हिन्दी की उपभाषाएँ - dialects of Hindi

अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है। हिन्दी की पाँच उपभाषाएँ हैं- (i) पश्चिमी हिन्दी, (ii) पूर्वी हिन्दी, (iii) राजस्थानी हिन्दी, (iv) बिहारी हिन्दी और (V) पहाड़ी हिन्दी ।



पश्चिमी हिन्दी


जैसा कि आपने जाना कि पश्चिमी हिन्दी, हिन्दी की उपभाषा का नाम है, जो कि पाँच बोलियों या विभाषाओं के समुदाय का नाम है। पश्चिमी हिन्दी किसी भाषा विशेष या बोली विशेष का नाम न होकर यह पाँच बोलियों का समूह है, जिसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ। पश्चिमी हिन्दी के बारे में आपको विस्तार से चौथी इकाई में पढ़ने को मिलगा।

पश्चिमी हिन्दी का क्षेत्र हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश हैं। इसकी निम्नलिखित बोलियाँ हैं - (क) हरियाणवी या बाँगरू, (ख) कौरवी या खड़ीबोली, (ग) बुंदेली, (घ) ब्रजभाषा और (ङ) कन्नौजी ।


आइए, इनके बारे में संक्षिप्त रूप में परिचयात्मक जानकारी प्राप्त करते हैं।


(क) हरियाणवी या बॉंगरू हरियाणा प्रदेश की बोली होने के कारण इसका नाम 'हरियाणवी' पड़ा है। इसका दूसरा नाम 'atगरू' है। 'बाँगर' का अर्थ है- उबड़-खाबड़ या उच्च भूमि। करनाल जिले के आसपास का क्षेत्र 'बाँगर' कहलाता है। इसी कारण, ग्रियर्सन ने इस विभाषा को 'बाँगरू' कहा है।

इसका तीसरा नाम 'जादू' भी कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, हरियाणा प्रदेश की बोली होने के कारण 'हरियाणवी', बाँगर क्षेत्र की भाषा होने के कारण 'बाँगरू' तथा जाटों की भाषा होने के कारण 'जादू' नाम से जानी जाती है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसका क्षेत्र कर्नल, रोहतक, हिसार, कुरुक्षेत्र, गुडगाँव, पटियाला का कुछ भाग तथा दिल्ली के आसपास तक फैला हुआ है। हरियाणवी में लोकसाहित्य काफी है, जिसका कुछ अंश अब प्रकाशित भी हो चुका है। हरियाणवी कड़ी बोली से काफी प्रभावित है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(1) हरियाणवी में 'ल' के स्थान पर 'ळ' का उच्चारण होता है। जैसे- 'जाल' शब्द स्थान पर 'जाळ' बोला जाता है।

(ii) इसमें दीर्घ व्यंजन का प्रयोग अधिक देखने को मिलता है। 'बेटा' से 'बेट्टा', 'गाड़ी' से 'गाड्डी' आदि।


(ख) खड़ीबोली या कौरवी खड़ीबोली के नामकरण को लेकर लेकर विद्वानों में काफी मतभेद है । विवादास्पद होने के कारण ही राहुल सांकृत्यायन ने कुरुक्षेत्र की बोली होने के कारण इसका नाम 'कौरवी' किया था। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर तथा मेरठ का यह सारा क्षेत्र कुरु के नाम से जाना जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र की बोली की बोली होने के कारण इसका नाम कौरवी भी किया गया था, मगर यह नाम अधिक सही और सार्थक होने पर भी खड़ीबोली के आगे नहीं चल पाया और नाम ही के रूप में रह गया। खड़ीबोली का क्षेत्र दिल्ली, मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर तथा देहरादून के मैदानी भाग तक फैला हुआ है। वैसे खड़ीबोली का क्षेत्र बिजनौर है।


'खड़ीबोली' नाम का प्रयोग दो अर्थ होता है एक 'मानक हिन्दी' या 'परिनिष्ठित हिन्दी' के - रूप में, जो साहित्यिक रूप है और खड़ीबोली से विकसित है। दूसरा, लोकबोली के अर्थ में, जो मेरठ- दिल्ली के आसपास के आस-पास स्थानीय बोली है। यहाँ लोकबोली के रूप में इसके मानक या परिनिष्ठित रूप को हिन्दी भाषा के नाम से जाना जाता है। यहाँ मात्र खड़ीबोली को लेकर दिल्ली-मेरठ के आसपास की स्थानीय बोली के रूप में विचार किया जा रहा है। इसकी सामान्य विशेषताएं निम्नलिखित


  1. खड़ीबोली में 'ऐ', 'औ' का उच्चारण 'ए', 'ओ' की तरह होता है, जैसे


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'बैर' से 'बेर', 'दौरा' से 'दोरा' आदि।


 (ii) हरियाणवी की तरह खड़ीबोली में भी अधिकतर शब्दों में 'न' के स्थान पर 'ण' का प्रयोग होता है, जैसे- 'हवाना' से 'हवाणा', 'पानी' से 'पाणी' आदि। 


(iii) अधिकतर शब्दों में 'ल' के 'ळ' का प्रयोग किया जाता है।


(iv) खड़ीबोली में भी दीर्घ व्यंजन का प्रयोग अधिक देखने को मिलता है। 'बेटा' से 'बेट्टा', 'गाड़ी' से 'गाड्डी' आदि।


(v) 'इ' के स्थान पर 'ड' का उच्चारण होता है। जैसे 'पेड़' के स्थान पर 'पेड', बड़ा के स्थान पर 'बड्डा' आदि।


(ग) बुंदेली - बुंदेलखंड के निवासियों द्वारा बोली जाने वाली बोली बुंदेली है। यह कहना बहुत कठिन है कि बुंदेली कितनी पुरानी बोली हैं लेकिन ठेठ बुंदेली के शब्द अनूठे हैं जो सदियों से आज तक प्रयोग में हैं। केवल संस्कृत या हिन्दी पढ़ने वालों को उनके अर्थ समझना कठिन हैं।

ऐसे सैकड़ों शब्द जो बुंदेली के निजी है, उनके अर्थ केवल हिन्दी जानने वाले नहीं बतला सकते किन्तु बंगला या मैथिली बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं। बुंदेलखंड के नाम से झाँसी, सागर, बाँदा और इसके आसपास का क्षेत्र जाना जाता है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसमें लोकसाहित्य प्रयाप्त मात्रा में मिलता है। इसकी सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-


(i) 'ऐ' तथा 'औ' का उच्चारण 'ए' तथा 'ओ' की तरह किया जाता है। जैसे- 'जैसो' से 'जेसो' तथा 'और' से 'ओर' आदि ।


(ii) इसमें स्वरों के अनुनासिक रूपों का प्रयोग अधिक मिलता है, जैसे- 'हाथ' से 'हात', 'भूख' से 'भूक' इत्यादि । 


(iii) 'ड' के स्थान पर 'र' का उच्चारण किया जाता है, जैसे- 'दौड़' से 'दौर', 'बड़ा' से 'बरा' आदि।


(iv) 'ल' के स्थान पर 'र' का उच्चारण किया जाता है, जैसे- 'गाली' से गारी' 'काली' से 'कारी' आदि ।


(घ) ब्रजभाषा ब्रजभाषा मूलतः ब्रज क्षेत्र की बोली है। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी - तक भारत के मध्य देश की साहित्यिक भाषा रहने के कारण ब्रज की इस जनपदीय बोली ने अपने उत्थान एवं विकास के साथ आदरार्थ भाषा नाम प्राप्त किया और ब्रजबोली नाम से नहीं, अपितु ब्रजभाषा नाम से विख्यात हुई ।

भारतीय आर्यभाषाओं की परम्परा में विकसित होने वाली 'ब्रजभाषा' शौरसेनी अपभ्रंश की कोख से जन्मी है। जब से गोकुल वल्लभ सम्प्रदाय का केन्द्र बना, ब्रजभाषा में कृष्ण विषयक साहित्य लिखा जाने लगा। इसी के प्रभाव से ब्रज की बोली साहित्यिक भाषा बन गई। भक्तिकाल के प्रसिद्ध महाकवि महात्मा सूरदास से लेकर आधुनिककाल के विख्यात कवि वियोगी हरि तक ब्रजभाषा में प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य समय-समय पर रचे जाते रहे। ब्रजभाषा की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(i) यह विभाषा ओकारान्त प्रधान है, जैसे प्यारों, ऐसों, जैसो आदि । 


(ii) ब्रज में 'ण' के स्थान पर 'न' का प्रयोग अधिक होता है, जैसे प्रवीण के स्थान पर प्रवीन, वेणु के स्थान पर वेनु आदि । 


(iii) इसमें 'स', 'श' 'ष' के स्थान पर 'स' का ही उच्चारण होता है। जैसे देश के स्थान पर 'देस', 'ऋषि' के बदले 'रिसी' आदि। 


(iv) ब्रज में 'ड' के स्थान पर 'र' का प्रयोग मिलता है, जैसे घोडा के स्थान पर 'घोरा', 'लड़का' के स्थान पर 'लरिका' आदि।


(ङ) कन्नौजी कन्नौज और उसके आस-पास बोली जाने वाली भाषा को कन्नौजी या कनउजी भाषा कहते


हैं। 'कान्यकुब्ज' से 'कन्नौज' शब्द व्युत्पन्न हुआ और कन्नौज के आस-पास की बोली 'कन्नौजी' नाम से अभिहित की गयी। कन्नौज वर्तमान में एक जिला है जो उत्तरप्रदेश में है। यह भारत का अति प्राचीन, प्रसिद्ध एवं समृद्ध नगर रहा है।

इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों रामायण आदि में मिलता है। कन्नौजी का विकास शौरसेनी प्राकृत की भाषा पांचाली प्राकृत से हुआ। इसीलिए आचार्य किशोरीदास बाजपेयी ने इसे पांचाली नाम दिया। वस्तुतः पांचाल प्रदेश की मुख्य बोली 'पांचाली' अर्थात् 'कन्नौजी' ही है। यह बोली उत्तर में हरदोई, शाहजहाँपुर और पीलीभीत तक तथा दक्षिण में इटावा, मैनपुरी की भोगाँव, मैनपुरी तथा करहल तहसील, एटा, अलीगंज, बदायूँ, दातागंज, बरेली, नवाबगंज, पीलीभीत में बोली जाती है। स्पष्ट है कि उत्तर पांचाल के अनेक जनपदों में तथा दक्षिण पांचाल के लगभग समस्त जनपदों में 'कन्नौजी' का ही प्रचार-प्रसार है। कन्नौजी का क्षेत्र बहुत विस्तृत नहीं है, परन्तु भाषा के सम्बन्ध में यह कहावत बड़ी सटीक है कि पर कोस कोस पानी बदले, दो कोस पर बानी' व्यवहार में देखा जाता है कि एक गाँव की भाषा अपने पड़ोसी गाँव की भाषा से कुछ न कुछ भिन्नता लिये होती है।


पूर्वी हिन्दी


पश्चिमी हिन्दी के पूर्वी भाग या पूर्व में इसका क्षेत्र होने के कारण इसका नाम पूर्वी हिन्दी रखा गया है। पूर्वी हिन्दी भी तीन विभाषाओं के समुदाय का नाम है, जिसका विकास अर्द्धमागधी अपभ्रंश से हुआ। पूर्वी हिन्दी के बारे में आपको विस्तार से चौथी इकाई में पढ़ने को मिलगा। ग्रियर्सन ने भी पूर्वी हिन्दी को तीन विभाषाओं का समुदाय स्वीकार किया है, जिसकी तीन बोलियाँ निम्नलिखित हैं, जिनके बारे में संक्षिप्त रूप में परिचयात्मक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं-


(क) अवधी यह पूर्वी हिन्दी क्षेत्र की एक उपभाषा है। यह उत्तरप्रदेश में लखनऊ, रायबरेली, सुल्तानपुर बाराबंकी, उन्नाव, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर, फैजाबाद,

प्रतापगढ़, इलाहाबाद, कौशाम्बी, अम्बेडकरनगर, गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती तथा फतेहपुर में भी बोली जाती है। इसके अतिरिक्त इसकी एक शाखा बघेलखंड में बघेली नाम से प्रचलित है। 'अवध' शब्द की व्युत्पत्ति अयोध्या से है। इस नाम का एक सूबा के राज्यकाल में था। तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस में अयोध्या को 'अवधपुरी' कहा है। इसी क्षेत्र का पुराना नाम 'कोसल' भी था जिसकी महत्ता प्राचीनकाल से चली आ रही है।


भाषा शास्त्री ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार अवधी बोलने वालों की कुल आबादी 1615458 थी। मौजूदा समय में शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 6 करोड़ से ज्यादा लोग अवधी बोलते हैं।

उत्तरप्रदेश के 19 जिलों- सुल्तानपुर अमेठी, बाराबंकी, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, कौशांबी, फतेहपुर, रायबरेली, उन्नाव, लखनऊ, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद व अंबेडकरनगर में पूरी तरह से यह बोली जाती है। जबकि 6 जिलों जौनपुर, मिर्जापुर, - कानपुर, शाहजहाँपुर, बस्ती और बांदा के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग होता है। बिहार के दो जिलों के साथ पड़ोसी देश नेपाल के 8 जिलों में यह प्रचलित है। इसी प्रकार दुनिया के अन्य देशों मॉरिशस, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, फिजी, गयाना, सूरीनाम सहित आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व हॉलैंड में भी लाखों की संख्या में अवधी बोलने वाले लोग हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत हैं-


(1) अवधी में 'ऐ' का उच्चारण संयुक्त स्वर 'अई' तथा 'ओ' का 'अड़' की तरह किया जाता है,

जैसे


'कैसा ' के स्थान पर 'कइसा', पैसा के स्थान 'पइसा', 'औरत' के स्थान पर 'अउरत' आदि।


 (ii) संज्ञाओं के तीन रूप मिलते हैं सामान्य, दीर्घ और दीर्घतर जैसे कुत्ता, कुतवा, और कुतउना - आदि । इसे अवधी की निजी विशेषता के रूप में स्वीकार किया जाता है।


 (iii) तीनों 'श', 'ष' तथा 'स' के स्थान पर 'स' का उच्चारण किया जाता है।


(iv) 'ण' के स्थान पर 'न' और कई बार 'ल' के स्थान पर 'र' का उच्चारण होता है।


(ख) बघेली पूर्वी हिन्दी की एक बोली है जो भारत के बघेलखण्ड क्षेत्र में बोली जाती है। यह मध्यप्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, उमरिया एवं अनूपपुर में, उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद एवं मिर्जापुर जिलों में तथा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर एवं कोरिया जनपदों में बोली जाती है। इसे बघेलखण्डी, रिमही और रिवई भी कहा जाता है। इसकी विशेषताएँ निम्नवत हैं-


(1) बघेली में दीर्घ तथा दीर्घतर रूप बनाने के 'का', 'कौना' तथा 'वा' जोड़कर बनाये जाते है, जैसे-


छोटका, छोटकौना तथा 'ललन' से 'ललनवा' आदि । 


(ii) बघेली में 'व' के स्थान पर 'म' का प्रयोग भी होता है, जैसे- 'चरावे' में 'चरामें', धरावे' से 'धरामे आदि।


(ग) छत्तीसगढ़ी - छत्तीसगढ़ी शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। एक तो छत्तीसगढ़ी भाषा वह भाषा है, जो भारत के छत्तीसगढ़ प्रान्त और उसके आसपास बोली जाती है और दूसरे छत्तीसगढ़ी लोग वे लोग हैं, जो भारत के छत्तीसगढ़ प्रान्त में रहते हैं या जिनका जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ है। छत्तीसगढ़ी भारत में छत्तीसगढ़ प्रान्त में बोली जाने वाली एक अत्यन्त ही मधुर व सरस भाषा है। छत्तीसगढ़ी की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(1) छत्तीसगढ़ी में 'श' तथा 'ष' व्यंजनों के स्थान पर 'स' तो कभी 'ख' का उच्चारण होता है, जैसे-


'वर्षा' के स्थान पर 'बरसा' या 'बरखा, 'भाषा' के स्थान 'भाखा' या 'भासा' आदि ।

(ii) इसमें महाप्राण ध्वनियों का प्रयोग अधिक होता है, जैसे 'जन' से स्थान पर 'छन', 'कचहरी' के स्थान पर 'कछेरी' आदि।


(iii) 'स' के स्थान पर 'छ' का उच्चारण होता है, जैसे 'सीता' स्थान पर 'छीता', 'सात' के स्थान पर 'छात' आदि।


 राजस्थानी हिन्दी


राजस्थानी हिन्दी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ। इसके बारे में आपको अगली इकाई में विस्तार से पढ़ने को मिलेगा । इसकी चार बोलियाँ हैं- (क) मारवाड़ी (पश्चिमी राजस्थानी ), (ख) जयपुरी (पूर्वी राजस्थानी ), (ग) मेवाती (उत्तरी राजस्थानी) और (घ) मालवी (दक्षिणी राजस्थानी ) ।


(क) मारवाड़ी मारवाड़ क्षेत्र में बोली जाने के कारण इसका नाम मारवाड़ी पड़ा है। इसका परिनिष्ठित या शुद्ध रूप जोधपुर के आस-पास देखा जा सकता है। यह जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, जैसलमेर, मेवाड़, सिरोही तथा इनकी आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। मारवाड़ी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। साहित्य की दृष्टि से राजस्थानी की सभी बोलियों में मारवाड़ी सबसे सम्पन्न है। इसमें साहित्य तथा लोकसाहित्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है। साहित्य में इसका आरम्भिक रूप 'डिंगल' के रूप में देखने को मिलता है, जिसका प्रयोग काव्य-रचना के लिए किया जाता है। वैसे भी 'डिंगल' हिन्दी के विकास को स्पष्ट करने में एक कड़ी का काम करती हैं, इसी कारण साहित्य-रचना में मारवाड़ी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। करीब-करीब राजस्थानी का पूरा साहित्य 'डिंगल' में ही लिखा गया है। नरपति नाल्ह, मीराबाई, दास आदि। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- 


(1) 'ल' ध्वनि का उच्चारण अनेक बार 'ल' के स्थान पर 'ळ' किया जाता है, जैसे- 'बाल' के स्थान पर 'बाळ' किया जाता है।


(ii) 'ऐ' तथा 'औ' स्वरों का उच्चारण कई बार संयुक्तस्वर 'अइ' तथा 'अड़' के रूप मिलता है। 


(iii) मारवाड़ी में दो विशेष ध्वनियाँ- 'ध' तथा 'स' मिलती है, जो कि क्लिक ध्वनियाँ हैं।


(ख) जयपुरी मुख्य रूप से जयपुर की बोली होने के कारण इसका नाम 'जयपुरी पड़ा है। इसका पुराना नाम 'ढूंढाड़ी' है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। आज जयपुरी केवल जयपुर की ही नहीं, बल्कि उसके साथ-साथ किशनगढ़ और अजमेर के कुछ भाग में भी जयपुरी ही बोली जाती है।

जयपुरी में लोकसाहित्य तो है ही, उसका कुछ अंश लिखित रूप में भी उपलब्ध है, विशेष रूप से दादूपंथी साहित्य । इसकी कुछ मुख्य विशेषताएँ निम्नवत हैं-


(1) जयपुरी में अल्पप्राणीकरण की प्रवृति देखने को मिलती है, जैसे 'जीभ' से 'जीव', 'आधो' से 'आदो' आदि।


(ii) 'ह' ध्वनि का शब्द में लोप हो जाता है, जैसे 'शहर' से 'सैर', 'सहाय' से 'साय' आदि।


(iii) क्रियारूप 'हूँ', 'हो' के स्थान पर 'छू, 'छो' का प्रयोग मिलता है।


(ग) मेवाती 'मेव' जाति के लोगों की बोली होने के कारण तथा इसका क्षेत्र मेवात होने के कारण इसका नाम 'मेवाती' पड़ा है।

इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। मेवाती में मात्र लोकसाहित्य ही मिलता है। मेवाती का क्षेत्र एक तरफ़ से 'हरियाणवी' से घिरा है तो दूसरी तरफ ब्रज से घिरा है। इसी कारण, यहाँ मेवाती का एक मिश्रित रूप भी मिलता है, जो 'अहिरावाटी' के नाम से जाना जाता है। 'मेवाती' में पश्चिमी हिन्दी की विशेषताएँ ही मिलती है। इसकी उप-बोलियों में राठी, नौर, गुजरी, कठेर आदि हैं।


(घ) मालवी - उज्जैन के आसपास का क्षेत्र 'मालवा' नाम से जाना जाता है, इसी कारण, इस क्षेत्र की बोली का 'मालवी' पड़ा है। इसका क्षेत्र उज्जैन,

इंदौर, रतलाम, देवास, होशंगाबाद तथा इसके आसपास पड़ता है। वैसे शुद्ध मालवी इंदौर उज्जैन और देवास है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। मालवी में लोकसाहित्य के साथ-साथ थोड़ा-बहुत उसका अंश लिखित रूप में भी मिलता है। इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं-


(1) 'ल' ध्वनि का उच्चारण अनेक बार 'ळ' के रूप में किया जाता है।


(ii) 'न' व्यंजन 'ण' में परिवर्तित हो जाता है, जैसे- 'कहानी' से 'कैणी' आदि।


(iii) 'ऐ' तथा 'औ' का उच्चारण 'ए' तथा 'ओ' के रूप में मिलता हैं, जैसे- 'पैसा' से 'पेसा', 'और' से 'ओर' आदि।


बिहारी हिन्दी


बिहारी हिन्दी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में बोली जाती है। बिहारी हिन्दी के बारे में आप अगली इकाई में विस्तृत रूप से पढ़ेंगे। बिहारी हिन्दी की मुख्यतः तीन बोलियाँ हैं- भोजपुरी, मगही और मैथिली ।


(क) भोजपुरी भोजपुरी शब्द का निर्माण बिहार का प्राचीन जिला भोजपुर के आधार पर पड़ा। जहाँ के राजा 'राजा भोज' ने इस जिले का नामकरण किया था। भाषाई परिवार के स्तर पर भोजपुरी एक आर्यभाषा है और मुख्य रूप से पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश तथा उत्तरी झारखण्ड के क्षेत्र में बोली जाती है। आधिकारिक और व्यावहारिक रूप से भोजपुरी हिन्दी की एक उपभाषा या बोली है।

भोजपुरी अपने शब्दावली के लिये मुख्यतः संस्कृत एवं हिन्दी पर निर्भर है कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण किये हैं। भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार विश्व के सभी महाद्वीपों पर है। जिसका कारण ब्रिटिश राज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेजों द्वारा ले जाये गए मजदूर हैं, जिनके वंशज अब जहाँ उनके पूर्वज गये थे वहीं बस गए हैं। इनमे सूरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, फिजी आदि देश प्रमुख है। भोजपुरी की कुछ सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं भोजपुरी में 'ल' व्यंजन ध्वनि 'न' में परिवर्तित हो जाती है, जैसे -'लवण' से 'नून', 'नोट' से 'लोट' आदि। अवधी की तरह ही भोजपुरी में भी संज्ञा शब्दों के सामान्य, दीर्घ तथा दीर्घतर रूप मिलते हैं, जैसे- सोनार (सामान्य), सोनारा (दीर्घ), सोनारवा (दीर्घतर) आदि । 'ल' के स्थान पर 'र' व्यंजन का प्रयोग मिलता है, जैसे 'मछली' से 'मछरी', 'गला' से 'गरा' आदि।


(ख) मगही 'मगही' शब्द 'मागधी' से विकसित है। 'मगध' की भाषा होने के कारण इसका नाम 'मगही' पड़ा है। ग्रियर्सन ने इसे आधुनिक आर्यभाषा की बाहरी उपशाखा के पूर्वी समुदाय में रखकर इसे बिहारी कहा है। वर्ष 2002 में इसके बोलने वालों की संख्या 1 लाख 30 हज़ार आँकी गई थी। लेकिन, वर्ष 2017 तक आते-आते इसके बोलने वालों की संख्या में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। बिहार के निम्नलिखित जिलों में यह भाषा मुख्य रूप से बोली जाती है गया, पटना, राजगीर, नालन्दा, नवादा, जहानाबाद, अरवल और औरंगाबाद बिहार के जिलों के अलावा भी झारखंड के कुछ क्षेत्रों, जिनमें सिंहभूम, मानभूम, हजारीबाग, पलामू, संथाल परगना आदि में भी मगही भाषा-भाषी बोलने समझने वाले लोग है। इसकी सामान्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-


(1) मगही में भी संज्ञा शब्दों के सामान्य, दीर्घ तथा दीर्घतर रूप मिलते हैं, जैसे- बेटा (सामान्य), बेटवा (दीर्घ), बेटउवा (दीर्घतर) आदि ।


(ii) कहीं-कहीं 'ओ' का उच्चारण 'अ' की तरह किया जाता है, जैसे- 'ओकर से 'अकर' आदि।


(ग) मैथिली 'मिथिला' क्षेत्र की विभाषा होने के कारण इसका नाम 'मैथिली' पड़ा है। इसका विकास मागधी अपभ्रंश से हुआ है। इसका क्षेत्र भारत में मुख्य रूप से दरभंगा मधुबनी, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, शिवहर, भागलपुर, मधेपुरा, अररिया, सुपौल, वैशाली, सहरसा, राँची, बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद और देवघर जिलों में है । नेपाल के आठ जिलों धनुषा, सिरहा, सुनसरी, सरलाही, सप्तरी, मोहतरी, मोरंग और रौतहट में भी यह बोली जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(1) अवधी की तरह ही मैथिली में भी संज्ञा शब्दों के सामान्य, दीर्घ तथा दीर्घतर रूप मिलते हैं, जैसे- घोड़ा (सामान्य), घोड़वा (दीर्घ), घोउडवा (दीर्घतर) आदि ।


(ii) 'ल' ध्वनि 'न' में परिवर्तित हो जाती है, जैसे- 'लवण' से 'नून', 'नोट' से 'लोट' आदि। 


(iii) महाप्राणीकरण प्रवृति देखने को मिलती है। जैसे- 'बेख' से 'भेख', 'जर्जर' से 'झांझर आदि । 


(iv) स्वरों का उच्चारण अतिलघु भी मिलता है। विशेष रूप से 'अ, इ, उ' का ।



पहाड़ी हिन्दी


पहाड़ी हिन्दी का सम्बन्ध मुख्य रूप से पहाड़ों से होने के कारण इसे 'पहाड़ी' कहा गया है। 'समुदाय' शब्द इसलिए जोड़ा गया है, क्योंकि इस वर्ग के अन्तर्गत दो उपभाषाओं की विभाषाएँ आती हैं,

इसी कारण यह समुदाय है। पहाड़ी समुदाय का क्षेत्र हिमाचल से लेकर उतरांचल तक फैला हुआ है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इस समुदाय के अन्तर्गत आज पहाड़ी के दो समुदाय आते हैं एक, मध्य पहाड़ी तथा दूसरे, पश्चिमी पहाड़ी । एक पूर्वी पहाड़ी का भी भेद किया जाता है। पहाड़ी समुदाय के बारे में विस्तार से आप अगले इकाई में पढ़ेंगे। मध्य पहाड़ी की दो प्रमुख बोलियाँ हैं- (क) कुमायूँनी और (ख) गढ़वाली।


(क) कुमायूँनी यह जिला नैनीताल, अल्मोड़ा तथा पिथौरागढ़ में प्रयुक्त होती है। हिन्दी द्वितीय भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है। इस कारण कुमाउँनी हिन्दी खड़ीबोली के अत्यधिक निकट आ गई है। इसकी विशेषताएँ निम्नवत हैं.


(1) कुमायूँनी में व्याकरण की दृष्टि से सर्वनामों में मैं, तू हम, तुम, ऊ, ॐ, (वह, वे) का प्रयोग चलता है। सम्बन्ध कारक बहुवचन का रूप 'उनको' न होकर 'उनर' होता है। हिन्दी की भाँति कुमाउँनी में दो ही लिंग प्रयुक्त होते हैं और यह लिंगत्व केवल पुरुषत्व स्त्रीत्व के भेद पर आधारित नहीं प्रत्युत वस्तु के आकार तथा स्वभाव पर भी निर्भर है। वचन दो हैं, तथा हिन्दी की प्रायः सभी धातुएँ मिलती हैं। पदक्रम एवं वाक्यविन्यास भी मिलता जुलता है। आरम्भ में कर्ता अन्त में क्रियापद रहता है।


क्रियाविशेषण भी हिन्दी की भाँति क्रिया के पूर्व आता है। कुमाउँनी में कुछ ध्वनियाँ खड़ीबोली हिन्दी की अपेक्षा विशिष्ट हैं। स्वरों की दृष्टि से हस्व 'आ', ह्रस्व 'ए', ह्रस्व 'ऐ', ह्रस्व 'ओ' तथा ह्रस्व 'औ' ध्वनियाँ देखी जा सकती हैं। 


(ii) (ख) गढ़वाली - अभी इसमें प्राचीन तत्त्व कुमाउँनी की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित हैं। इसका व्यवहार जिला गढ़वाल, टेहरी, चमोली, तथा उत्तर काशी में होता है। यहाँ भौगोलिक कारणों से आवागमन की कठिनाइयाँ हैं। इसलिए पहाड़ियों के दोनों ओर रहनेवालों अथवा एक ही नदी के आर-पार रहनेवालों के भाषागत प्रयोगों में विशेषताएँ उभर आई हैं। उत्तर की बोलियों में तिब्बती तथा पूर्व की ओर कुमाउँनी प्रभाव स्पष्ट होता गया है क्योंकि इन क्षेत्रों की सीमाएँ मिली हुई हैं। राजपूत जातियों का निवास होने के कारण गढ़वाली पर राजस्थानी प्रभाव तो है ही, इसके दक्षिण-पश्चिम की ओर खड़ीबोली भी अपना • प्रभाव डालती जा रही है। इसकी कुछ विशेषताएँ द्रष्टव्य हैं-


(1) गढ़वाली का झुकाव दीर्घत्व की ओर हैं। अतः स्वरों में ए, ऐ, ओ, औ, की ध्वनियाँ, जिनका दीर्घ रूप प्रधान है, अधिक प्रयुक्त होती हैं।


(ii) अनुनासिकता की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम हैं। कुछ ऐसे शब्द मिलते हैं जो प्राचीन भाषाओं से चले आए हैं जैसे ' मुख' के अर्थ में 'गिच्चों' शब्द सम्भव है कि इनमें अनेक प्राप्त शब्द प्राचीनतम जातियों के अवशेष हों।


(iii) व्याकरण की दृष्टि से गढ़वाली में एक दंताग्र 'ल' ध्वनि पाई जाती है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।


(iv) क्रिया-रूपों में धातु के अन्तिम 'अ' का लोप करके 'ओ' या 'अवा' जोड़ा जाता है, जैसे दौड़ना । 


(v) लिंगभेद भी प्रायः नियमित नहीं।


(vi) वस्तुओं की लघुता, गुरुता पर अधिक ध्यान दिया जाता है।


अन्य भाषा क्षेत्र


इनमें परिगणित की जाने वाली प्रमुख बोलियाँ इस प्रकार हैं- दक्खिनी हिन्दी (गुलबर्गी, बीदरी, बीजापुरी तथा हैदराबादी आदि), बम्बइया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी तथा शिलंगी हिन्दी (बाजार-हिन्दी) आदि ।


अन्य भाषाक्षेत्र का वर्गीकरण-


i. दक्खिनी


(ii) रेखता 


(iii) बम्बइया हिन्दी


(iv) कलकतिया हिन्दी


(v) शिलांगी हिन्दी


भारतेतर क्षेत्र


भारत के बाहर भी कई देशों में हिन्दीभाषी लोग बड़ी संख्या में बसे हैं। सीमावर्ती देशों के अलावा यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, रुस, जापान, चीन तथा समस्त दक्षिण पूर्व व मध्य एशिया में हिन्दी बोलने वालों की बहुत बड़ी संख्या है।

लगभग सभी देशों की राजधानियों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी एक विषय के रूप में पढ़ी-पढ़ाई जाती है। भारत के बाहर हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ में ताजुज्बेकी हिन्दी, मारिशसी हिन्दी, फीज़ी हिन्दी, सरनामी हिन्दी आदि हैं।


भारतेतर क्षेत्र का वर्गीकरण-


ताजुज्बेक हिन्दी


(ii) मॉरीशशी हिन्दी


(iii) फीजी हिन्दी


(iv) सरनामी हिन्दी


(v) अन्य हिन्दी