भारत में साहित्य के समाजशास्त्र का विकास - Development of Sociology of Literature in India
भारत में साहित्य के समाजशास्त्र के विकास की दिशा में कोई सुव्यवस्थित प्रयास नहीं हुआ है। कुछ समाजशास्त्रियों ने सामाजिक अध्ययन की स्रोत सामग्री के रूप में साहित्यिक कृतियों का विवेचन किया है और कुछ ने भारतीय साहित्य के चुनिन्दा तत्त्वों या कृतियों का विश्लेषण उनकी सामाजिकता की दृष्टि से करने का प्रयास किया है। धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी पी. सी. जोशी, श्यामाचरण दूबे आदि समाजशास्त्रियों ने साहित्य की सामाजिकता की खोज की दिशा में प्रयास किए हैं।
धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी स्वयं अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री होने के साथसाथ अपने समय के बांग्ला साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार और आलोचक भी थे।
उन्होंने अपने एक लेख में भारतीय साहित्य के समाजशास्त्र के विकास की कठिनाइयों की चर्चा की थी। उन्होंने बताया था कि भारत में समाजशास्त्र की दृष्टि और पद्धति से सही परिचय नहीं है। मार्क्सवाद के सरलीकरण को भी उन्होंने इस दिशा में एक मुख्य समस्या माना है। साहित्य की दुनिया के प्रति समाजशास्त्रियों की उदासीनता साहित्य के समाजशास्त्र के विकास में एक अन्य बड़ी बाधा है । धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी साहित्य और संस्कृति की गतिशील व्याख्या के माध्यम से समाज का विवेचन करते हैं। उन्होंने अपने कई निबन्धों में साहित्य के समाजशास्त्र को विकसित करने का प्रयास किया है।
उनका विचार था कि समाजशास्त्र की दृष्टि से कला और साहित्य की विषयवस्तु और रूप दोनों स्तरों पर सामाजिक परिवर्तन के प्रभाव की खोज अनिवार्य है।
हिन्दी के कथा-साहित्य का सामाजिक अध्ययन करने वाले समाजशास्त्रियों में पूरनचन्द्र जोशी और श्यामाचरण दूबे प्रमुख हैं। पूरनचन्द्र जोशी ने प्रेमचंद के साहित्य का मूल्यांकनसमाजशास्त्रीय दृष्टि से किया है और उसे भारत की सामाजिक आलोचना के रूप में देखा है। उनके अनुसार मूल्यों और नैतिकता से सम्बन्धित होने के कारण समाजशास्त्र और संस्कृति के मध्य अटूट सम्बन्ध होता है। श्यामाचरण दूबे सामाजिक सन्दर्भों में हिन्दी- साहित्य पर प्रमुखता से विचार करने वाले समाजशास्त्री हैं। उनकी पुस्तक 'परम्परा, इतिहास-बोध और संस्कृति' इस दृष्टि से उल्लेखनीय रचना है। इसमें उन्होंने साहित्य की सृजन प्रक्रिया और समाज से उसके सम्बन्ध पर गहराई से चिन्तन किया है। साहित्य के माध्यम से समाज को समझने के लिए पाठक की भूमिका और लोकप्रिय साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ को भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।
वार्तालाप में शामिल हों