक फैला हुआ है। इस साढ़े तीन हजार वर्षों के कालखण्ड को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता हैं-


(1) प्राचीन भारतीय आर्यभाषा काल


(ii) मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा काल :


(iii) आधुनिक भारतीय आर्यभाषा काल


1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक


500 ई.पू. से 1000 ई. तक


1000 ई. से अब तक


प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ


भाषाविद् डॉ. अवधेश्वर अरुण के विचार से अब यह निर्विवाद रूप से मान लिया गया है कि भारत में ● आर्यों का आगमन लगभग 1000 वर्षों तक शनैः शनैः होता रहा। ऐसी परिस्थिति में कालगत व्यवधान के कारण निश्चय ही इन सब आर्यों को एक भाषाभाषी मानना असंगत है। वैदिक साहित्य में प्राप्त भाषागत विविधता से यह स्पष्ट है कि थोड़ी-बहुत समानता के बावजूद आर्य भिन्न भाषाभाषी थे। टी. बर्नो ने अपनी पुस्तक 'History of Sanskrit Language' में इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि प्राचीन आर्यभाषा के पयार्यवाची रूप में संस्कृत का प्रयोग समीचीन नहीं हैं, क्योंकि उन बोलियों, जिन पर संस्कृत आधारित थी, के अतिरिक्त भी आर्यों की कई और बोलियाँ थीं इसलिए भारतीय आर्यभाषा शब्द का प्रयोग आदि की समस्त भाषाओं के लिये किया जाना चाहिए। संस्कृत और प्राकृत आदि ऐसी ही भाषाएँ हैं।


सच तो यह है कि इस युग की भाषा को सामान्यतः संस्कृत कहा जाता है। अब यह एक अलग प्रश्न है कि संस्कृत जनभाषा थी या कृत्रिम रूप से संघटित अपभाषा। इस पर विद्वान् एक मत व्यक्त नहीं करते। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, डॉ० प्रभात चन्द्र चक्रवर्ती तथा डॉ. ए. बी. कीथ आदि देशी-विदेशी विद्वान् संस्कृत को उच्च श्रेणी के शिक्षित समाज की भाषा मानते हैं। पर वहीं डॉ० शमशेर सिंह नरूला का कहना है कि "वास्तव में ये व्याकरण और ध्वनि के इतने जटिल नियमों द्वारा जकड़ी हुई कोई भाषा बोलचाल की भाषा हो ही नहीं सकती और न ही वह किसी की मातृभाषा हो सकती है, बेशक वह कितना ही विद्वान् क्यों न हो।" बहरहाल, यह संस्कृत काल में अपने दो रूपों में दिखाई देती हैं- (i) वैदिक तथा (ii) लौकिक । वैदिक भाषा का एक नाम छांदस भी है। 'कौषीतकि ब्राह्मण' के अनुसार उस काल में यही परिनिष्ठित साहित्यिक भाषा थी।


तस्मादु दीच्चां प्रसाततरा वागुद्यते उदञ् ड एवयान्ति वाचा शिक्षितुम् यो वा तत आगच्छति, तस्य वा शुश्रूषन्त इति ।।


इसी काल में एक आसुरी भाषा का भी उल्लेख मिलता है, जो अपने बोलिगत वैविध्य के कारण खास चर्चित थी।


संस्कृत का महत्त्व निर्विवाद है। सरदार के.एम. पणिक्कर का कहना है कि, "संस्कृत विश्व की संस्कृति और सभ्यता की भाषा है जो भारत की सीमाओं के पर टू-दूर तक फैली हुई थी।" डॉ. आर. के. मुकर्जी की स्थापना है, "ब्राह्मण काल एवं उसके पश्चात् भी निःसन्देह सामान्य जनता के धार्मिक कृत्यों,

पारिवारिक संस्कारों तथा शिक्षा एवं विज्ञान की भाषा थी।" इसी तरह डॉ. राम सकल पाण्डेय का यह उद्धरण भी विशेष महत्त्व का है कि, "जर्मन, फ्रेंच, लैटिन जैसी भाषाओं की शब्दावली पर संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव है। यूरोपीय संस्कृति के मूल तत्त्वों को समझने के लिये भी संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। यूरोपीय संस्कृति उसी भारोपीय संस्कृति की मूल शाखा है, जिनका चित्रण मूलतः संस्कृत में सुरक्षित है।" तो आइए, विपुल साहित्य को समाहित करने वाली विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक संस्कृत के दोनों रूपों को संक्षेप में देख लिया जाय-



वैदिक संस्कृत


यास्क और पाणिनि से पूर्व की भाषा को वैदिक भाषा, वैदिक संस्कृत या प्राचीन संस्कृत कहा जाता है।

साफ शब्दों में यह वैदिक वाङ्मय की महत्त्वपूर्ण भाषा है। इस काल के साहित्य को विद्वानों ने मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा है- (i) संहिता, (ii) ब्राह्मण, तथा (iii) उपनिषद् । संहिता के अन्तर्गत एक ओर तदक संहिता (ऋग्वेद), यजुःसंहिता (यजुर्वेद), साम संहिता (सामवेद) तथा अथर्व संहिता (अथर्ववेद) की गणना की जाती है तो वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण भाग में कर्मकाण्डों की व्याख्या है। इसके अतिरिक्त वैदिक ऋषियों के आध्यात्मिक चिन्तन से पूर्ण उपनिषदों में ज्ञान काण्ड की चर्चा है।


लौकिक संस्कृत


वैदिक संस्कृत की तुलना में इसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है। सुप्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि ने प्रचलित जनभाषा एवं वैदिक साहित्य भाषा दोनों को सामयिक प्रयोगों के आधार पर व्याकरण स्थिर करते हुए उसका संस्कार किया।

यही भाषा लोक प्रचलित भाषा कहलायी। 'लौकिक संस्कृत' के नामकरण के सम्बन्ध में पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिक विन्टर निट्ज का विचार है कि पाणिनि के नियमों से बद्ध होने के कारण ही यह लौकिक संस्कृत कहलायी - "What we call classical Sanskrit means panini's Sanskrit, that is the Sanskrit which according to the rules of Paninis is alone correct."


वैदिक और लौकिक संस्कृत में अन्तर तथा उनकी विशेषताएँ


वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत के बीच की कुछ भेदक प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं-


(1) वैदिक संस्कृत की तुलना में लौकिक संस्कृत में स्वरों की संख्या कम है। 'लू' स्वर का पूर्णतः लोप हो गया है।


(ii) वैदिक एवं लौकिक संस्कृत में शब्दभेद की दृष्टि का अन्तर है, दोनों की शब्दावली में पर्याप्त परिवर्तन हुआ यथा वैदिक संस्कृत में ईम अवस्तु डर्गिया, सीगा, उक्थ आदि शब्दों का आज की लौकिक संस्कृत में प्रयोग नहीं मिलता।


(iii) वैदिक संस्कृत में उपसर्ग धातुओं से अलग है पर लौकिक संस्कृत में धातु के साथ ही सम्बद्ध है।


(iv) वैदिक भाषा स्वराघात प्रधान भी, जबकि लौकिक संस्कृत बलाघात प्रधान भाषा हो गयी। (v) वैदिक संस्कृत में सप्तमी एक वचन अनेक स्थानों पर लुप्त हो जाता है, जैसे परमेव्योमन, पर


लौकिक संस्कृत में यह लुप्त नहीं होता। वहाँ पर 'व्योम्नि' या 'योमनि' रूप आज भी सुरक्षित है।

(vi) सन्धि कार्य की दृष्टि से वैदिक संस्कृत में अस्त-व्यस्तता है जबकि इसके ठीक उलट लौकिक संस्कृत में सन्धि सम्बन्धी नियम जटिल और अनिवार्य हैं।


vii) ए ओ वैदिक भाषा में संयुक्त स्वर थे पर लौकिक संस्कृत में मूल स्वर हो गए। वैदिक भाषा में समास चार प्रकार के मिलते हैं, यथा- (i) तत्पुरुष, (ii) कर्मधारय, (ii) बहुब्रीहि तथा (iv) द्वन्द्व किन्तु लौकिक संस्कृत में इनके अतिरिक्त दो और भी समास हैं- (i) द्विगु और (ii) अव्ययीभाव । (vii) वैदिक भाषा में 'र' का प्रयोग बहुतायत मिलता है, जबकि लौकिक संस्कृत में 'ल' का प्रयोग


मिलता है। यथा रम, रोम, रोहित क्रमशः लौकिक में लम, लोम, लोहित रूप में मिलते हैं।

(ix) वैदिक भाषा में कुछ शब्द लौकिक संस्कृत में भिन्न अर्थों के बोधक हो गए हैं, यथा- वैदिक भाषा में 'अराति' शब्द का अर्थ शत्रु तथा कंजूस दोनों था, पर लौकिक में आज वह महज 'शत्रु' शब्द का


द्योतक रह गया है। वैदिक संस्कृत में व्यंजनांत शब्दों का प्रयोग प्रायः नहीं मिलता है जबकि लौकिक संस्कृत में मिलता है। (x)


कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वैदिक एवं लौकिक संस्कृत में विभिन्न प्रकार के नैकट्य के बावजूद दोनों में व्याकरण, रूप-रचना और ध्वनि सम्बन्धी कुछ बुनियादी अन्तर भी हैं।