पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ - dialects of western Hindi
पश्चिमी हिन्दी में पाँच बोलियों की गणना की जाती है-खड़ीबोली, ब्रजभाषा, हरियाणवी, बुंदेली और कन्नौजी |
खड़ीबोली
'खड़ी' का अर्थ है - 'खरी' अर्थात् शुद्ध अथवा ठेठ हिन्दी बोली । शुद्ध अथवा ठेठ हिन्दी बोली या भाषा को उस समय खरी या खड़ीबोली के नाम से सम्बोधित किया गया जबकि हिन्दुस्तान में अरबी, फारसी और हिन्दुस्तानी शब्द मिश्रित उर्दू भाषा का चलन था और दूसरी ओर अवधी या ब्रजभाषा का । ठेठ या शुद्ध हिन्दी का चलन न था । यह लगभग 18वीं शताब्दी के आरम्भ का समय था, जब कुछ हिन्दी गद्यकारों ने ठेठ हिन्दी में लिखना शुरू किया।
इसी ठेठ हिन्दी को खरी हिन्दी या खड़ी हिन्दी बोली कहा गया । खड़ीबोली से तात्पर्य 'खड़ीबोली हिन्दी' से है जिसे भारतीय संविधान ने राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से इसे आदर्श हिन्दी, उर्दू तथा हिन्दुस्तानी की मूल आधार स्वरूप बोली होने का गौरव प्राप्त है। खड़ीबोली पश्चिमी रुहेलखंड, गंगा के उत्तरी दोआब तथा अम्बाला जिले की उपभाषा है जो वहाँ की ग्रामीण जनता द्वारा मातृभाषा के रूप में बोली जाती है। इस प्रदेश में रामपुर, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, सहारनपुर, देहरादून का मैदानी भाग, अम्बाला तथा कलसिया और भूतपूर्व पटियाला रियासत के पूर्वी भाग आते हैं।
'खड़ीबोली' (या खरी बोली) वर्तमान हिन्दी का एक रूप है जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता करके वर्तमान हिन्दी भाषा की सृष्टि की गई और फ़ारसी तथा अरबी के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि की गई है। अर्थात् वह बोली जिस पर ब्रज या अवधी आदि की छाप न हो, ठेठ हिन्दी हो। खड़ीबोली आज की राष्ट्रभाषा हिन्दी का पूर्व रूप है। यह परिनिष्ठित पश्चिमी हिन्दी का एक रूप है। इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है।
जिस समय मुसलमान इस देश में आकर बस गए, उस समय उन्हें यहाँ की कोई एक भाषा ग्रहण करने की आवश्यकता हुई।
वे प्रायः दिल्ली और उसके पूरबी प्रांतों में ही अधिकता से बसे थे और ब्रजभाष तथा अवधी भाषाएँ, क्लिष्ट होने के कारण अपना नहीं सकते थे, इसलिये उन्होंने मेरठ और उसके आसपास की बोली ग्रहण की और उसका नाम खड़ी (खरी) बोली रखा। इसी खड़ीबोली में वे धीरे-धीरे फ़ारसी और अरबी शब्द मिलाते गए, जिससे अन्त में वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि हुई। विक्रमी 14वीं शताब्दी में पहले-पहल अमीर खुसरो ने इस प्रान्तीय बोली का प्रयोग करना आरम्भ किया और उसमें बहुत कुछ कविता की, जो सरल तथा सरस होने के कारण शीघ्र ही प्रचलित हो गई। बहुत दिनों तक मुसलमान ही इस बोली का बोलचाल और साहित्य में व्यवहार करते रहे,
पर पीछे हिन्दुओं में भी इसका प्रचार होने लगा। 15वीं और 16वीं शताब्दी में कोई कोई हिन्दी के कवि भी अपनी कविता में कहीं-कहीं इसका प्रयोग करने लगे थे, पर उनकी संख्या प्रायः नहीं के समान थी। अधिकांश कविता बराबर अवधी और ब्रजभाषा में ही होती रही। 18वीं शताब्दी में हिन्दू भी साहित्य में इसका व्यवहार करने लगे, पर पद्म में नहीं, केवल गद्य में और तभी से मानों वर्तमान हिन्दी गद्य का जन्म हुआ, जिसके आचार्य मुंशी सदासुखलाल, लल्लू लाल और सदल मिश्र माने जाते हैं। जिस प्रकार मुसलमानों ने इसमें फ़ारसी तथा अरबी आदि के शब्द भरकर वर्तमान उर्दू भाषा बनाई, उसी प्रकार हिन्दुओं ने भी उसमें संस्कृत के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान हिन्दी प्रस्तुत की।
वर्तमान हिन्दी का एक रूप जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता करके वर्तमान हिन्दी भाषा की और फ़ारसी तथा अरबी के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि की गई है।
ब्रजभाषा
ब्रजभाषा मूलतः ब्रज क्षेत्र की बोली है। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक भारत के मध्य देश की साहित्यिक भाषा रहने के कारण ब्रज की इस जनपदीय बोली ने अपने उत्थान एवं विकास के साथ आदरार्थ भाषा नाम प्राप्त किया और ब्रजबोली नाम से नहीं, अपितु ब्रजभाषा नाम से विख्यात हुई। अपने विशुद्ध रूप में यह आज भी आगरा, हिण्डौन सिटी, धौलपुर, मथुरा, मैनपुरी, एटा और अलीगढ़ जिलों में बोली जाती है। इसे केन्द्रीय ब्रजभाषा के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है।
ब्रजभाषा में ही प्रारम्भ में काव्य की रचना हुई। सभी भक्तकवियों ने अपनी रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं। जिनमें प्रमुख हैं- सूरदास, रहीम, रसखान, केशव, घनानन्द, बिहारी, इत्यादि । फिल्मों के गीतों में भी ब्रजभाषा के शब्दों का प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, कन्नौजी को ब्रजभाषा का ही एक रूप मानते हैं। दक्षिण की ओर ग्वालियर में पहुंचकर इसमें बुंदेली की झलक आने लगती है। पश्चिम की ओर गुड़गाँव तथा भरतपुर का क्षेत्र राजस्थानी से प्रभावित है। ब्रजभाषा आज के समय में प्राथमिक तौर पर एक ग्रामीण भाषा है, जो कि मथुरा आगरा केन्द्रित ब्रज क्षेत्र में बोली जाती है। यह मध्य दोआब के इन जिलों की प्रधान भाषा है।
भारतीय आर्यभाषाओं की परम्परा में विकसित होनेवाली 'ब्रजभाषा' शौरसेनी अपभ्रंश की कोख से जन्मी है ।
जब से गोकुल वल्लभ सम्प्रदाय का केन्द्र बना, ब्रजभाषा में कृष्ण विषयक साहित्य लिखा जाने लगा । इसी के प्रभाव से ब्रज की बोली साहित्यिक भाषा बन गई। भक्तिकाल के प्रसिद्ध महाकवि महात्मा सूरदास से लेकर आधुनिककाल के विख्यात कवि वियोगी हरि तक ब्रजभाषा में प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य समय-समय पर रचे जाते रहे।
हरियाणवी या बाँगरू
हरियाणा प्रदेश की बोली होने के कारण इसका नाम 'हरियाणवी' पड़ा है। इसका दूसरा नाम 'बाँगरू' है। 'बाँगर' का अर्थ है - उबड़-खाबड़ या उच्च भूमि। करनाल जिले के आसपास का क्षेत्र 'बाँगर' कहलाता है। इसी कारण,
ग्रियर्सन ने इस विभाषा को 'बाँगरू' कहा है। इसका तीसरा नाम 'जादू' भी कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, हरियाणा प्रदेश की बोली होने के कारण 'हरियाणवी', बाँगर क्षेत्र की भाषा होने के कारण 'बाँगरू' तथा जाटों की भाषा होने के कारण 'जाटू' नाम से जानी जाती है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसका क्षेत्र कर्नल, रोहतक, हिसार, कुरुक्षेत्र, गुडगाँव, पटियाला का कुछ भाग तथा दिल्ली के आस-पास तक फैला हुआ है। हरियाणवी में लोकसाहित्य काफी है, जिसका कुछ अंश अब प्रकाशित भी हो चुका है। हरियाणवी कड़ी बोली से काफी प्रभावित है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) हरियाणवी में 'ल' के स्थान पर 'ळ' का उच्चारण होता है।
(ii) इसमें दीर्घ व्यंजन का प्रयोग अधिक देखने को मिलता है। 'बेटा' से 'बेट्टा', 'गाड़ी' से 'गाड्डी' आदि।
बुन्देली
बुंदेलखंड के निवासियों द्वारा बोली जाने वाली बोली बुंदेली है। यह कहना बहुत कठिन है कि बुंदेली कितनी पुरानी बोली हैं लेकिन ठेठ बुंदेली के शब्द अनूठे हैं जो सदियों से आज तक प्रयोग में हैं। केवल संस्कृत या हिन्दी पढ़ने वालों को उनके अर्थ समझना कठिन हैं। ऐसे सैकड़ों शब्द जो बुंदेली के निजी है, उनके अर्थ केवल हिन्दी जानने वाले नहीं बतला सकते किन्तु बांग्लाया मैथिली बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं।
प्राचीनकाल में बुंदेली में शासकीय पत्र-व्यवहार, सन्देश, बीजक, राजपत्र, मैत्री सन्धियों के अभिलेख प्रचुर मात्रा में मिलते है। कहा तो यह भी जाता है कि औरंगजेब और शिवाजी भी क्षेत्र के हिन्दू राजाओं से बुंदेली में ही पत्र-व्यवहार करते थे । ठेठ बुंदेली का शब्दकोश भी हिन्दी से अलग है और माना जाता है कि वह संस्कृत पर आधारित नहीं हैं। एक-एक क्षण के लिए अलग-अलग शब्द हैं। गीतो में प्रकृति के वर्णन के लिए, अकेली संध्या के लिए बुंदेली में इक्कीस शब्द हैं। बुंदेली में वैविध्य है, इसमें बांदा का अक्खड़पन है और नरसिंहपुर की मधुरता भी है।
बुंदेली बुंदेलखंड की उपभाषा है। शुद्ध रूप में यह झाँसी, जालौन, हमीरपुर, ग्वालियर, ओरछा, सागर, नरसिंहपुर, सिवनी तथा होशंगाबाद में बोली जाती है।
इसके कई मिश्रित रूप दतिया, पन्ना, चरखारी, दमोह, बालाघाट तथा छिंदवाड़ा विदिशा के कुछ भागों में पाए जाते हैं। कुछ कुछ बाँदा के हिस्से में भी बोली जाती है।
वर्तमान बुंदेलखंड चेदि, दशार्ण एवं कारुष से जुड़ा था। यहाँ पर अनेक जनजातियाँ निवास करती थीं। इनमें कोल, निषाद, पुलिंद, किराद, नाग, सभी की अपनी स्वतन्त्र भाषाएँ थी, जो विचारों-अभिव्यक्तियों की माध्यम थीं। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में इस बोली का उल्लेख प्राप्त है। शबर, भील, चांडाल, सजर, द्रविड़ोद्भवा, हीना वने वारणम् व विभाषा नाटकम् स्मृतम् से बनाफरी का अभिप्रेत है।
संस्कृत भाषा के विद्रोहस्वरूप प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ। इनमें देशज शब्दों की बहुलता थी। हेमचन्द्र सूरि ने पामरजनों में प्रचलित प्राकृत अपभ्रंश का व्याकरण दशवी शती में लिखा । मध्यदेशीय भाषा का विकास इस काल में हो रहा था। हेमचन्द्र के कोश में विंध्येली के अनेक शब्दों के निघंटु प्राप्त हैं।
बारहवीं सदी में दामोदर पण्डित ने 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' की रचना की। इसमें पुरानी अवधी तथा शौरसेनी ब्रज के अनेक शब्दों का उल्लेख मिलता है। इसी काल में अर्थात् एक हजार ईस्वी में बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरण प्राप्त होते हैं । इसमें देशज शब्दों की बहुलता थी ।
किशोरीदास वाजपेयी द्वारा लिखित 'हिन्दी शब्दानुशासन' के अनुसार हिन्दी एक स्वतन्त्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। बुंदेली की माता प्राकृत शौरसेनी तथा पिता संस्कृत भाषा है। दोनों भाषाओं से जन्मने के उपरान्त भी बुंदेली भाषा की अपनी चाल, अपनी प्रकृति तथा वाक्यविन्यास की अपनी मौलिक शैली है। हिन्दी प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत के निकट है ।
मध्यदेशीय भाषा का प्रभुत्व अविच्छन्न रूप से ईसा की प्रथम सहस्त्राब्दी के सारे काल में और इसके पूर्व कायम रहा। नाथ तथा नाग पंथों के सिद्धों ने जिस भाषा का प्रयोग किया, उसके स्वरूप अलग-अलग जनपदों में भिन्न-भिन्न थे।
वह देशज प्रधान लोकभाषा थी। इसके पूर्व भी भवभूतिकृत उत्तररामचरितम् में ग्रामीणजनों की भाषा विंध्येली प्राचीन बुंदेली ही थी। सम्भवतः चंदेल नरेश गंडदेव (सन् 940 से 999 ई.) तथा उसके उत्तराधिकारी विद्याधर (999 ई. से 1025 ई.) के काल में बुंदेली के प्रारम्भिक रूप में महमूद गजनवी की प्रशंसा की कतिपय पंक्तियाँ लिखी गयीं। इसका विकास रासो काव्यधारा के माध्यम से हुआ। जगनिक आल्हाखंड तथा परमाल रासो प्रौढ़ भाषा की रचनाएँ हैं। बुंदेली के आदिकवि के रूप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं, जो बुंदेली की समस्त विशेषताओं से मंडित हैं।
बुंदेली के बारे में कहा गया है- 'बुंदेली बा है जौन में बुंदेलखंड के कवियन ने अपनी कविता लिखी, बारता लिखने वारन ने वारता (गद्य) लिखी।
जा भासा पूरे बुंदेलखंड में एकई रूप में मिलत है। बोली के कई रूप जगा के हिसाब से बदलत जात हैं। जाई से कही गई है कि कोस कोस पे बदले पानी, गाँव-गाँव में बानी । बुंदेलखंड में जा हिसाब से बहुत सी बोली चलन में हैं जैसे डंघाई चौरासी पवारी आदि।"
कन्नौजी
कन्नौज और उसके आस-पास बोली जाने वाली भाषा को कन्नौजी या कनउजी भाषा कहते हैं। 'कान्यकुब्ज' से 'कन्नौज' शब्द व्युत्पन्न हुआ और कन्नौज के आस-पास की बोली 'कन्नौजी' नाम से अभिहित की गयी। कन्नौज वर्तमान में एक जिला है जो उत्तरप्रदेश में है।
यह भारत का अति प्राचीन, प्रसिद्ध एवं समृद्ध नगर रहा है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों रामायण आदि में मिलता है। कन्नौजी का विकास शौरसेनी प्राकृत की भाषा पांचाली प्राकृत से हुआ। इसीलिए आचार्य किशोरीदास बाजपेयी ने इसे पांचाली नाम दिया। वस्तुतः पांचाल प्रदेश की मुख्य बोली 'पांचाली' अर्थात् 'कन्नौजी' ही है। यह बोली उत्तर में हरदोई, शाहजहाँपुर और पीलीभीत तक तथा दक्षिण में इटावा, मैनपुरी की भोगाँव, मैनपुरी तथा करहल तहसील, एटा की एटा और अलीगंज तहसील, बदायूँ की बदायूँ तथा दातागंज तहसील, बरेली की बरेली, फरीदपुर तथा नवाबगंज तहसील, पीलीभीत, हरदोई (संडीला तहसील में गोसगंज तक), खेरी की मुहम्मदी तहसील तथा सीतापुर की मिस्रिख तहसील में बोली जाती है। स्पष्ट है कि उत्तर पांचाल के अनेक जनपदों में तथा दक्षिण पांचाल के लगभग समस्त जनपदों में 'कन्नौजी' का ही प्रचार-प्रसार है।
कन्नौजी का क्षेत्र बहुत विस्तृत नहीं है, परन्तु भाषा के सम्बन्ध में यह कहावत बड़ी सटीक है कि - "कोस कोस पर पानी बदले दुइ-दुइ कोस में बानी ।" व्यवहार में देखा जाता है कि एक गाँव की भाषा अपने पड़ोसी गाँव की भाषा से कुछ न कुछ भिन्नता लिये होती है। इसी आधार पर कन्नौजी की उपबोलियों का निर्धारण किया गया है।
कन्नौजी उत्तरप्रदेश के कन्नौज, औरैया, मैनपुरी, इटावा फर्रुखाबाद, हरदोई, शाहजहाँपुर, कानपुर, पीलीभीत जिलों के ग्रामीण अंचल में बहुतायत से बोली जाती है। कन्नौजी भाषा या कनउजी, पश्चिमी हिन्दी के अन्तर्गत आती है।
कन्नौजी भाषा क्षेत्र में विभिन्न बोलियों का व्यवहार होता है,
जिनको इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है मध्य कन्नौजी, तिरहारी, पछरुआ, बंग्रही, शहजहाँपुरिया, पीलीभीती, बदउआँ, अन्तर्वेदी । पहचान की दृष्टि से कन्नौजी ओकारान्त प्रधान बोली है। ब्रजभाषा और कन्नौजी में मूल अन्तर यही है कि कन्नौजी के ओकारान्त और एकारान्त के स्थान पर ब्रजभाषा में 'औकारान्त' और 'ऐकारान्त' क्रियाएँ आती हैं। जैसे - 'गओ' > 'गयौ', 'खाओ' 'खायौ', 'चले' 'चलै', 'करे' > 'करे' ।
इसकी ध्वनियों में मध्यम 'ह' का लोप हो जाता है- 'जाहि' 'जाई' शब्दारम्भ में 'ल्ह', 'ह', 'म्ह' व्यंजन मिलते हैं- 'लहसुन', 'ईंट', 'महंगाई' आदि अन्त्य अल्पप्राण महाप्राण में बदल जाता है - 'हाथ' > 'हातू' स्वरों में अनुनासिकीकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है- 'अइँचत', 'जुआँ', 'इंकार',
'भउजाई', 'उंघियात', 'अनेंट', 'मों' (मुँह)। 'य' के स्थान पर 'ज' हो जाता है- 'यमुना' 'जमुना', 'यश' > 'जस' 'व' के स्थान पर 'ब' का व्यवहार होता है- 'वर'>'बर', 'वकील' 'बकील'। कहीं-कहीं पर 'व' के स्थान पर 'उ' भी प्रयुक्त होता है- 'अवतार' > 'अउतार'। उसमें अवधी की भाँति उकारान्त की प्रवृत्ति भी पाई जाती है- 'खेत' > 'खेतु', 'मरत'> 'मत्तु' । कहीं-कहीं 'ख' के स्थान पर 'क' उच्चरित होता है 'भीख' 'भीक', 'ण' 'ड्र' हो जाता है 'रावण' 'रावड़', 'गण' > 'गड़' 'स' के स्थान पर 'ह' उच्चरित होता है- 'मास्टर' > 'महर', 'सप्ताह' > 'हप्ताह' । उपेक्षाभाव से उच्चरित संज्ञा शब्दों में 'टा' प्रत्यय का योग विशेष उल्लेखनीय है- 'बनियाँ' > 'बनेटा', 'किसान'>'किसन्टा', 'काछी' 'कछेटा', 'बच्चा'> 'बच्चटा' आदि।
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